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Apiculture in Hindi 2022 | मधुमक्खी पालन के बारे में पूरी जानकारी | एपीकल्चर पर निबंध

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Apiculture in Hindi – मनुष्य ने जानवरों से लाभ प्राप्त करना प्रकृति में इनके साथ जीवन व्यतीत करते हुए आदि काल से ही आरम्भ कर दिया था। इसके लिये अनेक उत्पादों को प्राप्त करने हेतु उसे इन जीवों की प्राणों की आहुति भी देनी पड़ती थी। शहद या मधु एक स्वास्थ्यवर्धक पोषणीय पदार्थ तो है ही, आयुर्वेद में तो इसे औषधि का दर्जा दिया गया है। अनेक रोगों के उपचार हेतु इसे आधार के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।

वेद, पुराण, रामायण एवं महाभारत में इसका उल्लेख मिलता है। चरक संहिता में इसके गुणों का वर्णन किया गया है। चीनी यात्रियों फाहियान व हीनयान ने भी इसके औषधीय गुणों के बारे में बताया है। इस लेख में apiculture kya hota hai और apiculture kise kahate hain के बारे में जानेगे 

एपीकल्चर किसे कहते हैं what is apiculture in Hindi

apiculture kya hai – Apiculture औद्योगिक दृष्टि से आधुनिक वैज्ञानिक विधि द्वारा मधुमक्खियों का कृत्रिम पालन करना एवं इनके द्वारा निर्मित उत्पादों अर्थात शहद (honey) व मोम (wax) प्राप्त करना मधुमक्खी पालन (Bee keeping) या एपीकल्चर (apiculture) कहलाता है।

भारत में मधुमक्खी की कौन-कौन सी जातियां पाई जाती है

भारत में मधुमक्खी की 4 जातियां पाई जाती है जिन से शहद प्राप्त होता है

1. एपिस डॉर्सटा (Apisxtorwara)

इसे सारण या बोम्बारा (Sarang or Bombura) मधुमक्खी के नाम से जाना जाता है। यह उपरोक्त चार जालियों में सबसे बडे आमाप की लगभग 20 मि.मी. होती है अतः वृहद मधुमक्खी (giant honey bee) भी कहलाती है। यह अन्य सभी चार जातियों की अपेक्षा अधिक मात्रा में शहद बनाती है। यह पेड़ों के ऊपर, पुरानी इमारतों की दीवारों या गुफाओं में लगभग (0.90 x 1.50 मीटर तक परिमाण के छत्ते बनाती है।

एक ही स्थान पर एक से अधिक छत्ते पाये जाते हैं। जून-जुलाई में यह पहाड़ों पर चली जाती है तथा सर्दियों में पुनः मैदानी क्षेत्रों में लौट आती है। इसके एक छत्ते से 15-40 कि.ग्रा. तक शहद पाप्त किया जा सकता है। इनका स्वभाव गुस्सैल प्रकार का होता है व उत्तेजित होने पर ये आक्रमण कर देती है। प्रवासी (migratory) प्रवृत्ति व गुस्सैल प्रकृति का होने के कारण इन्हें पालना संभव नहीं है।

2. एपिस इन्डिका (Apis indica)

यह सम्पूर्ण भारत में पायी जाती है तथा भारतीय मोना मक्खी कहलाती है । यह सारंग से कुछ छोटी लगभग 15 मि.मी लम्बी होती है । यह अन्धेरै स्थानों में रहना पसन्द करती है। यह एक ही स्थान पर एक- एक फुट परिमाण के एक से अधिक छत्ते बनाती है। इसके छत्ते कुए, मिट्टी के बर्तनों, झाड़ियों व पेड़ों के खोखले भाग व इमारतों की दीवारों पर बनाये जाते है। इनके एक छत्ते से लगभग 34 कि.ग्रा. शहद प्राप्त होता है ये शान्त स्वभाव की मक्खी है अतः आसानी से पाली जा सकती है।

3. एपिस फ्लोरिआ ( Apis florea )

