Scienceविभिन्नताएँ क्या है, विभिन्नताओं के प्रकार, विभिन्नताओं के कारण Variation Definition

विभिन्नताएँ क्या है, विभिन्नताओं के प्रकार, विभिन्नताओं के कारण Variation Definition

विभिन्नताएँ (Variation)

विभिन्नताओं variation से अभिप्राय भिन्नताओं से है। सजीव जगत में कोई भी दो प्राणी एक समान नहीं होते हैं। एक ही प्राणी के दो अंग या अंग के भाग भी भिन्नता रखते हैं। एक माता-पिता के समस्त बच्चे भी समान नहीं होते हैं। इस प्रकार एक ही समष्टि में एक प्राणी और अन्य सब प्राणियों के बीच पाये जाने वाले अन्तर विभिन्नताएँ (Variations) कहलाती है। ये भिन्नता लिंग, आयु, जीवन-चक्र की अवस्था एवं सामान्य कार्यिकीय परिवर्तनों से सम्बन्धित होनी चाहिए। परिवर्तन के समय सामान्य रूप से होने वाले परिवर्तन या वातावरणीय उद्दीपनों के प्रति प्रदर्शित विभिन्न अनुक्रियाओं (responses) के प्रति विभिन्नताओं को सम्मिलित नहीं किया जाता है। जैसे कैमेलियोन (Chameleon) में होने वाले रंग सम्बन्धी, भूखे रहने या भोजन कर लेने से भार में होने वाले परिवर्तन, डिंभकों वयस्कों के बीच पाई जाने वाली विभिन्नताएँ आदि।

विभिन्नताएँ जैव-विकास का महत्त्वपूर्ण आधार है। जैव विकास के फलस्वरूप नई जातियाँ व प्रजातियाँ विकसित होती है। विभिन्नताओं के बिना परिवर्तन नहीं हो सकता था और ऐसी दशा में जैव-विकास असंभव होता। लेकिन सभी विभिन्नताएँ एक सी नहीं होती है। कुछ विभिन्नताएँ ही वंशागति योग्य होती है। केवल वंशागति योग्य विभिन्नताएँ ही विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है जो विभिन्नताएँ वंशागति योग्य नहीं होती है उनका सम्बन्ध केवल प्राणी से होता है न कि प्रजाति से। इसलिए इनका विकासीय महत्व नहीं होता। डार्विन ने इन्हीं के आधार पर जाति के उद्भव (origin of species) का सिद्धान्त प्रतिपादित किया।

विभिन्नताओं के प्रकार (Types of variation)

विभिन्नताओं को विपर्यासी (contrasting) प्रकारों के चार युग्मों में वर्गीकृत किया जाता है

  1. जननिक या कायिक विभिन्नताएँ
  2. सतत् या असतत् विभिन्नताएँ
  3. निर्धारी या अनिर्धारी विभिन्नताएँ
  4. गणनीय या परिमाण सम्बन्धी विभिन्नताएँ प्रत्येक विभिन्नता को उपरोक्त प्रत्येक समूह में वर्गीकृत किया जाता है परन्तु एक समूह में वह या तो एक या अन्य विपर्यासी प्रकार की होती है।

1. जननिक या कायिक विभिन्नताएँ (Germinal and somatic variations)

जननिक विभिन्नताएँ जनन द्रव्य में उत्पन्न होती है तथा गर्भधारण के समय ही निर्धारित हो जाती है परन्तु आवश्यक रूप से गर्भधारण के समय विकसित नहीं होती है। ये भ्रूणीय जीवन के प्रारम्भ से प्राणी के मृत्यु पर्यन्त किसी भी समय प्रदर्शित हो सकती है परन्तु ये इस प्राणी में निषेचन के समान ही पहले से निश्चित हो जाती है। ये विभिन्नताएँ आन्तरिक होती है तथा किसी भी बाह्य प्रभाव के कारण उत्पन्न नहीं होती है। ये वंशागति योग्य होती है तथा इन्हें भ्रूणीय या जन्मजात (congenital) विभिन्नताएँ भी कहते हैं। उदाहरण मनुष्य में अधिसंख्य अंगुली (super numerary digit) की उपस्थिति, मधुमक्खी में पुंमक्षिका (drone) एवं रानी (queen) या कर्मी (worker) में लैंगिक भिन्नतायें आदि।

