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राज्य लोक सेवा आयोग | राज्य लोक सेवा आयोग के बारे में पूरी जानकारी

राज्य लोक सेवा आयोग, कार्यकाल, नियुक्ति, शपथ, कार्य, वेतन, आयोग सचिवालय [ Rajasthan public service commission in hindi ]

• केन्द्र सरकार में लोक सेवकों की भर्ती एवं पदोन्नति आदि हेतु संविधान के अनुच्छेद 315 ( 1 ) में संघ लोक सेवा आयोग ( UPSC ) के गठन का प्रावधान है । संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री की सलाह पर की जाती है । इनका कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु जो भी पहले हो , तक होता है । संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्य को कार्यकाल की समाप्ति से पूर्व संविधान के अनु . 313 ( 1 ) ( 3 ) में विहित प्रक्रिया से राष्ट्रपति द्वारा हराया जा सकता है ।

• राज्य में योग्य लोक सेवकों की भर्ती करने के लिए संविधान के 14 वें भाग में अनुच्छेद 315 से 323 तक राज्य लोक आयोग के गठन कार्य , शक्तियाँ सदस्यों की नियुक्ति , बर्खास्तगी आदि का प्रावधान किया गया है ।

• संविधान के अनुच्छेद 315 ( 1 ) में प्रत्येक राज्य में एक लोक सेवा आयोग के गठन का प्रावधान किया गया
• अनुच्छेद 315 ( 2 ) में दो या अधिक राज्यों के लिए एक संयुक्त लोक सेवा आयोग के गठन का प्रावधान है । ऐसे आयोग के गठन के लिए विधि निर्माण की शक्ति संसद को प्राप्त है तथा आयोग का गठन राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है तथा संयुक्त आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्य अपना इस्तीफा राष्ट्रपति को संबोधित करते हैं ।

• स्वतंत्रता से पूर्व राजस्थान विभिन्न रियासतों व राज्यों में बँटा हुआ था जिनकी अपनी – अपनी अलग प्रशासनिक व्यवस्था थी । स्वतंत्रता प्राप्ति के समय तक राजस्थान की केवल तीन रियासतों ने अपनी प्रशासनिक सेवाएँ आरम्भ की तथा भर्ती के लिए लोक सेवा आयोग की स्थापना की थी । जोधपुर में 1939 , जयपुर में 1940 तथा बीकानेर में 1946 में राज्य लोक सेवा आयोग ने अपना कार्य करना प्रारम्भ कर दिया । इन आयोगों का दायित्व भर्ती एवं सेवा संबंधी नियमों का निर्माण तथा कुछ वर्गों के कर्मचारियों की नियुक्ति करना था ।

• राजस्थान के एकीकरण के पश्चात् राजस्थान की तत्कालीन सरकार ने उक्त रियासतों में स्थापित लोक सेवा आयोग भंग कर दिये तथा 16 अगस्त , 1949 को एक अध्यादेश जारी किया जिसकी अधिसूचना 20 अगस्त को राजपत्र में प्रकाशित हुई एवं इसी तिथि से राजस्थान लोक सेवा आयोग का गठन किया गया एवं जयपुर में राजस्थान लोक सेवा आयोग की स्थापना की गई ।

20 अगस्त , 1949 को सर एस.के. घोष इसके प्रथम अध्यक्ष बने । इसी अध्यादेश की व्यवस्था के अनुसार 28 जुलाई , 1950 को श्री एस.सी. त्रिपाठी राजस्थान लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष तथा श्री देवीशंकर त्रिपाठी व श्री एन.आर. चंडोरकर सदस्य नियुक्त किए गए ।

• 1951 में राज्य लोक सेवा आयोग के कार्यों को नियमित करने हेतु राज्य सरकार द्वारा निम्न नियम पारित किये गये
( 1 ) राजस्थान लोक सेवा आयोग सेवा की शर्ते नियम 1951 एवं
( 2 ) राजस्थान लोक सेवा आयोग सेवा कार्यों की सीमा नियम 1951

• 1956 में राज्य पुनर्गठन के बाद सत्यनारायण राव समिति की सिफारिश पर राजस्थान लोक सेवा आयोग को अजमेर स्थानान्तरित किया गया ।

• 1968 में आयोग के सदस्यों की संख्या दो से बढ़ाकर तीन कर दी गई । 1973 में यह संख्या चार व 1981 में पाँच कर दी गई । 2011 में राजस्थान लोक सेवा आयोग में अध्यक्ष ह के अलावा सदस्यों की संख्या 5 से बढ़ाकर 7 करने का प्रावधान किया गया है । राजस्थान लोक सेवा आयोग का दायित्व राज्य प्रशासन को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए कुशल अधिकारियों व कर्मचारियों का चयन करना एवं उनकी पदोन्नति आदि के मामले देखना है

राज्य लोक सेवा आयोग अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति ( अनु . 316 )