यह शृंगा मधु मक्खी के नाम से जानी जाती है । यह एपिस इन्डिका से कुछ छोटी (8 मि.मी) होती है। इसके छत्ते लगभग 15-24 से.मी. आमाप के होते है । इसके एक छत्ते से केवल 250 ग्राम शहद प्राप्त होता है। इसका शहद सबसे मीठा होता है। यह डरपोक प्रकृति की डंक न मारने वाली मधुमक्खी होती है। इसके छत्ते को आसानी से तोड़ा जा सकता है।

4. एपिस मेलीफेरा ( Apis mellifera )

यह यूरोपियन मधुमक्खी है । यह भारतीय मोना से मिलती – जुलती है, किन्तु मोना की अपेक्षा इसके छत्ते से 9-10 गुणा अधिक शहद प्राप्त किया जाता है। इसका शहद भी व्यापारिक तौर पर अच्छा होता है। यह भी डरपोक स्वभाव की होती है व आसानी से पाली जा सकती है। इसकी इटालियन प्रजाति यूरोप व अमेरिका में पाली जाती है।

मधुमक्खी पालन की विधियों Methods of Bee keeping in Hindi

शहद प्राप्त करना ही मधुमक्खी पालन Apiculture ]का प्रमुख उद्देश्य होता है । प्राचीनकाल से ही मनुष्य शहद प्राप्त करता आ रहा है । मधुमक्खी पालन की दो प्रमुख विधियाँ हैं

1. पुरानी या देशी विधि (Old indigenous method)

प्राचीनकाल में शहद प्राप्त करने हेतु अनुप्रयुक्त प्राणिविज्ञानव्यवहारिकी एवं जैव सारिख्यकी एक छत्ते के नीचे कोई व्यक्ति पूरी देह पर मोटा कपड़ा लपेट कर जाता था तथा वहाँ कण्डे या कचरा या घास – फूस जलाकर धुओं कर देता था । मक्खियाँ धुएं के कारण वहाँ से उड़ जाया करती थीं । शेष | मक्खियों को मार कर छत्ता तोड़ कर शहद प्राप्त कर लिया जाता था । इस विधि में छत्ते से शहद निचोड़ कर अलग किया जाता है ।

इस दौरान छत्ते में उपस्थित लार्वा , प्यूपा व इनके अण्डे भी नष्ट हो जाते हैं तथा इनकी देह के अवशेष भी शहद में मिल जाया करते थे । इस प्रकार प्राप्त शहद शुद्ध नहीं होता था । धीरे – धीरे लोगों ने घड़े , सन्दूक , लट्ठों का प्रयोग आरम्भ किया जिससे मधुमक्खी इनमें छत्ता बनाने लगी , किन्तु यह आवश्यक नहीं होता था कि मधुमक्खी वहाँ छत्ता अवश्य ही बनाये । इस विधि को ही वैज्ञानिक पद्धति में रूपान्तरित किया गया तथा कृत्रिम छत्तों का आविष्कार हुआ।

2. आधुनिक वैज्ञानिक विधि (Modern scientific method)

आधुनिक पद्धति में कृत्रिम छत्तों का प्रयोग किया जाता है जिन्हें एक स्थान से उठा कर अन्यन्त्र ले जाया जा सकता है । शहद प्राप्त करने हेतु इन्हें तोड़ा नहीं जाता बल्कि पुनः एक ही छत्ता बार – बार उपयोग में लाया जाता है जिससे मधुमक्खियों को बार – बार स्थान नहीं बदलना पड़ता , छत्ता बनाने में श्रम का अपव्यय नहीं होता तथा शहद में अशुद्धियों या इनके देह के भाग आदि नहीं होते । इन छत्तों की देख – रेख पालनकर्ता द्वारा की जाती है,

अतः इन्हें विपरीत मौसम में उठा कर सुरक्षित स्थान पर रख दिया जाता है। छत्ते का बन्दरों, चूहों, चीटियों अथवा बर्र द्वारा नष्ट करने का खतरा भी नहीं रहता। आधुनिक विधि के ये सब लाभ प्राचीन विधि में नहीं पाये जाते।

