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चार चने कविता – निरकार देव सेवक

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चार चने कविता – निरकार देव सेवक

पैसा पास होता तो चार चने लाते।

चार में से एक चना तोते को खिलाते।

तोते को खिलाते तो टॉय-टॉय गाता।

टॉय-टॉय गाता तो बड़ा मजा आता।

पैसा पास होता तो चार चने लाते।

चार में से एक चना घोड़े को खिलाते ।

घोड़े को खिलाते तो पीठ पर बैठाता ।

पीठ पर बैठाता तो बड़ा मज़ा आता।

पैसा पास होता तो चार चने लाते।

चार में से एक चना चूहे को खिलाते ।

चूहे को खिलाते तो दाँत टूट जाता।

दाँत टूट जाता तो बड़ा मजा आता।

पशु विकास से संबंधित प्रमुख योजनाएं और संस्थान

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पशु विकास से संबंधित प्रमुख योजनाएं और संस्थान

1. गोपाल योजना

  • शुरुआत – 2 अक्टूम्बर 1990
  • उद्देश्य पशुचन पालन के आर्थिक विकास के लिए ग्रामीण युवाओं को शामिल करके पशुओं की नस्लों में सुधार करना और युवाओं को रोजगार के अवसर प्रदान करना ।

2. कामधेनु योजना

  • शुरुआत 1997 1998
  • उद्देश्य – गोवंश संबंधित तकनीकों के आधार पर पशु प्रजनन फार्मों की स्थापना करना।

3. ADMAS (पशु रोग निगरानी और निगरानी)

  • शुरुआत 1999
  • उद्देश्य – ICAR (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) के माध्यम से गाय और भैंस की नस्लों को रोग मुक्त बनाना।

4. राजीव गांधी कृषि और पशुपालन विकास मिशन

  • शुरुआत 19 जनवरी, 2010
  • उद्देश्य पशु विकास नीति में निर्धारित उद्देश्यों को पूरा करना।

5. मुख्यमंत्री पशुधन निःशुल्क दवा योजना

  • शुरुआत 15 अगस्त, 2012
  • उद्देश्य राज्य सरकार द्वारा पशु विकास के लिए आवश्यक दवाइयाँ निःशुल्क उपलब्ध कराना

6. अविका कवच योजना

  • शुरुआत 2004, पुनः 2009, पुनः 2018
  • यह भेड़ों की बीमा योजना है, जिसके माध्यम से एस.सी. / एस.टी. और बी.पी.एल. को बीमा प्रीमियम पर 80 प्रतिशत सब्सिडी प्रदान की जाएगी अन्य पशुपालको के लिए 70 प्रतिशत अनुदान प्रदान किया जाएगा।

7. भामाशाह पशु बीमा योजना

  • इसमें बीमा एक या तीन साल का होगा।
  • बीमा राशि में बीपीएल / एस.सी./एस.टी. को 70 प्रतिशत एवं शेष पशु पालकों को 50 प्रतिशत अनुदान दिया जायेगा ।
  • बीमा राशि गाय 40000 रूपये
  • भैंस 50000 रूपये
  • भेड़ / बकरी / सूअर (10 यूनिट) – 50000 रूपये
  • ऊंट / घोड़ा / गधा 50000 रूपये
  • एक परिवार अधिकतम 5 बड़े और 50 छोटे पशुओं का बीमा करवा सकता है।

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interesting facts about india in hindi | भारत के बारे में रोचक तथ्‍य 2022

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Amazing Facts About India in Hindi भारत के कुछ रोचक तथ्य

भारत जैसे महान देश की खूबसूरती कला और संस्कृति के बारे में एक ही आर्टिकल में बताना है असंभव है। हम केवल आपको भारत के कुछ रोचक तथ्यों के बारे में जानकारी देंगे जिनको पढ़ने के बाद आपको भी लगेगा कि भारत को महान क्यों कहा जाता है भारतीय होने के नाते आपको इन बातों को जरूर जान लेना चाहिए।

भारत के कुछ रोचक तथ्य Amazing Facts About India in Hindi

  • शतरंज जिसकी विश्व में काफी लोकप्रियता है इसकी खोज भारत ने ही की है
  • भारत एकमात्र ऐसा देश है जहां हर चीज पर एमआरपी लिखी हुई होती है
  • दुनिया का सबसे बड़ा बर्ड स्टैचू  देश में ही है यह स्टेच्यू केरल राज्य में स्थित है जोकि जटायु की प्रतिमा है यह कुल 30,000 स्क्वायर फीट में है।
जटायु की प्रतिमा
  • भारत की कुल 1600 अलग-अलग भाषाएं हैं 1600 भारतीय भाषाओं में से कुल 122 भाषाओं को प्रमुख माना गया है
  • दोस्तों भारत दुनिया का वह देश है जिसके पास सबसे बड़ा लोकतंत्र है और दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान है जिसको बनाने में कुल 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन का समय लगा था
  • भारत का रेल नेटवर्क एशिया का सबसे बड़ा रेल नेटवर्क है। और दुनिया में अमेरिका के बाद दूसरे नंबर का रेलवे नेटवर्क है
  • अभी तक हुए कबड्डी के सभी 6 वर्ल्ड कप भारत ने ही जीते हैं । है ना भारत महान
  • भारत देश में दुनिया का सबसे बड़ा क्रिकेट स्टेडियम भी है  मोटेरा स्टेडियम, जो अहमदाबाद में 700 करोड़ रुपए की लागत से बनाया गया है।
मोटेरा स्टेडियम
  • दुनिया में सबसे अधिक पोस्ट ऑफिस भारत में ही है कुल 1 लाख 55 हजार
  • भारत के जम्मू कश्मीर में डल झील में दुनिया का पहला तैरता हुआ पोस्ट ऑफिस स्थित है।
तैरता हुआ पोस्ट ऑफिस
  • साप सीढ़ी जैसे मनोरंजक गेम की शुरुआत भारत में ही हुई है।
  • हिंदुस्तान दुनिया का पहला ऐसा देश है जिसने अपने पहले प्रयास में ही मंगल ग्रह पर यान भेज दिया था और चंद्रमा पर पानी की खोज भी भारत ने ही की थी।
  • दुनिया का 11% सोना भारतीय महिलाओं के पास है
  • भारत देश की पवित्र नगरी वाराणसी विश्व का सबसे पुराना शहर है
  • भारत में लगने वाले कुंभ मेले की भीड़ को अंतरिक्ष से भी देखा जा सकता है

भौगोलिक वर्गीकरण के आधार पर राजस्थान के वनों के प्रकार Types of Forests of Rajasthan on the basis of Geographical Classification

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भौगोलिक वर्गीकरण के आधार पर वनों को पाँच भागों में बाँटा गया है

  • उष्णकटिबंधीय कंटीले वन
  • उष्णकटिबंधीय धोंक वन
  • उष्णकटिबंधीय शुष्क मानसूनी वन
  • उष्णकटिबंधीय सागवान वन
  • उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन

(1) उष्णकटिबंधीय कंटीले वन Tropical thorn forest

  • वर्षा – 0 – 30 सेमी.
  • वन क्षेत्र – 6 प्रतिशत
  • विस्तार – शुष्क मरुस्थली क्षेत्र (जैसलमेर, बीकानेर बाडमेर एवं जोधपुर),
  • प्रमुख वन- नागफनी, एलोवेरा, कंटीली झाड़ियाँ
  • महत्व – मरुस्थलीकरण को रोकने में।

(2) उष्णकटिबंधीय धोंक वन tropical dunk forest

  • वर्षा – 30-60 सेमी.
  • वन क्षेत्र – 58 प्रतिशत
  • विस्तार- अर्द्धशुष्क मरूस्थली क्षेत्र (लून-बेसिन, नागौर, शेखावाटी, करौली एवं सवाईमाधोपुर)
  • प्रमुख वन खेजडी, रोहिड़ा, बबूल, बैर एवं कैर
  • महत्व ईंधन की लकड़ी प्राप्त की जाती है।

(3) उष्णकटिबंधीय शुष्क मानसून वन Tropical Dry Monsoon Forest

  • वर्षा- 50
  • वर्षा 80 सेमी.
  • वन क्षेत्र- 28 प्रतिशत
  • विस्तार- अलवर, भरतपुर, करौली, धौलपुर, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा एवं राजसमंद
  • प्रमुख वन साल, सागवान, शीशम, आम एवं चन्दन।
  • महत्व – इन वनों का आर्थिक महत्व सर्वाधिक होता है। उदाहरण- ईमारती लकड़ी के रूप में।

(4) उष्णकटिबंधीय सागवान वन tropical teak forest

  • वर्षा – 75-110 सेमी.
  • वन क्षेत्र – 7 प्रतिशत
  • विस्तार – बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, कोटा एवं झालावाड़
  • प्रमुख वन गुलर, महुआ एवं तेन्दु ।
  • महत्व – औद्योगिक क्षेत्र में उपयोगी।

(5) उष्णकटिबंधीय सदाबहान वन tropical evergreen forest

  • वर्षा – 150 सेमी.
  • वन क्षेत्र – 1 प्रतिशत
  • विस्तार- माउंट आबू
  • प्रमुख वन – डिकल्पटेरा आबू ऐंसिस (अम्बरतरी), जामुन एवं बांस।
  • महत्व – इन वनों में अधिक जैव विविधता पाई जाती है।

OTHER

राजस्थान का अपवाह तंत्र: नदियां/आंतरिक अपवाह की नदिया drainage system of rajasthan – river

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राजस्थान का अपवाह तंत्र ( नदी, झील, परियोजना ), अपवाह तंत्र नोट्स[drainage system of rajasthan]

राजस्थान की अपवाह तंत्र को संगम के आधार पर तीन भागों में बांटा गया है

अपवाह तंत्र drainage system

  • अरब सागर 17%
  • अंतः प्रवाही नदी 60%
  • बंगाल की खाड़ी की नदियां 23%
  1. अरावली को राजस्थान की जल विभाजक रेखा के रूप में जाना जाता है, क्योंकि अरावली राजस्थान के अपवाह तंत्र को दो भागों (पूर्व में बंगाल की खाड़ी एवं पश्चिम में अरब सागर की नदियाँ) में बांटती है।
  2. राजस्थान में अन्तः प्रवाही नंदिया सर्वाधिक है, क्योंकि राजस्थान में मरुस्थल का विस्तार सर्वाधिक है।
  3. भारत के फूल सतही जाल / नदी जल का राजस्थान में 1.18 प्रतिशत है।
  4. भारत के कुल भूमिगत जल का राजस्थान में 1.69 प्रतिशत है।
  5. राजस्थान में कुल नदी बेसिन 15 एवं उप-बेसिन 58 है।

अरब सागर की नदियां

  • लूनी
  • साबरमती
  • माही
  • पश्चिमी बनास

लूनी नदी

> उद्गमः- नाग पहाड़ी (अजमेर)

> संगम:- कच्छ का रण (गुजरात)

> लंबाई:- 495 कि.मी. (राजस्थान में लंबाई- 350 कि.मी.)