कायिक विभिन्नताएँ वातावरण के प्रत्यक्ष प्रभाव द्वारा प्राणी के जीवन काल में आरोपित (impose) की जाती है। ये वंशागति योग्य नहीं होती है तथा धारक की मृत्यु के साथ-साथ लुप्त हो जाती है। इन्हें उपार्जित (acquired) विभिन्नताएँ भी कहते हैं। उदाहरण दुर्घटना के कारण किसी अंग की हानि, चीनी औरतों के छोटे पाँव, खिलाड़ियों की पेशियों का अधिक विकसित होना, मधुमक्खियों में कर्मियों एवं रानियों में भेद आदि।

2. सतत् या असतत् विभिन्नताएँ (Continuous and discontinuous varia tions) –

सतत् विभिन्नताएँ छोटी तथा अधिक होती है जो क्रमिक श्रेणी में पाई जाती है। इन विभिन्नताओं में औसत लक्षण के उच्चावचन पाये जाते हैं। डार्विन ने इन्हें जातियों के उद्गम और विकास में महत्वपूर्ण बतलाया। वयस्क मनुष्य की ऊँचाई, भार एवं मानसिक शक्ति में पाई जाने वाली विभिन्नताएँ ऐसी श्रेणी में सम्मिलित की जाती है। ये विभिन्नताएँ वंशागति के योग्य अथवा अयोग्य हो सकती है।

असतत् विभिन्नताएँ आकस्मिक तथा बड़ी होती है। ये विभिन्नताएँ सामान्य लक्षण से बहुत अधिक विचलित हो जाती है और इनमें औसत लक्षण से उच्चावचन नहीं होता है बल्कि ये पूर्णतया नये रूप में प्रदर्शित होती है। ये विभिन्नताएँ अधिकतर स्थायी, वंशागति योग्य एवं विरल होती है। इनमें निश्चित आवर्तिता (periodicity) भी नहीं पाई जाती। इन्हें उत्परिवर्तन (Mutation) कहते हैं। डी व्रीज (De vries) के अनुसार विभिन्नताएँ जातियों के उद्गम और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।

उदाहरण- कशेरूकियों की अंगुलियों में मानक संख्या से विचलन, भेड़ या बकरियों में दो के बदले चार सींगों का उत्पन्न हो जाना, गुलाब के पौधों में कभी-कभी काँटों का न होना, कुत्ते तथा बिल्ली में कभी-कभी बालों का न होना, बछड़े में सींगों का न होना आदि।

3. निर्धारी या अनिर्धारी विभिन्नताएँ (Determinate and indeterminate varia tions)-

जो विभिन्नताएँ नियमबद्ध नहीं होती है बल्कि परिवर्तन की किसी विचारणीय दिशा में उत्पन्न होती है, उन्हें अनिर्धारी विभिन्नताएँ कहते हैं। डार्विन के अनुसार प्राकृतिक वरण कारक इन्हीं पर क्रियाशील होता है।

उदाहरण- प्राणियों के समूह में प्राणियों के आकार सम्बन्धी विभिन्नताएँ।

निर्धारी विभिन्नताएँ किसी अज्ञात प्रभाव द्वारा नियन्त्रित की जाती है। वे किसी निश्चित परिवर्तन की निश्चित दिशाओं में ही उत्पन्न होती हैं। परिवर्तन की ऐसी दिशायें प्राय: अनुकूली दिशायें होती हैं। इन विभिन्नताओं को निर्धारी या विकासीय (Orthoge netic) विभिन्नताएँ कहते हैं तथा इन्हें विकास के लिये अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता है। कुछ शोधकर्ताओं का कहना है कि इन विभिन्नताओं का वास्तव में कोई अस्तित्व नहीं होता है।

उदाहरण- (i) पर्ण-भक्षी भृगों (leaf eating beteles) में रंग प्रतिरूप के एक प्रभावी प्रकार से दूसरे में परिवर्तित हो जाना। (ii) अंगूलेट्स (ungulates) के दन्त प्रतिरूप का क्रमिक रूपान्तरण। (iii) अभिसारिता (convergence) की घटना निर्धारी या विकासीय विभिन्नताओं के फलस्वरूप हुई है।

4. गणनीय या परिमाण सम्बन्धी विभिन्नताएँ (Meristic and Substantive variations)

परिवर्तन की प्रकृति के अनुसार गणनीय विभिन्नताओं में प्राणी के अंगों की संख्या में पुनरावृत्ति से उत्पन्न विभिन्नताएँ होती है। उदाहरण- मनुष्य के हाथ या पैरों में 5 अंगुलियों के स्थान पर 6 का पाया जाना, मनुष्य में 12 के स्थान पर 13 पसलियाँ होना, तारा मीन (star-fish) में 5 के स्थान पर 6 भुजाओं का पाया जाना आदि।