मधुमक्खी पालन के उपकरण (Appliances for Bee keeping)

आधुनिक विधि से मधुमक्खी पालन apiculture हेतु कुछ उपकरणों की आवश्यकता होती है जो निम्न प्रकार से हैं

  1. कृत्रिम छत्ता या पेटी (Artificial bee hive or box)
  2. कॉम्ब आधार (Comb foundation)
  3. मधु निष्कासन उपकरण (Honey extracting apparatus)
  4. टोपी हटाने के चाकू (Uncapping knife)
  5. अन्य उपकरण (Miscellaneous apparatus)

मधुमक्खी पकड़ना व पालना (Catching and Rearing of Honey Bees)

कृत्रिम छत्ते में पालने हेतु मधुमक्खियों को वृन्दन (swarming) के समय पकड़ा जाता है। इसके लिये टोपी जैसे जाल के भीतर शहद लगा कर इनके आने जाने के मार्ग में रखा जाता है। शहद से आकर्षित होकर मधुमक्खियाँ टोपी में बैठ जाती हैं। सन्ध्या के समय इन्हें कृत्रिम छत्ते के शिशु खण्ड में छोड़ दिया जाता है। कुछ दिनों तक इन्हें कृत्रिम भोजन (2/3 चीनी +1/3 भाग जल मिलाकर) दिया जाता है। वातावरण में फूलों की कमी होने पर भी इन्हें यह कृत्रिम भोजन ही दिया जाता है।

किसी प्राकृतिक छत्ते से ही एक रानी मक्खी व कुछ श्रमिकों को लाकर नये कृत्रिम छत्त की शुरूआत की जा सकती है । छत्ते में रानी मक्खी को प्रति वर्ष बदला जाता है , पुरानी रानी मक्खी को छत्ते से बाहर निकाल दिया जाता है , अन्यथा उद्योग पर विपरीत प्रभाव पड़ता है । नई रानी मक्खी को पकड़कर इसकी देह पर उसी छत्ते का बना थोड़ा सा शहद लगा कर शिशु खण्ड में रख दिया जाता है जिसे श्रमिक स्वीकार कर लेते हैं । कृत्रिम छत्तों को खुले खेतों मैदानों या बगीचों में उचित स्थान पर छाया में रख दिया जाता है।

मधुमक्खी पालन हेतु मधुमक्खी का चयन Bee Selection for Beekeeping in hindi

एक अच्छी एपिएरी (apiary  चलाने हेतु मधुमक्खी की उचित जाति का चुनाव महत्त्वपूर्ण है । इसमें निम्न गुणों का समावेश होना चाहिये

1. मधुमक्खी मृदु स्वभाव (gentle temperament) की होनी चाहिये ।

2. यह सुदृढ कोलोनी बनाने में सक्षम होनी चाहिये ।

3. इसमें शत्रुओं से स्वयं की सुरक्षा करने की क्षमता होनी चाहिये ।

4. इसके श्रमिक मेहनती तथा ऊर्जावान होने चाहिये ।

5. अमिक ऐसे हों जो विभिन्न जाति के पादपों के फूलों से मकरन्द व परागकण एकत्रित करते हों।

6. इसमें अधिक मात्रा में शहद एकत्रित या संग्रहित करने की क्षमता होनी चाहिये ।

7 . यह जाति ऐसी हो जो आसानी से इच्छित स्थान पर छत्ता बनाने में सक्षम हो । वैज्ञानिकों का प्रयास आनुवंशिक तौर पर ऐसी प्रजाति तैयार करने में है जो मृदु स्वभाव की व अधिक शहद उत्पादन करने वाली हो । इसके लिये विभिन्न जाति की मधुमक्खियों से संकरण के प्रयोग किये जा रहे हैं । भारत में एपिस इन्डिका ही सर्वश्रेष्ठ प्रजाति है जो मधुमक्खी पालन apiculture उद्योगों हेतु चुनी जाती है । यह मेहनती , मृदु स्वभाव की मक्खी है जिसमें बड़ी संख्या में श्रमिकों को उत्पन्न कर कोलोनी बनाने का गुण पाया जाता है ।