>अपवाह तंत्र:- अजमेर, पाली, नागौर,जालोर, बाड़मेर,जोधपुर

> सहायक नदियाँ:- सुकड़ी, जवाई, सांगी, बांडी, खारी, जोजडी, मीठडी, लीलडी, गुड़िया

> नोट:

(1) जोजड़ी:- लूनी में दायीं ओर से आने वाली एकमात्र नदी ।

(2) बांडी:- इसे रासायनिक नदी भी कहा जाता है क्योंकि इस नदी में रंगाई-छपाई उद्योग से आने वाला रासायनिक जल मिलता है।

लूनी नदी विशेषताएँ

1. लूनी के अन्य नाम

  • सागरमती
  • लवणवती
  • आधा मीठा आधा खारी
  • अंत सलिला (कालिदास के अनुसार)

• रेल/नाडा:- जालोर में लूनी के अपवाह क्षेत्र को रेल/नाडा कहा जाता है

2. बालोतरा (बाड़मेर)

  • लूनी नदी में बाढ़ इसी क्षेत्र में आती है।
  • बालोतरा के बाद लूनी नदी का पानी खारा हो जाता है।

3. राजस्थान के कुल अपवाह तंत्र में लूनी नदी का योगदान 10.40 प्रतिशत है।

लूनी मरू प्रदेश में सबसे लंबी नदी है।

4. बांध परियोजना

  1. जसवंत सागर / पिचयाक बांध (लूनी) – जोधपुर
  2. बकली बांध (सुकड़ी) – जालोर
  3. हेमावास बांध (बांडी) पाली
  4. जवाई बांध (जर्जाई) – सुमेरपुर, पाली

5. जवाई बांध

  • यह पाली (सुमेरपुर) में स्थित है।
  • जवाई बांध की जलापूर्ति पाली, जोधपुर, जालौर और सिरोही को की जाती है।
  • इसे मारवाड़ का अमृतसरोवर’ कहा जाता है।
  • जब जवाई बांध में जल स्तर घटता है, तो सेई जल सुरंग से जलापूर्ति होती है।
  • नोट:- सेई सुरंग
  • यह राजस्थान राज्य की पहली जल सुरंग है जो उदयपुर से जवाई बांध तक जलापूर्ति करती है।

माही नदी

  • उद्गम- महेंद झील (अमरेस पहाड़ी-विध्याचल
  • संगम – खंभात की खाडी (गुजरात)
  • लंबाई – 576 किलोमीटर (राजस्थान में 171 किलोमीटर)
  • अपवाह क्षेत्र – बासवाड़ा (सर्वाधिक), डूंगरपुर प्रतापगढ़
  • सहायक नदियाँ अराव, अन्नास, सोम, चाप, मोरेन, जाखम

1. उपनाम

  • आदिवासियों की गंगा
  • कांडल की गंगा
  • वागड की गंगा
  • दक्षिणी राजस्थान की स्वर्ण रेखा नदी ।

2. त्रिवेणी संगम

बेणेश्वर धाम (नवाटापरा डूंगरपुर) – यहां सोम माही और जाखम का संगम होता है। माघ पूर्णिमा को यहाँ मैले का आयोजन किया जाता है जिसे “आदिवासियों का कुंभ कहा जाता है। इस मेले में भील जनजाति सर्वाधिक आती है।

3. सुजलम सुफलाम परियोजनाएं

माही नदी में सफाई के लिए चलाया गया कार्यक्रम

सुजलम परियोजना

बाड़मेर में B.A.R.C. (भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र – ट्रॉम्बे, महाराष्ट्रा) द्वारा चलाई गई पेयजल परियोजना

4. कर्क रेखा को दो बार काटने वाली विश्व की एकमात्र नदी ।

5. माही राजस्थान के दक्षिण से प्रवेश कर पश्चिम की ओर बहने वाली नदी

6. बांध परियोजना

  • माही बजाज सागर- बांसवाड़ा
  • कागदी पिकअप बांध – बांसवाड़ा
  • कड़ाना बांध – गुजरात
  • सोम- कागद परियोजना – उदयपुर
  • सोम-कमला अम्बा – डूंगरपुर
  • जाखम बांध – प्रतापगढ़

माही बजाज सागर बांध

  • स्थिति – बोरखेडा (बांसवाड़ा)
  • लम्बाई- 3109 मीटर

नोट- यह राजस्थान का सबसे लम्बा बांध है, जबकि आदिवासी क्षेत्र व दक्षिणी राजस्थान में सबसे बड़ी परियोजना है।

(ii) जाखम बांध

स्थिति – सीतामाता अभयारण्य (प्रतापगढ़) नोट:- यह राजस्थान का सबसे ऊँचा बांध (81 मीटर) है।

पश्चिमी बनास

  1. उद्गम- नया सानवारा गाँव (सिरोही)
  2. संगम – लिटिल कच्छ (गुजरात)
  3. लम्बाई – 226 किलोमीटर
  4. अपवाह क्षेत्र – सिरोही
  5. सहायक नदियाँ – कुकड़ी, सुकली/सिपु
  6. आबू (सिरोही) और डीसानगर (गुजरात) पश्चिमी बनास के किनारे स्थित है।

साबरमती

  • उद्गम – पदराना हिल्स, उदयपुर
  • संगम- खम्भात की खाड़ी
  • लम्बाई – 416 किलोमीटर (राज. में लम्बाई 45 किलोमीटर).
  • अपवाह क्षेत्र उदयपुर
  • सहायक नदियाँ – वेतरक, सेई, हथमति, मेश्वा, मानसी, वाकल एवं माजम

विशेषताएँ

  • अहमदाबाद साबरमती तथा गांधीनगर, साबरमती नदी के किनारे स्थित है।
  • साबरमती राजस्थान की वह नदी है जिसका मुख्य अपवाह क्षेत्र गुजरात है।

साबरमती पर जल सुरम

सेई जल सुरंगमानसी वाकल जल सुरंग
विस्तार- उदयपुर से पाली
जलापूर्ति- जवाई बांध को
महत्व- राजस्थान की पहली जल सुरंग
विस्तार – उदयपुर
जलापूर्ति – देवास परियोजना / मोहनलाल सुखाड़िया
महत्व – राजस्थान की सबसे लम्बी जलसुरंग

अन्त:प्रवाह नदियाँ

घग्घर नदी

  • उद्गम- कालका पहाड़ी (शिवालिक हिमालय हिमाचल प्रदेश)
  • अपवाह क्षेत्र- हनुमानगढ़ गंगानगर,

विशेषताएँ

1. उपनाम

  • सरस्वती (प्राचीन नाम)
  • मृत नदी
  • नट नदी
  • दृष्टिद्वती

2. घग्घर के अपवाह क्षेत्र को अलग-अलग क्षेत्र में अलग अलग नाम से जाना जाता है।

अपवाह क्षेत्र

  1. नाली / पाट (हनुमानगढ़)
  2. हकरा (पाकिस्तान)

नोट – नाली अपवाह क्षेत्र के पास पाई जाने वाली भेड नस्ल को नाली नस्ल कहा जाता है।

3. हिमालय से राजस्थान आने वाली एकमात्र नदी है।

4 श्री राम वाडरें एवं हनुवंता राय को सरस्वती नदी का प्राचीन मार्ग को खोजने के लिए नियुक्त किया गया।
5. जलपट्टी – जैसलमेर में सरस्वती नदी का भू-गर्भिक जलीय अवशेष, जो पोकरण से मोहनगढ़ के मध्य स्थित है।

6. भारत की सबसे लम्बी अन्तः प्रवाही नदी घग्घर है।

7. फोर्ट अब्बास- पाकिस्तान में घग्घर नदी का अंतिम बिन्दु है, जहां घग्घर नदी में अधिक पानी या बाढ़ आने पर पहुचती है।

कातली (काटली) नदी

  • उद्गम – खंडेला पहाड़ी (सीकर)
  • अपवाह क्षेत्र – सीकर – झुंझुनू

नोट– कातली नदी के अपवाह क्षेत्र को तोरावाटी के नाम से जाना जाता है, जिसका विस्तार सीकर और झुंझुनू में है ।

कातली राजस्थान में सबसे लम्बी अंतः प्रवाही नदी है, जिसकी लम्बाई 100 कि.मी. है।

साबी नदी

  • उद्गम – सेवर पहाड़ी (जयपुर)
  • अपवाह क्षेत्र – जयपुर, अलवर

नोट – साबी राजस्थान की वह नदी जो गुड़गांव मैदान (हरियाणा) में विलिन होती है।

बाणगंगा नदी

  • उद्गम बैराठ जयपुर
  • अपवाह क्षेत्र – जयपुर – दौसा – भरतपुर
  • सहायक नदियाँ सूरी, सेवान, पलासन, गोमती नाला

विशेषताएँ

1. उपनाम

  • अर्जुन की गंगा
  • ताला नदी
  • रुंदित नदी

• वह सहायक नदी जो अपनी मुख्य नदी में गिरने से पहले ही समाप्त हो जाती है, उसे रुण्डित नदी कहते हैं। यह दर्जा बाणगंगा को 2012 में दिया गया।

