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विज्ञान एवं मानव जीवन | विज्ञान वरदान या अभिशाप | विज्ञान और तकनीकी के बढ़ते कदम | विज्ञान पर निबंध

विज्ञान और समाज पर निबंध, विज्ञान एवं मानव जीवन, विज्ञान वरदान या अभिशाप, विज्ञान और तकनीकी के बढ़ते कदम essay on science in hindi

भूमिका

जिस ओर दृष्टि जाती है तेरी ही महिमा नजर आती है। सोते-जागते, उठते-बैठते, खाते-पीते तू हमारा चिरसंगी बन गया है। हम तेरे यन्त्रों से बोये और काटे गये अनाज को खाते हैं, तेरे यन्त्रों से बने वस्त्रों को पहनते हैं, तेरे यन्त्रों से निर्मित सामग्री से बने भवनों में निवास करते हैं। हमारी हवा, हमारा पानी, हमारा प्रकाश, हमारा स्वास्थ्य, हमारा मनोरंजन और अधिक क्या कहूँ जन-जन का जीवन आज तुम्हारे हाथों में है। तुम ही अन्तरिक्ष यान बनकर ब्रह्माण्ड के अनादि मौन को भंग कर रहे हो तुम ही अतुल अज्ञात महासागर के भेदों को उद्घाटित कर रहे हो, देश और काल की दूरी को मिटा रहे हो, मरतों को जिला रहे हो, जीतों को मार रहे हो। तुम ही जल को थल, थल को जल, बियाबान को चमन और बस्तियों को मरुस्थल भी बना रहे हो। तुम प्रजापति ब्रह्मा हो, तुम परिपोषक विष्णु हो और तुम संहारकारी शिव भी हो।

मानव की निरीह इन्द्रियों को अनन्त शक्ति का दान देने वाले विज्ञान देव तुमको शत-शत नमस्कार। धन्य हैं तुम्हारे चमत्कार।

विज्ञान का विकास

विज्ञान क्या है? क्रमबद्ध विस्तृत ज्ञान कसौटी पर कसा गया निश्चित सिद्धान्तों पर टिका हुआ ज्ञान मानव की जन्मजात जिज्ञासाओं का समाधान, सत्य के स्वरूप का अनुसंधान, सृष्टि से निकटतम पहचान अनादि काल से मानव विज्ञान की साधना में निरत है। जीवन को सुखी और सुविधामय बनाने के लिये खोजी गयी प्रत्येक युक्ति विज्ञान का ही तो आदिम रूप है। मिट्टी खोदने की खुरपी से लेकर ट्रेक्टर तक हाथ ठेले से लेकर विद्युत रेल तक, गुलेल से लेकर अणुबम तक और पालकी से लेकर अपोलों तक सब विज्ञान का ही तो इतिहास है किन्तु बीसवीं सदी ने मानव को विज्ञान की चरम साधना तक पहुँचा दिया है। नित्य नये चमत्कार देखने मिल रहे हैं। हर क्षेत्र में विज्ञान की विजयपताका लहरा रही है।

रोटी अर्थात् कृषि एवं भोज्य पदार्थों के क्षेत्र में

काठ के हलों से आज ट्रेक्टर तक आ पहुंचे हैं। जोतने से लेकर घर आने तक अन्न उत्पादन का सारा कार्य यन्त्र कर रहे हैं। थ्रैशर हैं, पम्प हैं, कटर कम्बाइन मशीन, बोरियों में भरने वाले और ठेलों पर लादने वाले यन्त्र भी आज किसान को प्राप्त हैं। सिंचाई के लिये इन्द्रदेव की आराधना नहीं करनी पड़ती। ट्यूबवैल या पम्प से जब चाहिये पानी लीजिये। फसल को कीटों से बचाने के लिये कीटनाशक औषधियाँ उपस्थित हैं। अन्न के भण्डारण के लिये आधुनिक गोदाम हैं। बीजों की नित्य नयी चमत्कार पूर्ण किस्में निकल रही हैं जो कीड़ों एवं मौसम से अप्रभावित रहती हैं। नये-नये खाद्य पदार्थों की खोजें हो रही हैं। अधिक प्रोटीन, वसा, शर्करा तथा विटामिनयुक्त कृत्रिम खाद्य पदार्थ तैयार किये गये हैं।

वस्त्रों के क्षेत्र में

आज मानव को केवल प्रकृति प्रदत्त सूती, ऊनी और रेशमी वस्त्रों से सन्तोष नहीं। उसने परम्परागत वस्त्रों से अधिक सुविधाजनक, सुन्दर और टिकाऊ वस्त्रों का आविष्कार किया है। नायलॉन, टेरालीन, टेरीकाट, टेरीवूल, स्ट्रेचलान, डेकारान न जाने कितने वस्त्रों की कोटियाँ प्राप्त हैं मनमोहक रंगों और अलंकरणों में। इन वस्त्रों से पोशाक बनाने के लिये। सिलाई मशीनें और निर्माण के लिये आधुनिकतम मिलें भी विज्ञान ने दी हैं।

भवन निर्माण और वास्तुकला के क्षेत्र में

विशाल बांध, बहुमंजिली इमारतें, मनोहारी शैल्पिक प्रयोग, भवन निर्माण के क्षेत्र में विज्ञान की अपूर्व प्रगति के प्रमाण हैं। क्रेन, बुलडोजर, ट्रिलर, मिश्रक, खनन यन्त्र आदि ने अल्प समय में आश्चर्यजनक निर्माण को सम्भव बनाया है। साधारण व्यक्ति के लिये भी सस्ते और टिकाऊ मकानों के मॉडल, ईंट बनाने के यन्त्र तथा सीमेन्ट भी विज्ञान ने ही प्रस्तुत किये हैं।