8. यदि भोजन उपलब्ध हो तो एक ही स्थान पर एक से अधिक कृत्रिम छत्ते रख कर उद्योग को बढ़ाया जाना चाहिये ।

9. कृत्रिम छत्ते की देख – भाल के दौरान शहद एकत्रण , काम्ब फाऊन्डेशन , फ्रेम आदि का नियमित निरीक्षण करना चाहिये । यदि आवश्यकता हो तो फ्रेम्स की संख्या बढ़ायी जानी चाहिये ।

10. कृत्रिम छत्ते को शिकारी व परजीवी जन्तुओं से सुरक्षित रखना चाहिये , इनमें वेक्स मॉथ ( Wax Moth ) , बर्र ( Wasp ) , काली चीटीयाँ ( Black Ants ) , किंग क्रो ( King Crow ) व मधु मक्खियों के भक्षणकर्ता प्रमुख हैं ।

11. कृत्रिम छत्ते में कॉलोनी स्वच्छ व स्वास्थ्य की दृष्टि से ठीक रखनी चाहिये अन्यथा मधुमक्खियों को संक्रामक रोग हो सकता है जिससे बनाया गया शहद भी खराब स्तर का व संक्रमित प्रकृति का होगा ।

12. शहद को उचित स्थानों तक ले जाने में सुविधा हो , अतः एपिएरी सड़क मार्ग के निकट होनी चाहिये।

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मधुमक्खी पालन के लाभ ( Benefits of beekeeping )

मधुमक्खी पालन apiculture के दो महत्त्वपूर्ण उत्पाद हैं

(1) मधु व (2) मधुमक्खी का मोम

1. मधु (Honey)

श्रमिक मकरन्द पीकर इसे अपने अन्नपुट (crop) में सुरक्षित रखते हैं । इसमें लार (saliva) के मिल जाने से कुछ रासायनिक परिवर्तन होते हैं। सुक्रोज शर्करा डेक्ट्रोज व लेव्यूलोज में रूपान्तरित हो जाती है । मधुमक्खी के द्वारा कुछ तत्व (पाचक एन्जाइम्स) इसमें मिलाये जाते हैं तथा जल की मात्रा कम की जाती है । इसे श्रमिक छत्ते में लौट कर मुख से बाहर निकालता है व कोष्ठकों (cells) में भर देता है। श्रमिक मधुमक्खियाँ तेजी से अपने पंखों को हिला कर मधु के इस जलीय भाग को उड़ा देती है। इस प्रकार मकरन्द परिपक्व होकर शहद में परिवर्तित हो जाता है।

श्रमिक शहद के कोष्ठकों पर मोम की टोपी लगा कर बन्द कर देते हैं। मधु, सफेद या पीलापन लिये हुए काले-भूरे रंग का गाढा मीठा तस्ल होता है। इसकी सुगन्ध उन फूलों पर निर्भर करती है जिनसे मकरन्द एकत्रित किया गया है 1 किलो ग्राम शहद तैयार करने हेतु मधुमक्खियों को फूलों के लगभग 100000 चक्कर लगाने पड़ते हैं तथा प्रत्येक चक्कर लगभग 1.5 से 2 किलोमीटर का होता है अर्थात 1.5 से 2 लाख किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है

2. मधुमक्खी का मोम (Bees – wax)

मधुमक्खी-मोम एक अवशिष्ट या उपो-उत्पाद (bye – product) परन्तु लाभदायक पदार्थ है जो मधुमक्खी – पालन से प्राप्त किया जाता है । यह श्रमिक मधुमक्खी के उदर (abdomen) में स्थित ग्रन्थियों द्वारा स्त्रावित किया जाता है । यह स्त्रवण शल्कों (scales) का आकार ले लेता है , जो कि गुल्फ ( tarsi ) की शूकों (spines) द्वारा शरीर से अलग कर दिया जाता है और मुँह की ओर आगे बढ़ा दिया जाता है । मुँह में इसे चबाकर प्लास्टिक की भाँति छत्ते (कॉम्ब) को बनाने के योग्य बना दिया जाता है । छत्ते से यह मोम अलग कर लिया जाता है ।