2. बांध परियोजनाएँ

  • अजान बांध

यह भरतपुर जिले में स्थित है। इस बांध में जल की कमी होने पर इसमें पांचना बांध (करौली) से जलापूर्ति की जाती है। इस से जलापूर्ति केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में की जाती है।

  • रामगढ़ बांध (जयपुर)

बांध परियोजना

अजान बांध (भरतपुर)

रूपारेल / वराह नदी

  • उत्पत्ति – उदयनाथ पहाड़ी (अलवर)
  • अपवाह क्षेत्र:- अलवर, भरतपुर

मोती झील

यह भरतपुर में स्थित मीठे पानी की झील है। जिसके द्वारा सिंचाई के लिए जलापूर्ति की जाती है।इस कारण इसे ‘भरतपुर जिले की जीवन रेखा भी कहा जाता है।

सुजान गंगा

यह एक चैनल है जो मोती झील व लोहागढ़ को जोड़ता है।

काकनी/ काकनेय नदी

  • उपनाम- मसूरदी नदी
  • उद्गम- कोटरी गांव (जैसलमेर)
  • अपवाह क्षेत्र- जैसलमेर
  • बुझ झील यह जैसलमेर में स्थित मीठे पानी की झील है जो काकनी नदी द्वारा निर्मित है।

नोट –

  • सांभर में सर्वाधिक नमक लाने वाली नदी तथा
  • सांभर अभिकेद्रीय नदी प्रतिरूप का उदाहरण है अर्थात् नदियाँ चारों ओर से आकर एक स्थान (सांभर) पर मिलती हैं।
  • बालसन :- पर्वतों में घिरे हुए जल बेसिन / नदी बेसिन को बालसन कहा जाता है। उदाहरण सांभर झील ।

बंगाल की खाड़ी की नदियाँ

  • चम्बल
  • बनास
  • बेड़च
  • गंभीर

चंबल

  • उद्गम :- जानापाव पहाड़ी इंदौर (विंध्यन पर्वतमाला मध्यप्रदेश)
  • संगम – यमुना – इटावा (उत्तर प्रदेश)
  • लम्बाई: 1051 किलोमीटर (राजस्थान में लम्बाई 322 किलोमीटर) पुरानी लम्बाई :- 966 किलोमीटर (राजस्थान में लम्बाई 135 किलोमीटर)
  • अपवाह क्षेत्र: चित्तौड़गढ़:- चम्बल का राजस्थान में प्रवेश (चौरासीगढ़) कोटा. बून्दी एवं डॉग क्षेत्र (करौली, सवाई माधोपुर एवं धौलपुर)
  • सहायक नदियाँ:- गुंजाली, मेज, मांगली, पार्वती, निवाज (नवाज), आहू कालीसिंध, घोड़ा-पछाड़. पवन/ ग्राडोणी यास चाकण, कुन कुराल, सीप

नोट

1. सामेला – आहू व कालीसिंध के संगम को सामेला कहा जाता है। जिसके -किनारे गागरोन दुर्ग स्थित है।

2. बनास – चम्बल की सबसे लम्बी सहायक नदी है।

3. कालीसिंघ – चम्बल में दाईं ओर से सबसे लम्बी सहायक नदी है।

विशेषताएँ

1. चम्बल नदी के उपनाम चर्मण्वती (प्राचीन नाम). कामधेनू, बारहमासी ।

2. त्रिवेणी संगम – रामेश्वरम् घाट- पदरा गाँव (सवाई माधोपुर)

3. चुलिया जलप्रपात

  • स्थिति – भैंसरोड़गढ़ (चित्तौड़गढ़)
  • नदी- चम्बल
  • विशेष:- यह राजस्थान का ‘सबसे ऊँचा’ जल प्रपात है जिसकी ऊँचाई 18 मीटर है।
  • नोट:- कुचीकरण जलप्रपात :- भारत का सबसे ऊँचा (455 मीटर) जलप्रपात जो वाराही नदी : पर कर्नाटक में स्थित है।

4. हैंगिंग ब्रिज:- यह कोटा में चम्बल नदी पर स्थित है जो राजस्थान का एक मात्र हैंगिंग ब्रिज है। जिसकी लम्बाई 1.5 कि.मी. है। यहां से NH27 गुजरता है।

5. चम्बल अंतरराज्यीय सीमा पर (राजस्थान-मध्यप्रदेश) बहने वाली सबसे लम्बी नदी है।

6. चंबल में संरक्षित जीव-जंतु

  • संरक्षित जीव
  • घड़ियाल
  • गांगेय सूस
  • उदबिलाव

7. चम्बल के अवनालिको अपरदन द्वारा उत्खात (Bad Land) भूमि का निर्माण होता है। जिसे बीहड़ / डांग कहा जाता है। जिसका विस्तार- करौली, सवाईमाधोपुर एवं धौलपुर में है।
8. चम्बल की बाँध परियोजना – राजस्थान, मध्यप्रदेश के सहयोग से चम्बल पर तीन चरणों में चार बाँध का निर्माण किया गया।

बाँध की योजना

  • I चरण- गाँधी सागर (मन्दसौर) कोटा बैराज (कोटा)
  • II चरण- राणा प्रताप सागर (चित्तौड़गढ़)
  • III चरण- जवाहर सागर / कोटा बांध (कोटा-बून्दी)

बनास

  • उद्गम :- खमतौर पहाड़ी (राजसमंद)
  • संगम :- चम्बल नदी (रामेश्वरम् घाट – सवाई माधोपुर)
  • लम्बाई : 512 किलोमीटर
  • अपवाह क्षेत्र : मेवाड़ का मैदान (राजसमन्द, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़) मालपुरा – करौली मैदान (अजमेर, टोंक सवाईमाधोपुर)।
  • सहायक नदियाँ :- कालीसिल, डाई, मांसी, बांडी, मोरेल, मैनाल, आयड़, कोठारी एवं खारी ।
  • खारी – बनास की सबसे लंबी नदी है।
  • बेड़च – दाई ओर से बनास नदी की सबसे लंबी सहायक नदी है।
त्रिवेणीअवस्थिति
बनास, बेडच, मेनालबीगोद- भीलवाड़ा
बनास, खारी, डाईराजमहल-टॉक
बनास, चम्बल, सीपरामेश्वरम् घाट सवाईमाधोपुर

बनास की विशेषता

1. बनास के उपनाम

  • वन की आशा / वर्णाशा
  • वशिष्ठी नदी
  • नोट:- बनास राजस्थान में सर्वाधिक त्रिवेणी बनाने वाली नदी है।

3. बनास :- राजस्थान में सर्वाधिक प्रदूषित नदी मानी जाती है।
4. केवल / पूर्णत राजस्थान में बहने वाली सबसे लम्बी नदी बनाते है।

नोट:- चम्बल राजस्थान की सबसे लम्बी नदी है।

5. बांध परियोजना:

  • बीसलपुर बांध – टोंक (बनास)
  • ईसरदा बांध – सवाई माधोपुर (बनास)
  • मोरेल बांध – दौसा (मोरेल)
  • मेजा बांध – भीलवाड़ा (कोठारी)

(i) बीसलपुर बांध (टोंक – बनास)

  • बीसलपुर :- राजस्थान की सबसे बड़ी पेयजल परियोजना है।
  • जलापूर्ति :- टोंक, अजमेर, जयपुर, नागौर, दौसा, सवाई माधोपुर।
  • बीसलपुर राजस्थान का “सबसे बड़ा कंक्रीट बांध है।
  • बीसलपुर राजस्थान के कंजर्वेशन रिजर्व में शामिल है।
  • नदी जोड़ों परियोजना के तहत बीसलपुर बांध को चम्बल नदी से जोड़ा जायेगा।
  • नोट – अमृत क्रांति – नदी जोड़ो परियोजनाओं से संबंधित है।
  • बीसलपुर के अतिरिक्त जल को ईसरदा बांध में छोड़ा जाता है।
  • > बीसलपुर बांध पर रंगीन मछलियों का प्रजनन केंद्रित स्थापित किया गया है।

बेड़च/आयड नदी

  • उद्गम – गोगुड़ा हिल्स – उदयपुर।
  • संगम – बनास (बीगोद – भीलवाड़ा)
  • अपवाह क्षेत्र उदयपुर, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा
  • सहायक नदी गंभीर नदी (जिसका उद्गम-मध्य प्रदेश)

विशेषता

  • उदयसागरः- आयड़ नदी उदयसागर झील में गिरने के बाद बेड़च कहा जाता है
  • चित्तौड़गढ़ दुर्ग बेड़च व गंभीरी नदी के किनारे स्थित है।
  • बेड़च बनास में दांए ओर से मिलने वाली सबसे लम्बी सहायक नदी है।

गंभीर नदी

  • > उद्गम- सपोटरा तहसील (करौली)
  • > संगम – यमुना मैनपुरी (उत्तर प्रदेश)
  • > अपवाह क्षेत्र:- करौली, धौलपुर, भरतपुर सहायक नदियाँ:- अटा, माची, भद्रावती, भैंसावट एवं बरखेड़ा।

विशेषताएँ:

1. पांचना बांध :

  • स्थित :- करौली
  • राजस्थान का “सबसे बड़ा मिट्टी का बांध” ।
  • पाँचवा बांध से जलापूर्ति अजान बांध (केवलादेव भरतपुर) में की जाती नोटः- पांचना बांध गंभीर की पाँच सहायक नदियों पर करौली में निर्मित है। जो राजस्थान का “सबसे बड़ा मिट्टी का बांध है।
  • चम्बल के अलावा सीधे यमुना से मिलने वाली राजस्थान की दूसरी नदी गम्भीर है।