परिणाम सम्बन्धी विभिन्नताओं में किसी प्राणी या इसके भागों के आकार (size) या रंग-सम्बन्धी विभिन्नताएँ सम्मिलित है।

उदाहरण- आइरिस (Iris) या बालों का रंग। नाक, कान, आँख आदि के रूप, प्राणी के शरीर की ऊँचाई, पेड़ों की पत्तियों के आकार आदि।

विभिन्नताओं को कार्यिकीय (physiological), आकारिकीय, मनोवैज्ञानिक (psy chological) एवं पारिस्थितिकीय विभिन्नताओं में भी वर्गीकृत किया जा सकता है। आकारिकीय विभिन्नताओं में किसी प्राणी या उसके अंगों के रूप या संरचना सम्बन्धी परिवर्तन सम्मिलित होते हैं। कार्यिकीय विभिन्नताएँ किसी अंग के कार्य सम्बन्धित विभिन्नताएँ होती है। मनोवैज्ञानिक विभिन्नताओं में प्राणी के मानसिक अभिलक्षणों की विभिन्नताएँ सम्मिलित की जाती है। इसके अतिरिक्त विभिन्नताएँ लाभदायक, हानिकारक या उदासीन हो सकती है।

विभिन्नताओं के कारण (Causes of Variations)

कायिक विभिन्नताएँ वातावरण की प्रत्यक्ष क्रिया के कारण होती हैं। ये बाह्य परिस्थितियों द्वारा उत्पन्न भौतिक एवं रासायनिक परिवर्तनों (ताप, शीत, भोजन की उपलब्धता, शत्रुओं की उपस्थिति आदि) पर निर्भर होती हैं। कुछ में विभिन्नताएँ अनुकूल होती है अर्थात् अनुकूलन की क्षमता, जो विभिन्न प्राणियों में भिन्न होती है, विभिन्नताओं का एक महत्वपूर्ण कारक है।

विभिन्नताओं की उत्पत्ति के निम्न कारण हैं

1. अन्तर्निहित प्रवृत्ति (Inherent tendency)-

प्राणी एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। सभी प्राणियों की रचना का आधारभूत पदार्थ जीवद्रव्य होता है, जो रासायनिक पदार्थों का बना होता है। इन रासायनिक पदार्थों के अणुओं में निरन्तर परिवर्तन होते रहते हैं। अतः दो प्राणियों का किसी भी समान परिस्थितियों में समान मिलना कठिन है। निश्चित ही उनमें विभिन्नताएँ उत्पन्न होगी।

2. वातावरण (Environment)-

वातावरण प्राणियों पर सीधा प्रभाव डालता है। कायिक विभिन्नताएँ वातावरण की प्रत्यक्ष क्रिया के कारण उत्पन्न होती हैं। उनकी शारीरिक रचना ही प्रभावित नहीं होती बल्कि उनकी कार्यप्रणाली में भी अन्तर आ जाता है।

3. अन्तः स्त्रावी ग्रन्थियाँ (Endocrine gland)

हॉरमोन्स भी जीवों के परिवर्धन व भिन्नता को प्रभावित करते हैं, इसकी मात्रा में कमी या वृद्धि होने पर जीवों के विभिन्न मानसिक व शारीरिक गुणों में भिन्नता आ जाती है। इस प्रकार हॉरमोन्स से बाह्य व आन्तरिक विभिन्नताएँ उत्पन्न हो जाती है।

4. दोहरी पैतृकता (Dual parentage)

वीजमैन (Weisman) के अनुसार एक माता-पिता से उत्पन्न सन्तान ठीक उनकी तरह न होकर कुछ भिन्न होती है। लैंगिक जनन में दो भिन्न युग्मकों से युग्मनज का निर्माण होता है तथा दोनों प्राणियों की जीन संरचना पृथक-पृथक प्रकार की होती है। अतः युग्मनज से उत्पन्न होने वाली सन्तानों में विभिन्नताएँ होती हैं।

5. उत्परिवर्तन (Mutations)-

उत्परिवर्तन के कारण जीन कोष में परिवर्तन होते रहते हैं। उत्परिवर्तन गुणसूत्रों की संख्या, संरचना एवं जीनी संरचना में परिवर्तन के कारण उत्पन्न होते हैं। जिससे प्राणियों में आनुवंशिक विभिन्नताएँ उत्पन्न हो जाती हैं।

6. अनिषेकजनन (Parthenogensis)-

अनिषेकजनन में अर्धसूत्री विभाजन के दौरान होने वाले यादृच्छिक पृथक्करण तथा विनिमय के फलस्वरूप प्राणियों में विभिन्नताएँ उत्पन्न होती है।

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