मोम श्रृंगार के सामान अर्थात् कांतिवर्द्धक ( cosmetics ) वस्तुओं के बनाने के उद्योगों में आधार पदार्थ ( base substance ) के रूप में प्रयुक्त होता है । मधुमक्खी के मोम का उपयोग कान्तिवर्द्धक वस्तुओं के अतिरिक्त कोल्ड क्रीम , शेविंग – क्रीम , मरहम , मोमबत्तियाँ , रंग ( paint ) , पॉलिश , कार्बन – पेपर इत्यादि पदार्थों के निमार्ण में भी किया जाता है । यह स्नेहक ( lubricant ) के रूप में भी प्रयुक्त होता है ।

मधुमक्खियों के शत्रु व रोग Enemies and Diseases of Honey Bee in Hindi

मधु की प्रमुख शत्रु एकेरॉन्शिया स्टिक्स ( Acherontia styx ) चींटीयाँ हैं जो छत्ते में सुरंग बना लेती है व शहद चूस कर चुराती रहती हैं । मोम शलम गैलीरिमा मैलोनेला ( Galleria mellonella ) छत्ते में अपने अण्डे रख देती है जिनसे लार्वा निकल कर मधु चूसते हैं व मोम खाते हैं । इनके डर से मधुमक्खियाँ छत्ता छोड़ कर भाग जाती हैं । कुछ अन्य चीटीयाँ व बर्र भी मधुमक्खियों के दुश्मन हैं जो इनका शिकार करती हैं । दुश्मनों से रक्षा हेतु छत्ते का द्वार छोटा रखना चाहिये।

मधुमक्खियों में लकवे व पेचिश जैसे रोग भी कभी – कभी हो जाते हैं । ऐसे छत्ते पर गन्धक का पाउडर छिड़क कर उपचारित करना चाहिये व पीड़ित मधुमक्खियों को मार देना चाहिये तथा मोम को पिघला कर स्वच्छ कर लेना चाहिये ।

परजीवी मकड़ी ऐकेरेपिस वूडी ( Aearapis woodi ) एकेराइन रोग उत्पन्न कर देती है । मध् गुमक्खियों में यह रोग हिमाचल प्रदेश में 1956 में पाया गया था । यह उत्तर प्रदेश व जम्मू कश्मीर में भी हानि पहुंचा चुका है । इनका उपचार संभव है ।

भारत में मधुमक्खी पालन Apiculture in India in Hindi

भारत में आदिकाल से इसके प्रमाण वेदों से प्राप्त हुए हैं । भारत सरकार ने लघु उद्योग ( cottage industry ) के रूप में इसे मान्यता दी है । ग्रामीण खादी ग्रामोद्योग कमीशन ने इसके उत्थान हेतु सराहनीय प्रयास किये हैं । भारत में आजकल लगभग 6 लाख कृत्रिम छत्ते सक्रिय हैं । ये अधिकतर तमिलनाडू , केरल , कर्नाटक , महाराष्ट्र व पंजाब में स्थापित हैं ।

मधुमक्खी पालन apiculture कुछ मात्रा में आन्ध्र प्रदेश , मध्यप्रदेश , वेस्ट बंगाल , उड़ीसा व आसाम में शुरू किया गया है । राजस्थान में भरतपुर , अलवर व कोटा में मधुमक्खी पालन apiculture किया जा रहा है । अधिकतर कृषक ही खेती बाड़ी के साथ – साथ कृत्रिम छत्तों को अपने खेतों की क्यारियों , उद्यानों आदि में रख कर इनसे लाभ अर्जित करते हैं । इसके द्वारा रोजगार की समस्या का समाधान कुछ हद तक संभव है ।

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