महत्वपूर्ण बिंदु

  • बीकानेर – चुरू :- राजस्थान के वे जिले जहाँ कोई नदी नहीं है।
  • चित्तौड़ – चित्तौड़गढ़ जिले में अधिकतम नदियाँ है ।
  • कोटा संभाग – इस संभाग में सर्वाधिक नदियाँ है।
  • बीकानेर संभाग – इस संभाग में राजस्थान में न्यूनतम नदी है।
  • सर्वाधिक लम्बाई उत्तरी राजस्थान की सबसे लंबी नदी घरघर
  • मरुस्थलीय क्षेत्र या पश्चिमी राजस्थान की सबसे लंबी नदी लूनी
  • दक्षिणी राजस्थान या आदिवासी क्षेत्र की सबसे लंबी नदी माही
  • पूर्वी राजस्थान की सबसे लंबी नदी – चंबल
  • √ केवल / पूर्णतः राजस्थान की सबसे लंबी नदी – बनास

राजस्थान की प्रमुख मुख्य एवं सहायक नदियां

साबीअन्तः प्रवाही नदियां
सागीलूनी की सहायक
मोरेनमाही
मोरेलबनास
पार्वतीचंबल
पार्बतीगभीर
गंभीरयमुना
गंभीरीबेडच
कातलीतोरावाटी
काकनी/ काकनेयजैसलमेर की मसूरदी
सूकड़ीलूनी
सुकलीपश्चिमी बनास
बनासबंगाल की खाड़ी
पश्चिमी बनासअरब सागर
काली सिंध चंबल
काली सिलबनास
मांसीबनास
मानसीवाकल (साबरमती)
रूपारेलअलवर, भरतपुर (मोती झील)
रूपनगढ़अजमेर (सांभर)
बांडी (उद्गम- पाली)लूनी (अरब सागरीय नदी)
बांडी (उद्गम-अजमेर)बनास (बंगाल की खाड़ी)
खारीशेरगाँव पहाड़ी (सिरोही) – लूनी (अरब सागरीय नदी)
खारीनागौर – सांभर (अन्तः प्रवाही नदी)
खारीबिजराल पहाड़ी (राजसमंद) बनास (बंगाल की खाड़ी)
सीपचम्बल
सीपूपश्चिमी बनास

राजस्थान में टांका क्या है

राजस्थान में टांका वर्षा जल को एकत्रित करने हेतु घर या दुर्ग में बनाए गए जलकुंड है। राजस्थान के मारवाड़ व शेखावाटी क्षेत्र में बनाए गए इन टांको में एकत्रित वर्षा जल को पालर पानी कहते हैं जो वर्ष भर पेयजल की पूर्ति करता है।

गिलोय जूस के फायदे benefits of giloy in hindi | benefits of giloy juice

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giloy आज के समय में इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए लोग कई तरह के नुक्से आजमाते है जैसे की दवाइयों और महंगी डाइट को लेना हेल्थ एक्सपर्ट के अनुसार गिलोय की पत्तियों को पानी में उबालकर पीने से इम्यूनिटी को बढ़ाया जा सकता है. बहुत से लोग गिलोय की पत्तियों का जूस बनाकर भी पीते रहते हैं. 

 गिलोय की पत्त‍ियों में  प्रोटीन, कैल्शि‍यम फॉस्फोरस पर्याप्त मात्रा में मौजूद होते है जो की अपनी इम्युनिटी को मजबूत करने में सहायक होते है . इसके तनों में स्टार्च की बहुत अधिक मात्रा होती है. गिलोय की पत्त‍ियां पान के पत्तो के समान होती हैं. ये एक सुपर पावर ड्रिंक है, जो इम्यून सिस्टम को बूस्ट करने के साथ-साथ कई खतरनाक बीमारियों से लड़ने में सहायक होता है और साथ में ही बॉडी की सुरक्षा भी करता है. 

उपापचय क्रियाऔ ,जुकाम खांसी,  बुखार समस्या के अलावा भी ये कई बड़ी बीमारियों से आपकी रक्षा कर सकता है. आप उबले पानी या जूस के अलावा काढ़ा, चाय या कॉफी में भी इसका उपयोग कर सकते हैं. गिलोय के पत्तों को एक बेहतरीन आयुर्वेदिक उपचार माना गया हैं.

गिलोय के फायदे benefits of giloy

1.एनीमिया में फायदेमंद गिलोय Beneficial Giloy in Anemia

गिलोय एनीमिया रोग से लड़ने में सहायक होता है. इसे शहद और घी के साथ मिलाकर लेने से रक्त की कमी दूर होती है.

2 .एलर्जी में फायदेमंद गिलोय Giloy beneficial in allergies

हाथ-पैरों में जलन या स्किन एलर्जी में भी गिलोय बहुत फयदेमंद साबित होता है इसलिए इस बीमारी से परेशान लोग इसे डाइट में शामिल कर सकते हैं. ऐसे लोगों के लिए गिलोय बहुत फायदेमंद है. गिलोय की पत्त‍ियों को पीसकर उसका पेस्ट तैयार कर लें और उसे सुबह-शाम हाथ और पैरो पर लगाएं.

3. पीलिया रोग में फायदेमंद गिलोय Giloy beneficial in jaundice

पीलिया रोग के मरीजों के लिए भी गिलोय के पत्ते बहुत फायदेमंद होते है. कुछ लोग इसे चूर्ण के रूप में लेते हैं तो कुछ इसकी पत्त‍ियों को पानी में उबालकर लेते है 

4. एसिडिटी और गैस में फायदेमंद गिलोय Giloy is beneficial in acidity and gas

इससे एसिडिटी और गैस की समस्या नहीं होती है , इसके प्रयोग से पेट से जुड़ी हुई कई बीमारियों से  निजात पाया जा सकता है. और ये पाचन क्रिया को भी दुरुस्त रखता  है

5. बुखार और सर्दी में फायदेमंद गिलोय Giloy beneficial in fever and cold

गिलोय का इस्तेमाल बुखार और सर्दी दूर करने और कोरोना जैसी गंभीर बीमारियों से लड़ने की क्षमता प्रदान करता है.  गिलोय की पत्त‍ियों का काढ़ा पीना फायदेमंद होता है | 

Srishti Dixit (YouTuber) Height, Age, Boyfriend, Family, Biography & More 2022 | सृष्टि दीक्षित का जीवन परिचय

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सृष्टि दीक्षित का जीवन परिचय Srishti Dixit (YouTuber) wiki, Height, Age, Boyfriend, Family, Biography & More

Quick Info→

Hometown: Kanpur

Age: 27 Years

Education: Graduation

Srishti Dixit Bio/Wiki
पेशा Profession अभिनेत्री और लेखक actress and writer
Srishti Dixit Physical Stats & More
ऊंचाई (लगभग) Height (approx.) 170 cm
1.70 m
5’ 7”
आंख का रंग Eye Colour काला Black
बालों का रंग Hair Colour काला Black
सृष्टि दीक्षित निजी जीवन Personal Life
जन्म की तारीख Date of Birth Year 1993
जन्मस्थान Birthplace कानपुर, उत्तर प्रदेश Kanpur, Uttar Pradesh
राष्ट्रीयता Nationality भारतीय Indian
गृहनगर Hometown Kanpur, Uttar Pradesh
कॉलेज/विश्वविद्यालय College/University मिरांडा हाउस, दिल्ली Miranda House, Delhi
शैक्षिक योग्यता Educational Qualification अंग्रेजी साहित्य में स्नातक Graduation in English Literature
सृष्टि दीक्षित रिश्ते Srishti Dixit Relationships & More
वैवाहिक स्थिति Marital Status अविवाहित Unmarried
अफेयर्स Affairs/Boyfriends Not Known
सृष्टि दीक्षित परिवार Srishti Dixit Family
पति Husband/Spouse N/A
माता-पिता Parents माता-पिता के नाम ज्ञात नहीं Names Not Known
सृष्टि दीक्षित पसंदीदा चीजें Srishti Dixit Favourite Things
मॉडल Model रोज़ी हंटिंगटन-व्हाइटली Rosie Huntington-Whiteley
गाना Song बेयोंसे का गाना ‘नाइस’ ‘Nice’ by Beyonce
गायक Singer कार्डी बी Cardi B
Parents

सृष्टि दीक्षित के बारे में रोचक तथ्य

  • सृष्टि दीक्षित एक लोकप्रिय भारतीय YouTuber हैं, जो मुख्य रूप से कॉमिक वीडियो में काम करती हैं।
  • उनका जन्म और पालन-पोषण कानपुर में हुआ था
  • दिल्ली से स्नातक करने के बाद ‘बॉलीवुड लाइफ’ के लिए एक मनोरंजन पत्रकार के रूप में काम करना शुरू किया था ।
  • उन्होंने तीन वर्षों तक ये काम किया, और फिर वह बॉलीवुड सामग्री लेखक के रूप में ‘बज़फीड’ में शामिल हो गईं।
  • बाद में, वह YouTube पर BuzzFeed के वीडियो में एक अभिनेत्री के रूप में काम करने लगीं।
Srishti Dixit in Behensplainling

वह ‘ऑन एयर विद एआईबी’ (2015) और ‘ब्रेक ए लेग’ (2018) के वीडियो में भी काम कर चुकी हैं।

उन्हें अपने YouTube वीडियो, “इफ यू एक्टेड लाइक पू इन रियल लाइफ” (2017) से लोकप्रियता प्राप्त की है।

Anjali Arora Wiki, Height, Age, Boyfriend, Family, Biography & More 2022

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Anjali Arora Wiki, Height, Age, Boyfriend, Family, Biography & More

अंजलि अरोड़ा भारतीय मॉडल और अभिनेत्री हैं। अंजलि अपने लिप सिंक वीडियो के कारण चर्चा में रहती हैं वह विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्टिव रहती हैं। अंजलि ‘कच्चा बादाम’ गाने पर अपना डांस वीडियो इंटरनेट पर वायरल होने के बाद से सुर्खियों में आईं है।

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अंजलि अरोड़ा का जीवन परिचय Anjali Arora Wiki/Biography

अंजलि अरोड़ा का जन्म दिल्ली में बुधवार, 3 नवंबर 1999 को हुआ था, अंजलि अरोड़ा की राशि वृश्चिक है। उन्होंने अपनी प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा दिल्ली के पब्लिक स्कूल से की है। इनको बचपन से ही अभिनय और नाटक में इंटरेस्ट था।

Anjali Arora Personal Life
Date of Birth 3 November 1999 (Wednesday)
Age (as of 2021) 22 Years
Birth place Delhi, India
Zodiac sign Scorpio
Nationality Indian
Hometown Delhi, India
Hobbies Travelling, Cooking

Anjali Arora Physical Appearance

Height (approx.)-: 5′ 8″

Weight (approx.)-: 54 Kg

Figure Measurements (approx.)-: 36-25-35

Eye Colou-: Brown

Hair Colour-: Brown

Anjali Arora Family Parents & Siblings

अंजलि अरोड़ा का जन्म दिल्ली में अश्विनी अरोड़ा और शैली अरोड़ा के घर हुआ था। अंजलि अरोड़ा का एक छोटा भाई है जिसका नाम वंश अरोड़ा है।

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Relationships/Affairs

अंजलि अरोड़ा डिजिटल क्रिएटर आकाश संसनवाल के साथ रिलेशनशिप में हैं.