यातायात के क्षेत्र में

साईकिल से लेकर ल्यूखोद (चन्द्रगाड़ी) तक विज्ञान की शानदार_ परम्परा फैली हुई है। स्कूटर, कारें, लॉरी, ट्रकों, रेलें, वायुयान, रॉकेट और अन्तरिक्ष यान आज न केवल भूमण्डल पर ही अपितु अखिल ब्रह्माण्ड में मानव के प्रगतिमान चरणों का वहन कर रहे हैं। चन्द्र विजय, विज्ञान की यातायात क्षमता का आश्चर्यजनक प्रमाण है। शुक्र, मंगल और वृहस्पति के घर में झाँकने वाले मानव के यान देव विमानों को भी चुनौती दे रहे हैं। समुद्र के विशाल वृक्ष को चीरते हुए विक्रान्त और उनके अन्दर तक के गूढ़ रहस्यों को टटोलने वाली नोटिलस मानव के ज्ञान विस्तार में निरन्तर क्रियाशील है। सुपर सोनिक विमानों की कर्णकटु ध्वनियाँ प्रमुख हवाई अड्डों पर सुनाई दे रही हैं। अन्तरिक्ष स्टेशनों की स्थापना द्वारा अन्तरिक्ष पिण्डों की नियमित यात्रायें शायद अधिक दूर नहीं।

चिकित्सा के क्षेत्र में

मानव को रोगमुक्त करने और उसकी प्राण रक्षा करने में भी विज्ञान का अपूर्व योगदान है। असाध्य रोग भी अब साध्य हो गया है। कैंसर, कुष्ठ पर विजय पाकर अब विज्ञान एड्स जैसे भयंकर शत्रु से जूझ रहा है। एक्सरे तथा अल्ट्रासाउण्ड परीक्षण द्वारा शरीर के अन्दर का हाल प्रत्यक्ष हो रहा है। स्वल्पाकार टी.वी. कैमरों को शरीर में प्रविष्ट कराके भीतर का चित्र बाहर दिखाया जा रहा है। जीन्स पर नियन्त्रण की चेष्टा चल रही है ताकि वंशानुगत रोगों से छुटकारा हो जाय। शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में तो विज्ञान ने अद्भुत सफलताएँ प्राप्त की हैं। अब हाथ-पैर आदि सामान्य अंग ही नहीं आपतु हृदय, गुर्दा और मस्तिष्क तक के प्रत्यारोपण हो रहे हैं। प्लास्टिक शल्य क्रिया द्वारा मनुष्य का कायाकल्प हो रहा है। अगला कदम सम्भवतः एक आदर्श मानव का निर्माण होगा, बल, बुद्धि का भण्डार मानव ।

संवाद संचार के क्षेत्र में

संचार के क्षेत्र में भी विज्ञान की उपलब्धियाँ कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। इन्टरनेट, टेलीफोन, टेलीग्राम, टेलीविजन, टेलीप्रिंटर, फैक्स आदि के प्रयोग ने विश्व को घर-आँगन बना दिया है। लेसर किरणों द्वारा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड से सम्पर्क सूत्र स्थापित किये जा रहे हैं। संचार उपग्रहों द्वारा दूरदर्शन का कोने-कोने में प्रसार हो चुका है।

शिक्षा और मनोरंजन के क्षेत्र में

वैज्ञानिक आविष्कारों ने शिक्षा तथा मनोरंजन को भी प्रभावित किया है। चलचित्र तथा टेली विभाग द्वारा इतिहास, भूगोल, भूगर्भ, चिकित्सा एवं ज्योतिष के अध्ययन और अध्यापन में चमत्कारिक सहयोग किया है।

सुरक्षा के क्षेत्र में

सुरक्षा अर्थात् सैन्य उपकरणों के विकास और निर्माण ने अपूर्व प्रगति की है। मानव-विनाश के एक से एक कुत्सित साधन विज्ञान ने उपलब्ध कराये हैं। अन्तर्राष्ट्रीय मिसाइलें और परमाणु बम के साथ-साथ रासायनिक एवं जीवाणु बम बन चुके हैं। उपग्रहों द्वारा कहीं भी प्रलयकारी प्रहार किये जा सकते हैं, जासूसी की जा सकती है। हो सकता है चुपके-चुपके किसी और भी विनाशक हथियार का विकास चल रहा हो।

अन्य आविष्कार

परमाणु शक्ति के शान्तिपूर्ण उपयोग के रूप में पारमाणविक बिजलीघर तथा परमाणु इंजिन बन चुके हैं। प्राकृतिक पदार्थों का स्थान कृत्रिम पदार्थ ले रहे हैं। कृत्रिम काष्ठ, कृत्रिम हीरे, कृत्रिम रक्त, कृत्रिम प्रकाश, कृत्रिम भोजन, कृत्रिम वस्त्र और कृत्रिम मनुष्य का निर्माण हो चुका है।

उपसंहार

विज्ञान को एक अच्छा सेवक किन्तु एक बुरा स्वामी बताया गया है। विज्ञान के आविष्कारों और सुविधाओं पर अधिकाधिक आश्रित होता मनुष्य उसे अपना स्वामी बनाता है जा रहा है। इनका दुष्परिणाम सामने आ रहा है। उसकी अपनी प्राकृतिक क्षमताएँ क्षीण होती जा रही हैं। वह सुविधाओं का दास बनकर अपने अस्तित्व को ही दाँव पर लगा रहा है। अतः विज्ञान को सेवक बनाये रखना ही अच्छा है। उसके आश्रित होना आत्म-विनाश को निमंत्रण देना है।

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