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अंजलि अरोड़ा के बारे में कुछ रोचक तथ्य Some Lesser Known Facts About Anjali Arora

https://youtu.be/v8A8qmsas08
  • अंजलि अरोड़ा एक भारतीय मॉडल और अभिनेत्री हैं। वह अस्थायी प्यार, तेरे बरगी – दिलेर खरकिया, आशिक पुराण और PAUNE 12 सहित कई सारे हिट पंजाबी गानों में अभिनय के लिए जानी जाती हैं।
  • अरोड़ा ने अपने इंस्टाग्राम पर एक डांसिंग वीडियो ‘कच्चा बादाम’ पोस्ट करने के बाद प्रसिद्धि पाई, इस वीडियो के बाद सोशल मीडिया हैंडल पर 10 मिलियन से ज्यादा फॉलोअर्स  बढ़ गए थे
  • अंजलि को बचपन से ही अभिनय और मॉडलिंग का शौक था और इसमें अपना करियर बनाने के लिए उन्होंने बहुत कम उम्र में मॉडलिंग शुरू कर दी थी।
  • अंजलि अरोड़ा एक वह एक पशु प्रेमी है और उसके घर पर एक पालतू कुत्ता है
  • अंजलि अरोड़ा को यात्रा करना और विभिन्न साहसिक खेलों का प्रदर्शन करना बेहद पसंद है। वह 8 से अधिक देशों की यात्रा कर चुकी हैं।
  • अंजलि का एक YouTube चैनल है जिसका नाम ‘अंजलि अरोड़ा’ है, इस चैनल पर वह अपने दैनिक जीवन की दिनचर्या को अपने YouTube व्लॉग्स के माध्यम से अपने प्रशंसकों के साथ साझा करती है।
  • उनका ड्रीम डेस्टिनेशन केदारनाथ है और वह 2018 में केदारनाथ गईं, लेकिन कुछ स्वास्थ्य समस्याओं के कारण मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकीं।
https://www.youtube.com/shorts/apjmcwfQEvE?feature=share

दो बैलों की कथा – मुंशी प्रेमचंद

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दो बैलों की कथा – मुंशी प्रेमचंद

प्रेमचंद का जन्म सन् 1880 में बनारस के लमही गाँव में हुआ था। उनका मूल नाम धनपत राय था। प्रेमचंद का बचपन अभावों में बीता और शिक्षा बी. ए. तक ही हो पाई। उन्होंने शिक्षा विभाग में नौकरी की परंतु असहयोग आंदोलन में सक्रिय भाग लेने के लिए सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और लेखन कार्य के प्रति पूरी तरह समर्पित हो गए। सन् 1936 में इस महान कथाकार का देहांत हो गया।

प्रेमचंद की कहानियाँ मानसरोवर के आठ भागों में संकलित हैं। सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, कायाकल्प, निर्मला, गबन, कर्मभूमि, गोदान उनके प्रमुख उपन्यास हैं। उन्होंने हंस, जागरण, माधुरी आदि पत्रिकाओं का संपादन भी किया। कथा साहित्य के अतिरिक्त प्रेमचंद ने निबंध एवं अन्य प्रकार का गद्य लेखन भी प्रचुर मात्रा में किया। प्रेमचंद साहित्य को सामाजिक परिवर्तन का सशक्त माध्यम मानते थे। उन्होंने जिस गाँव और शहर के परिवेश को देखा और जिया उसकी अभिव्यक्ति उनके कथा साहित्य में मिलती है। किसानों और मजदूरों की दयनीय स्थिति, दलितों का शोषण, समाज में स्त्री की दुर्दशा और स्वाधीनता आंदोलन आदि उनकी रचनाओं के मूल विषय हैं।

प्रेमचंद के कथा साहित्य का संसार बहुत व्यापक है। उसमें मनुष्य ही नहीं पशु-पक्षियों को भी अद्भुत आत्मीयता मिली है। बड़ी से बड़ी बात को सरल भाषा में सीधे और संक्षेप में कहना प्रेमचंद के लेखन की प्रमुख विशेषता है। उनकी भाषा सरल, सजीव एवं मुहावरेदार है तथा उन्होंने लोक प्रचलित शब्दों का प्रयोग कुशलतापूर्वक किया है।दो बैलों की कथा के माध्यम से प्रेमचंद ने कृषक समाज और पशुओं के भावात्मक संबंध का वर्णन किया है। इस कहानी में उन्होंने यह भी बताया है कि स्वतंत्रता सहज में नहीं मिलती, उसके लिए बार-बार संघर्ष करना पड़ता है। इस प्रकार परोक्ष रूप से यह कहानी आज़ादी के आंदोलन की भावना से जुड़ी है। इसके साथ ही इस कहानी में प्रेमचंद ने पंचतंत्र और हितोपदेश की कथा-परंपरा का उपयोग और विकास किया है।

दो बैलों की कथा

जानवरों में गधा सबसे ज्यादा बुद्धिहीन समझा जाता है। हम जब किसी आदमी को परले दरजे का बेवकूफ़ कहना चाहते हैं, तो उसे गधा कहते हैं। गधा सचमुच बेवकूफ़ है, या उसके सीधेपन, उसकी निरापद सहिष्णुता ने उसे यह पदवी दे दी है, इसका निश्चय नहीं किया जा सकता। गायें सींग मारती हैं, ब्याई हुई गाय तो अनायास ही सिंहनी का रूप धारण कर लेती है। कुत्ता भी बहुत गरीब जानवर है, लेकिन कभी-कभी उसे भी क्रोध आ ही जाता है; किंतु गधे को कभी क्रोध करते नहीं सुना, न देखा । जितना चाहो गरीब को मारो, चाहे जैसी खराब, सड़ी हुई घास सामने डाल दो, उसके चेहरे पर कभी असंतोष की छाया भी न दिखाई देगी। वैशाख में चाहे एकाध बार कुलेल कर लेता हो; पर हमने तो उसे कभी खुश होते नहीं देखा। उसके चेहरे पर एक विषाद स्थायी रूप से छाया रहता है। सुख-दुख, हानि-लाभ, किसी भी दशा में उसे बदलते नहीं देखा। ऋषियों-मुनियों के जितने गुण है वे सभी उसमें पराकाष्ठा को पहुँच गए हैं; पर आदमी उसे बेवकूफ़ कहता है। सद्गुणों का इतना अनादर कहीं नहीं देखा । कदाचित सीधापन संसार के लिए उपयुक्त नहीं है। देखिए न, भारतवासियों की अफ्रीका में क्या दुर्दशा हो रही है? क्यों अमरीका में उन्हें घुसने नहीं दिया जाता? बेचारे शराब नहीं पीते चार पैसे कुसमय के लिए बचाकर रखते हैं, जी तोड़कर काम करते हैं, किसी से लड़ाई-झगड़ा नहीं करते, चार बातें सुनकर गम खा जाते हैं फिर भी बदनाम हैं। कहा जाता है, वे जीवन के आदर्श को नीचा करते हैं। अगर वे भी ईंट का जवाब पत्थर से देना सीख जाते तो शायद

सभ्य कहलाने लगते। जापान की मिसाल सामने है। एक ही विजय ने उसे संसार की सभ्य जातियों में गण्य बना दिया।

लेकिन गधे का एक छोटा भाई और भी है, जो उससे कम ही गधा है, और वह है ‘बैल’। जिस अर्थ में हम गधे का प्रयोग करते हैं, कुछ उसी से मिलते-जुलते अर्थ में ‘बछिया के ताऊ’ का भी प्रयोग करते हैं। कुछ लोग बैल को शायद बेवकूफ़ों में सर्वश्रेष्ठ कहेंगे; मगर हमारा विचार ऐसा नहीं है। बैल कभी-कभी मारता भी है, कभी-कभी अड़ियल बैल भी देखने में आता है। और भी कई रीतियों से अपना असंतोष प्रकट कर देता है; अतएव उसका स्थान गधे से नीचा है।

झूरी काछी के दोनों बैलों के नाम थे हीरा और मोती। दोनों पछाईं जाति के थे-देखने में सुंदर, काम में चौकस, डील में ऊँचे । बहुत दिनों साथ रहते-रहते दोनों में भाईचारा हो गया था। दोनों आमने-सामने या आस-पास बैठे हुए एक-दूसरे से मूक- भाषा में विचार-विनिमय करते थे। एक दूसरे के मन की बात कैसे समझ जाता था, हम नहीं कह सकते। अवश्य ही उनमें कोई ऐसी गुप्त शक्ति थी, जिससे जीवों में श्रेष्ठता का दावा करने वाला मनुष्य वंचित है। दोनों एक-दूसरे को चाटकर और सूँघकर अपना प्रेम प्रकट करते, कभी-कभी दोनों सींग भी मिला लिया करते थे-विग्रह के नाते से नहीं, केवल विनोद के भाव से, आत्मीयता के भाव से, जैसे दोस्तों में घनिष्ठता होते ही धौल धप्पा होने लगता है। इसके बिना दोस्ती कुछ फुसफुसी, कुछ हलकी-सी रहती है, जिस पर ज्यादा विश्वास नहीं किया जा सकता । जिस वक्त ये दोनों बैल हल या गाड़ी में जोत दिए जाते और गरदन हिला-हिलाकर चलते, उस वक्त हर एक की यही चेष्टा होती थी कि ज़्यादा-से-ज्यादा बोझ मेरी ही गरदन पर रहे। दिन-भर के बाद दोपहर या संध्या को दोनों खुलते, तो एक-दूसरे को चाट-चूटकर अपनी थकान मिटा लिया करते। नाँद में खली-भूसा पड़ जाने के बाद दोनों साथ उठते, साथ नाँद में मुँह डालते और साथ ही बैठते थे। एक मुँह हटा लेता, तो दूसरा भी हटा लेता था ।

संयोग की बात, झूरी ने एक बार गोई को ससुराल भेज दिया। बैलों को क्या मालूम, वे क्यों भेजे जा रहे हैं। समझे, मालिक ने हमें बेच दिया। अपना यों बेचा जाना उन्हें

अच्छा लगा या बुरा, कौन जाने पर झूरी के साले गया को घर तक गोईं ले जाने , में दाँतों पसीना आ गया। पीछे से हाँकता तो दोनों दाएँ-बाएँ भागते, पगहिया पकड़कर आगे से खींचता, तो दोनों पीछे को ज़ोर लगाते। मारता तो दोनों सींग नीचे करके हुँकारते। अगर ईश्वर ने उन्हें वाणी दी होती, तो झूरी से पूछते – तुम हम गरीबों को क्यों निकाल रहे हो? हमने तो तुम्हारी सेवा करने में कोई कसर नहीं उठा रखी। अगर इतनी मेहनत से काम न चलता था तो और काम ले लेते। हमें तो तुम्हारी चाकरी में मर जाना कबूल था। हमने कभी दाने चारे की शिकायत नहीं की। तुमने जो कुछ खिलाया, वह सिर झुकाकर खा लिया, फिर तुमने हमें इस ज़ालिम के हाथ क्यों बेच दिया ?

संध्या समय दोनों बैल अपने नए स्थान पर पहुँचे । दिन-भर के भूखे थे, लेकिन जब नाँद में लगाए गए, तो एक ने भी उसमें मुँह न डाला। दिल भारी हो रहा था । जिसे उन्होंने अपना घर समझ रखा था, वह आज उनसे छूट गया था। यह नया घर, नया गाँव, नए आदमी, उन्हें बेगानों से लगते थे।

दोनों ने अपनी मूक- भाषा में सलाह की, एक-दूसरे को कनखियों से देखा और लेट गए। जब गाँव में सोता पड़ गया, तो दोनों ने जोर मारकर पगहे तुड़ा डाले और घर की तरफ़ चले। पगहे बहुत मज़बूत थे। अनुमान न हो सकता था कि कोई बैल उन्हें तोड़ सकेगा; पर इन दोनों में इस समय दूनी शक्ति आ गई थी। एक-एक झटके में रस्सियाँ टूट गईं।

झूरी प्रात:काल सोकर उठा तो देखा कि दोनों बैल चरनी पर खड़े हैं। दोनों की गरदनों में आधा-आधा गराँव लटक रहा है। घुटने तक पाँव कीचड़ से भरे हैं और दोनों की आँखों में विद्रोहमय स्नेह झलक रहा है।

झूरी बैलों को देखकर स्नेह से गद्गद हो गया। दौड़कर उन्हें गले लगा लिया । प्रेमालिंगन और चुंबन का वह दृश्य बड़ा ही मनोहर था।

घर और गाँव के लड़के जमा हो गए और तालियाँ बजा-बजाकर उनका स्वागत करने लगे। गाँव के इतिहास में यह घटना अभूतपूर्व न होने पर भी महत्वपूर्ण थी। बाल – सभा ने निश्चय किया, दोनों पशु-वीरों को अभिनंदन-पत्र देना चाहिए। कोई अपने घर से रोटियाँ लाया, कोई गुड़, कोई चोकर, कोई भूसी।

एक बालक ने कहा- ऐसे बैल किसी के पास न होंगे। दूसरे ने समर्थन किया- इतनी दूर से दोनों अकेले चले आए। तीसरा बोला – बैल नहीं हैं वे, उस जनम के आदमी हैं। इसका प्रतिवाद करने का किसी को साहस न हुआ। झूरी की स्त्री ने बैलों को द्वार पर देखा, तो जल उठी । बोली- कैसे नमकहराम बैल हैं कि एक दिन वहाँ काम न किया; भाग खड़े हुए।

झूरी अपने बैलों पर यह आक्षेप न सुन सका- नमकहराम क्यों हैं? चारा – दाना न दिया होगा, तो क्या करते?

स्त्री ने रोब के साथ कहा- बस, तुम्हीं तो बैलों को खिलाना जानते हो, और तो सभी पानी पिला-पिलाकर रखते हैं। झूरी ने चिढ़ाया- चारा मिलता तो क्यों भागते ?

स्त्री चिढ़ी – भागे इसलिए कि वे लोग तुम जैसे बुद्धओं की तरह बैलों को – सहलाते नहीं। खिलाते हैं, तो रगड़कर जोतते भी हैं। ये दोनों ठहरे कामचोर, भाग निकले। अब देखूँ, कहाँ से खली और चोकर मिलता है ! सूखे भूसे के सिवा कुछ

मैं इसे नहीं दूँगा, चाहे वे खाएँ या मरें।

वही हुआ। मजूर को कड़ी ताकीद कर दी गई कि बैलों को खाली सूखा भूसा दिया जाए।

बैलों ने नाँद में मुँह डाला, तो फीका-फीका । न कोई चिकनाहट, न कोई रस ! क्या खाएँ? आशा भरी आँखों से द्वार की ओर ताकने लगे। झूरी ने मजूर से कहा- थोड़ी-सी खली क्यों नहीं डाल देता बे? ‘मालकिन मुझे मार ही डालेंगी । ‘

‘चुराकर डाल आ । ‘

‘न दादा, पीछे से तुम भी उन्हीं की-सी कहोगे ।

दूसरे दिन झूरी का साला फिर आया और बैलों को ले चला। अबकी उसने दोनों को गाड़ी में जोता ।

दो-चार बार मोती ने गाड़ी को सड़क की खाई में गिराना चाहा; पर हीरा ने संभाल लिया। वह ज्यादा सहनशील था।

संध्या-समय घर पहुँचकर उसने दोनों को मोटी रस्सियों से बाँधा और कल की शरारत का मज़ा चखाया। फिर वही सूखा भूसा डाल दिया। अपने दोनों बैलों को खली, चूनी सब कुछ दी।

दोनों बैलों का ऐसा अपमान कभी न हुआ था। झूरी इन्हें फूल की छड़ी से भी न छूता था। उसकी टिटकार पर दोनों उड़ने लगते थे। यहाँ मार पड़ी। आहत सम्मान की व्यथा तो थी ही, उस पर मिला सूखा भूसा ! नाँद की तरफ आँखें तक न उठाई।

दूसरे दिन गया ने बैलों को हल में जोता, पर इन दोनों ने जैसे पाँव न उठाने की कसम खा ली थी। वह मारते-मारते थक गया; पर दोनों ने पाँव न उठाया। एक बार जब उस निर्दयी ने हीरा की नाक पर खूब डंडे जमाए, तो मोती का गुस्सा काबू के बाहर हो गया । हल लेकर भागा। हल, रस्सी, जुआ, जोत, सब टूट-टाट कर बराबर हो गया। गले में बड़ी-बड़ी रस्सियाँ न होतीं, तो दोनों पकड़ाई में न आते।

हीरा ने मूक- भाषा में कहा – भागना व्यर्थ है।

मोती ने उत्तर दिया- तुम्हारी तो इसने जान ही ले ली थी।

‘अबकी बड़ी मार पड़ेगी । ‘

‘ पड़ने दो, बैल का जन्म लिया है, तो मार से कहाँ तक बचेंगे?’ ‘गया दो आदमियों के साथ दौड़ा आ रहा है। दोनों के हाथों में लाठियाँ हैं । ‘ मोती बोला- कहो तो दिखा दूँ कुछ मज़ा मैं भी । लाठी लेकर आ रहा है। हीरा ने समझाया नहीं भाई ! खड़े हो जाओ ।

‘मुझे मारेगा, तो मैं भी एक-दो को गिरा दूँगा !

‘नहीं। हमारी जाति का यह धर्म नहीं है। ‘

मोती दिल में ऐंठकर रह गया। गया आ पहुँचा और दोनों को पकड़ कर ले चला। कुशल हुई कि उसने इस वक्त मारपीट न की, नहीं तो मोती भी पलट पड़ता। उसके तेवर देखकर गया और उसके सहायक समझ गए कि इस वक्त टाल जाना ही मसलहत है।

आज दोनों के सामने फिर वही सूखा भूसा लाया गया। दोनों चुपचाप खड़े रहे। घर के लोग भोजन करने लगे। उस वक्त छोटी-सी लड़की दो रोटियाँ लिए निकली, और दोनों के मुँह में देकर चली गई। उस एक रोटी से इनकी भूख तो क्या शांत होती; पर दोनों के हृदय को मानो भोजन मिल गया । यहाँ भी किसी सज्जन का वास है। लड़की भैरो की थी। उसकी माँ मर चुकी थी । सौतेली माँ उसे मारती रहती थी, इसलिए इन बैलों से उसे एक प्रकार की आत्मीयता हो गई थी।

दोनों दिन-भर जोते जाते, डंडे खाते, अड़ते। शाम को थान पर बाँध दिए जाते और रात को वही बालिका उन्हें दो रोटियाँ खिला जाती ।

प्रेम के इस प्रसाद की यह बरकत थी कि दो-दो गाल सूखा भूसा खाकर भी दोनों दुर्बल न होते थे, मगर दोनों की आँखों में, रोम-रोम में विद्रोह भरा हुआ था। एक दिन मोती ने मूक- भाषा में कहा- अब तो नहीं सहा जाता, हीरा !

‘क्या करना चाहते हो?”

‘एकाध को सींगों पर उठाकर फेंक दूँगा । ‘

‘लेकिन जानते हो, वह प्यारी लड़की, जो हमें रोटियाँ खिलाती है, उसी की लड़की है, जो इस घर का मालिक है। यह बेचारी अनाथ न हो जाएगी?’

‘तो मालकिन को न फेंक दूँ। वही तो उस लड़की को मारती है। ‘ ‘लेकिन औरत जात पर सींग चलाना मना है, यह भूले जाते हो । ‘ ‘तुम तो किसी तरह निकलने ही नहीं देते। बताओ, तुड़ाकर भाग चलें।’ ‘हाँ, यह मैं स्वीकार करता हूँ, लेकिन इतनी मोटी रस्सी टूटेगी कैसे?”

‘इसका एक उपाय है। पहले रस्सी को थोड़ा-सा चबा लो। फिर एक झटके में जाती है। ‘

रात को जब बालिका रोटियाँ खिलाकर चली गई, दोनों रस्सियाँ चबाने लगे, पर मोटी रस्सी मुँह में न आती थी। बेचारे बार – बार ज़ोर लगाकर रह जाते थे । सहसा घर का द्वार खुला और वही लड़की निकली। दोनों सिर झुकाकर उसका हाथ चाटने लगे। दोनों की पूँछें खड़ी हो गईं। उसने उनके माथे सहलाए और बोली खोले देती हूँ। चुपके से भाग जाओ, नहीं तो यहाँ लोग मार डालेंगे। आज घर में सलाह हो रही है कि इनकी नाकों में नाथ डाल दी जाए। उसने गाँव खोल दिया, पर दोनों चुपचाप खड़े रहे। मोती ने अपनी भाषा में पूछा- अब चलते क्यों नहीं?

हीरा ने कहा- चलें तो लेकिन कल इस अनाथ पर आफत आएगी। सब इसी पर संदेह करेंगे। सहसा बालिका चिल्लाई- दोनों फूफावाले बैल भागे जा रहे हैं। ओ दादा ! दादा ! दोनों बैल भागे जा रहे हैं, जल्दी दौड़ो |

गया हड़बड़ाकर भीतर से निकला और बैलों को पकड़ने चला। वे दोनों भागे । गया ने पीछा किया। और भी तेज़ हुए। गया ने शोर मचाया। फिर गाँव के कुछ आदमियों को भी साथ लेने के लिए लौटा। दोनों मित्रों को भागने का मौका मिल गया। सीधे दौड़ते चले गए। यहाँ तक कि मार्ग का ज्ञान न रहा। जिस परिचित मार्ग से आए थे, उसका यहाँ पता न था। नए-नए गाँव मिलने लगे। तब दोनों एक खेत के किनारे खड़े होकर सोचने लगे, अब क्या करना चाहिए ।

हीरा ने कहा- मालूम होता है, राह भूल गए।

‘तुम भी बेतहाशा भागे। वहीं उसे मार गिराना था । ‘

‘उसे मार गिराते तो दुनिया क्या कहती? वह अपना धर्म छोड़ दे, लेकिन हम अपना धर्म क्यों छोड़ें?’

दोनों भूख से व्याकुल हो रहे थे। खेत में मटर खड़ी थी। चरने लगे। रह-रहकर आहट ले लेते थे, कोई आता तो नहीं है।

जब पेट भर गया, दोनों ने आज़ादी का अनुभव किया, तो मस्त होकर उछलने-कूदने लगे। पहले दोनों ने डकार ली। फिर सींग मिलाए और एक-दूसरे को ठेलने लगे। मोती ने हीरा को कई कदम पीछे हटा दिया, यहाँ तक कि वह खाई में गिर गया। तब उसे भी क्रोध आया। संभलकर उठा और फिर मोती से मिल गया। मोती ने देखा – खेल में झगड़ा हुआ चाहता है, तो किनारे हट गया।

अरे! यह क्या? कोई साँड डौंकता चला आ रहा है। हाँ, साँड ही है। वह सामने आ “अरे! पहुँचा। दोनों मित्र बगलें झाँक रहे हैं। साँड पूरा हाथी है। उससे भिड़ना जान से हाथ धोना है; लेकिन न भिड़ने पर भी जान बचती नहीं नज़र आती । इन्हीं की तरफ़ आ भी रहा है। कितनी भयंकर सूरत है !

मोती ने मूक- भाषा में कहा- बुरे फँसे । जान बचेगी ? कोई उपाय सोचो। हीरा ने चिंतित स्वर में कहा- अपने घमंड में भूला हुआ है। आरजू-विनती न सुनेगा । ‘भाग क्यों न चलें?”

‘ भागना कायरता है। ‘

‘तो फिर यहीं मरो। बंदा तो नौ दो ग्यारह होता है।’

‘और जो दौड़ाए?’

‘तो फिर कोई उपाय सोचो जल्द ! ‘

‘उपाय यही है कि उस पर दोनों जने एक साथ चोट करें? मैं आगे से रगेदता

हूँ, तुम पीछे से रगेदो, दोहरी मार पड़ेगी, तो भाग खड़ा होगा। मेरी ओर झपटे, तुम बगल से उसके पेट में सींग घुसेड़ देना। जान जोखिम है; पर दूसरा उपाय नहीं है । ‘ दोनों मित्र जान हथेलियों पर लेकर लपके। साँड को भी संगठित शत्रुओं से लड़ने का तजरबा न था । वह तो एक शत्रु से मल्लयुद्ध करने का आदी था। ज्यों ही हीरा पर झपटा, मोती ने पीछे से दौड़ाया। साँड उसकी तरफ़ मुड़ा, तो हीरा ने रगेदा । साँड चाहता था कि एक-एक करके दोनों को गिरा ले; पर ये दोनों भी उस्ताद थे। उसे वह अवसर न देते थे। एक बार साँड झल्लाकर हीरा का अंत कर देने के लिए चला कि मोती ने बगल से आकर पेट में सींग भोंक दिया। साँड क्रोध में आकर पीछे फिरा तो हीरा ने दूसरे पहलू में सींग चुभा दिया। आखिर बेचारा ज़ख्मी होकर भागा और दोनों मित्रों ने दूर तक उसका पीछा किया। यहाँ तक कि साँड बेदम होकर गिर पड़ा।

तब दोनों ने उसे छोड़ दिया।

दोनों मित्र विजय के नशे में झूमते चले जाते थे ।

मोती ने अपनी सांकेतिक भाषा में कहा-मेरा जी तो चाहता था कि बच्चा को

मार ही डालूँ ।

हीरा ने तिरस्कार किया – गिरे हुए बैरी पर सींग न चलाना चाहिए । ‘यह सब ढोंग है। बैरी को ऐसा मारना चाहिए कि फिर न उठे । ‘

‘अब घर कैसे पहुँचेंगे, वह सोचो। ‘

‘पहले कुछ खा लें, तो सोचें । ‘

सामने मटर का खेत था ही। मोती उसमें घुस गया। हीरा मना करता रहा, पर उसने एक न सुनी। अभी दो ही चार ग्रास खाए थे कि दो आदमी लाठियाँ लिए दौड़ पड़े और दोनों मित्रों को घेर लिया। हीरा तो मेड़ पर था, निकल गया। मोती सींचे हुए

खेत में था। उसके खुर कीचड़ में धँसने लगे। न भाग सका। पकड़ लिया। हीरा ने देखा, संगी संकट में हैं, तो लौट पड़ा। फँसेंगे तो दोनों फँसेंगे। रखवालों ने उसे भी पकड़ लिया।

प्रात:काल दोनों मित्र कांजीहौस में बंद कर दिए गए।

दोनों मित्रों को जीवन में पहली बार ऐसा साबिका पड़ा कि सारा दिन बीत गया और खाने को एक तिनका भी न मिला। समझ ही में न आता था, यह कैसा स्वामी है। इससे तो गया फिर भी अच्छा था । यहाँ कई भैंसें थीं, कई बकरियाँ, कई घोड़े, कई गधे पर किसी के सामने चारा न था, सब ज़मीन पर मुरदों की तरह पड़े थे। कई तो इतने कमज़ोर हो गए थे कि खड़े भी न हो सकते थे। सारा दिन दोनों मित्र फाटक की ओर टकटकी लगाए ताकते रहे; पर कोई चारा लेकर आता न दिखाई दिया। तब दोनों ने दीवार की नमकीन मिट्टी चाटनी शुरू की, पर इससे क्या तृप्ति होती ?

रात को भी जब कुछ भोजन न मिला, तो हीरा के दिल में विद्रोह की ज्वाला दहक उठी। मोती से बोला- अब तो नहीं रहा जाता मोती !

दिया- मुझे तो मालूम होता है, प्राण निकल मोती ने सिर लटकाए हुए जवाब दिया- मुझे तो रहे हैं।

‘इतनी जल्द हिम्मत न हारो भाई! यहाँ से भागने का कोई उपाय निकालना

चाहिए।’

‘आओ दीवार तोड़ डालें। ‘

‘मुझसे तो अब कुछ नहीं होगा । ‘

‘बस इसी बूते पर अकड़ते थे! ‘

‘सारी अकड़ निकल गई। ‘

बाड़े की दीवार कच्ची थी। हीरा मज़बूत तो था ही, अपने नुकीले सींग दीवार में गड़ा दिए और ज़ोर मारा तो मिट्टी का एक चिप्पड़ निकल आया। फिर तो उसका

साहस बढ़ा। इसने दौड़-दौड़कर दीवार पर चोटें कीं और हर चोट में थोड़ी-थोड़ी मिट्टी गिराने लगा ।

उसी समय कांजीहौस का चौकीदार लालटेन लेकर जानवरों की हाज़िरी लेने आ निकला। हीरा का उजड्डपन देखकर उसने उसे कई डंडे रसीद किए और मोटी-सी रस्सी से बाँध दिया।

मोती ने पड़े-पड़े कहा – आखिर मार खाई, क्या मिला ? ‘अपने बूते – भर ज़ोर तो मार दिया। ‘

‘ऐसा ज़ोर मारना किस काम का कि और बंधन में पड़ गए । ‘ ‘ज़ोर तो मारता ही जाऊँगा, चाहे कितने ही बंधन पड़ते जाएँ।’

‘जान से हाथ धोना पड़ेगा । ‘

‘कुछ परवाह नहीं। यों भी तो मरना ही है। सोचो, दीवार खुद जाती, तो कितनी जानें बच जातीं। इतने भाई यहाँ बंद हैं। किसी की देह में जान नहीं है। दो-चार दिन और यही हाल रहा तो सब मर जाएँगे।’

‘हाँ, यह बात तो है। अच्छा, तो ला, फिर मैं भी ज़ोर लगाता हूँ । ‘ मोती ने भी दीवार में उसी जगह सींग मारा। थोड़ी-सी मिट्टी गिरी और फिर हिम्मत बढ़ी। फिर तो वह दीवार में सींग लगाकर इस तरह ज़ोर करने लगा, मानो किसी प्रतिद्वंद्वी से लड़ रहा है। आखिर कोई दो घंटे की ज़ोर-आज़माई के बाद दीवार ऊपर से लगभग एक हाथ गिर गई। उसने दूनी शक्ति से दूसरा धक्का मारा, तो आधी दीवार गिर पड़ी।

दीवार का गिरना था कि अधमरे से पड़े हुए सभी जानवर चेत उठे। तीनों घोड़ियाँ – सरपट भाग निकलीं। फिर बकरियाँ निकलीं। इसके बाद भैंसें भी खिसक गईं; पर गधे अभी तक ज्यों-के-त्यों खड़े थे।

हीरा ने पूछा- तुम दोनों क्यों नहीं भाग जाते ?

एक गधे ने कहा- जो कहीं फिर पकड़ लिए जाएँ ! ‘तो क्या हरज है। अभी तो भागने का अवसर है। ‘

‘हमें तो डर लगता है, हम यहीं पड़े रहेंगे। ‘

आधी रात से ऊपर जा चुकी थी। दोनों गधे अभी तक खड़े सोच रहे थे कि

भागे या न भागें, और मोती अपने मित्र की रस्सी तोड़ने में लगा हुआ था। जब वह

हार गया, तो हीरा ने कहा- तुम जाओ, मुझे यहीं पड़ा रहने दो। शायद कहीं भेंट

हो जाए ।

मोती ने आँखों में आँसू लाकर कहा- तुम मुझे इतना स्वार्थी समझते हो, हीरा ? हम और तुम इतने दिनों एक साथ रहे हैं। आज तुम विपत्ति में पड़ गए, तो मैं तुम्हें छोड़कर अलग हो जाऊँ।

हीरा ने कहा- बहुत मार पड़ेगी। लोग समझ जाएँगे, यह तुम्हारी शरारत है। मोती गर्व से बोला – जिस अपराध के लिए तुम्हारे गले में बंधन पड़ा, उसके लिए अगर मुझ पर मार पड़े, तो क्या चिंता ! इतना तो हो ही गया कि नौ-दस प्राणियों की जान बच गई। वे सब तो आशीर्वाद देंगे।

यह कहते हुए मोती ने दोनों गधों को सींगों से मार-मारकर बाड़े के बाहर निकाला और तब अपने बंधु के पास आकर सो रहा ।

भोर होते ही मुंशी और चौकीदार तथा अन्य कर्मचारियों में कैसी खलबली मची, इसके लिखने की ज़रूरत नहीं। बस, इतना ही काफ़ी है कि मोती की खूब मरम्मत हुई और उसे भी मोटी रस्सी से बाँध दिया गया।

एक सप्ताह तक दोनों मित्र वहाँ बँधे पड़े रहे। किसी ने चारे का एक तृण भी न डाला। हाँ, एक बार पानी दिखा दिया जाता था । यही उनका आधार था। दोनों इतने दुर्बल हो गए थे कि उठा तक न जाता था, ठठरियाँ निकल आई थीं।

एक दिन बाड़े के सामने डुग्गी बजने लगी और दोपहर होते-होते वहाँ पचास-साठ

आदमी जमा हो गए। तब दोनों मित्र निकाले गए और उनकी देखभाल होने लगी। लोग

आ-आकर उनकी सूरत देखते और मन फीका करके चले जाते। ऐसे मृतक बैलों का

कौन खरीदार होता?

सहसा एक दढ़ियल आदमी, जिसकी आँखें लाल थीं और मुद्रा अत्यंत कठोर, आया और दोनों मित्रों के कूल्हों में उँगली गोदकर मुंशी जी से बातें करने लगा। उसका चेहरा देखकर अंतर्ज्ञान से दोनों मित्रों के दिल काँप उठे। वह कौन है और उन्हें क्यों टटोल रहा है, इस विषय में उन्हें कोई संदेह न हुआ। दोनों ने एक-दूसरे को भीत नेत्रों से देखा और सिर झुका लिया।

हीरा ने कहा- गया के घर से नाहक भागे। अब जान न बचेगी। मोती ने अश्रद्धा के भाव से उत्तर दिया- कहते हैं, भगवान सबके ऊपर दया करते , उन्हें हमारे ऊपर क्यों दया नहीं आती?

‘भगवान के लिए हमारा मरना जीना दोनों बराबर है। चलो, अच्छा ही है, कुछ दिन उसके पास तो रहेंगे। एक बार भगवान ने उस लड़की के रूप में हमें बचाया था। क्या अब न बचाएँगे?’

‘यह आदमी छुरी चलाएगा। देख लेना । ‘ ‘तो क्या चिंता है? माँस, खाल, सींग, हड्डी सब किसी-न-किसी काम आ जाएँगे। ‘

नीलाम हो जाने के बाद दोनों मित्र उस दढ़ियल के साथ चले। दोनों की बोटी-बोटी काँप रही थी। बेचारे पाँव तक न उठा सकते थे, पर भय के मारे गिरते पड़ते भागे जाते थे; क्योंकि वह ज़रा भी चाल धीमी हो जाने पर ज़ोर से डंडा जमा देता था।

राह में गाय-बैलों का एक रेवड़ हरे-हरे हार में चरता नज़र आया। सभी जानवर प्रसन्न थे, चिकने, चपल। कोई उछलता था, कोई आनंद से बैठा पागुर करता था। कितना सुखी जीवन था इनका; पर कितने स्वार्थी हैं सब किसी को चिंता नहीं कि उनके दो भाई बधिक के हाथ पड़े कैसे दुखी हैं।

सहसा दोनों को ऐसा मालूम हुआ कि यह परिचित राह है। हाँ, इसी रास्ते से गया उन्हें ले गया था। वही खेत, वही बाग, वही गाँव मिलने लगे। प्रतिक्षण उनकी चाल तेज़ होने लगी । सारी थकान, सारी दुर्बलता गायब हो गई। आह? यह लो ! अपना ही हार आ गया। इसी कुएँ पर हम पुर चलाने आया करते थे, यही कुआँ है।

मोती ने कहा- हमारा घर नगीच आ गया।

हीरा बोला- भगवान की दया है। ‘मैं तो अब घर भागता हूँ । ‘

“यह जाने देगा ?”

‘इसे मैं मार गिराता हूँ।’

‘नहीं-नहीं, दौड़कर थान पर चलो। वहाँ से हम आगे न जाएँगे । ‘

दोनों उन्मत्त होकर बछड़ों की भाँति कुलेलें करते हुए घर की ओर दौड़े। वह हमारा थान है। दोनों दौड़कर अपने थान पर आए और खड़े हो गए। दढ़ियल भी पीछे-पीछे दौड़ा चला आता था।

झूरी द्वार पर बैठा धूप खा रहा था। बैलों को देखते ही दौड़ा और उन्हें बारी-बारी से गले लगाने लगा। मित्रों की आँखों से आनंद के आँसू बहने लगे। एक झूरी का हाथ चाट रहा था।

दढ़ियल ने जाकर बैलों की रस्सियाँ पकड़ लीं।

झूरी ने कहा- मेरे बैल हैं। ‘तुम्हारे बैल कैसे? मैं मवेशीखाने से नीलाम लिए आता हूँ । ‘ pulby

‘मैं तो समझा हूँ चुराए लिए आते हो! चुपके से चले जाओ। मेरे बैल हैं। मैं बेचूँगा तो बिकेंगे। किसी को मेरे बैल नीलाम करने का क्या अख्तियार है?”

‘जाकर थाने में रपट कर दूँगा । ‘

‘मेरे बैल हैं। इसका सबूत यह है कि मेरे द्वार पर खड़े हैं। ‘ दढ़ियल झल्लाकर बैलों को ज़बरदस्ती पकड़ ले जाने के लिए बढ़ा। उसी वक्त मोती ने सींग चलाया। दढ़ियल पीछे हटा। मोती ने पीछा किया। दढ़ियल भागा। मोती पीछे दौड़ा। गाँव के बाहर निकल जाने पर वह रुका; पर खड़ा दढ़ियल का रास्ता देख रहा था, दढ़ियल दूर खड़ा धमकियाँ दे रहा था, गालियाँ निकाल रहा था, पत्थर फेंक रहा था। और मोती विजयी शूर की भाँति उसका रास्ता रोके खड़ा था। गाँव के लोग

यह तमाशा देखते थे और हँसते थे।

जब दढ़ियल हारकर चला गया, तो मोती अकड़ता हुआ लौटा। हीरा ने कहा- मैं डर रहा था कि कहीं तुम गुस्से में आकर मार न बैठो।

‘अगर वह मुझे पकड़ता, तो मैं बे-मारे न छोड़ता । ‘

‘अब न आएगा।’

‘आएगा तो दूर ही से खबर लूँगा। देखूं, कैसे ले जाता है । ‘ है।’

‘जो गोली मरवा दे?”

‘मर जाऊँगा, पर उसके काम तो न आऊँगा।’

‘हमारी जान को कोई जान ही नहीं समझता।’

‘ इसीलिए कि हम इतने सीधे हैं। ‘

ज़रा देर में नाँदों में खली, भूसा, चोकर और दाना भर दिया गया और दोनों मित्र खाने लगे। झूरी खड़ा दोनों को सहला रहा था और बीसों लड़के तमाशा देख रहे थे। सारे गाँव में उछाह – सा मालूम होता था ।

उसी समय मालकिन ने आकर दोनों के माथे चूम लिए ।