• राजस्थान लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्यों की नियुक्ति राज्य के राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री की सलाह पर की जाती है । ( अनु . 316 [ 1 ]

• आयोग के वरिष्ठ सदस्य को अध्यक्ष बनाए जाने की परम्परा है । राज्यपाल द्वारा आयोग का अध्यक्ष किसी को भी नियुक्त किया जा सकता है ।

• संविधान के अनु . 316 ( 1 ) के परन्तुक के अनुसार आयोग के आधे सदस्यों को दस वर्ष का केन्द्र या राज्य सरकारी सेवा का अनुभव होना आवश्यक है । आयोग के अन्य सदस्यों के संबंध में संविधान द्वारा कोई विशेष दिशा – निर्देश नहीं दिए गए हैं ।

• सामान्यतः आयोग के अध्यक्ष प्रशासनिक सेवा , पुलिस सेवा , इंजीनियरिंग सेवा , शिक्षा , वकालात आदि क्षेत्रों से चुने जाते हैं।

कार्यकाल ( अनु . 316 )

• लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष एवं सदस्य अपने पद ग्रहण की तारीख से 6 वर्ष की अवधि या 62 वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने तक , इनमें से जो भी पहले हो , अपना पद धारण करेगें । ( 316 [ 2 ] ) संघ लोक सेवा आयोग में सेवानिवृत्ति की आयु 65 वर्ष है।

• लोक सेवा आयोग के सदस्य अपनी पदावधि की समाप्ति पर उस पद पर पुनर्नियुक्त नहीं किये जा सकेंगे । ( अनु . 316 [ 3 ] ) । परन्तु सदस्य को कार्यकाल समाप्ति के बाद भी अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया जा सकेगा , जो 6 वर्ष या 62 वर्ष की आयु जो भी पहले हो , तक अध्यक्ष पद पर कार्य करेगा

• राज्य लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष या कोई सदस्य राज्य के राज्यपाल को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग कर सकेगा । ( अनु . 316 )

• अध्यक्ष का पद रिक्त होने पर वरिष्ठतम सदस्य को कार्यवाहक अध्यक्ष नियुक्त किया जा सकता है ।

हटाया जाना ( अनु . 317 )

• राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष व किसी अन्य सदस्य को केवल कदाचार के आधार पर राष्ट्रपति के आदेश द्वारा अनु . 145 में विहित प्रक्रिया के तहत् उच्चतम न्यायालय द्वारा दोष सिद्ध होने पर ही हटाया जा सकता है । जाँच के दौरान राज्यपाल आरोपी अध्यक्ष या सदस्य को निलम्बित कर सकता है । लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य को राष्ट्रपति द्वारा निम्न आधारों पर भी हटाया जा सकता है -दिवालिया घोषित हो जाने पर ।
• अपनी पदावधि में अपने पद के कर्तव्यों के अलावा अन्य किसी सवेतन नियोजन में लगा होने पर । राष्ट्रपति की राय में मानसिक या शारीरिक दुर्बलता के कारण अपने पद का कार्य करने के लिये अयोग्य हो जाने पर ।

सेवा शर्ते ( अनु . 318 )

• राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्यों की संख्या तथा उनकी सेवा की शर्तों का निर्धारण राज्यपाल द्वारा किया जाएगा ।
• परन्तु लोक सेवा आयोग के सदस्य की सेवा की शर्तों में उसकी नियुक्ति के पश्चात् उसके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा ।

आयोग सचिवालय :

• आयोग में एक सचिव व अन्य अधिकारी होते हैं ।
• सचिव आयोग प्रशासन का व्यावहारिक कार्यपालक होता है ।
• सचिव या तो भारतीय प्रशासनिक सेवा का अधिकारी होता है या आयोग के उपसचिव पद से पदोन्नत करके सचिव के पद पर नियुक्त किया जाता है ।
• सचिव की किसी भी प्रकार की नियुक्ति के संबंध में राज्यपाल की अनुमति आवश्यक है । उसके वेतन तथा भत्तों का निर्धारण भी राज्यपाल द्वारा किया जाता है ।

• सचिव का कार्यकाल सामान्यतः पांच वर्ष का होता है । किन्तु इस नियम का पालन सामान्यत : नहीं किया जाता है ।
• सचिव के प्रति किसी भी प्रकार की अनुशासनात्मक कार्यवाही का अधिकार अध्यक्ष को ही है । सचिव राज्यपाल को ऐसी कार्यवाही के विरुद्ध अपील कर सकता है ।

आयोग सचिवालय के अराजपत्रित कर्मचारियों की नियुक्ति अध्यक्ष की अनुमति से सचिव द्वारा की जाती है । सचिव के अधीन उपसचिव , सहायक सचिव , अनुभाग अधिकारी व अन्य कार्यालय कर्मचारी होते हैं ।

आयोग की सांगठनिक संरचना

आयोग को 6 संभागों में बाँटा गया है
( 1 ) प्रशासनिक संभाग : प्रशासनिक संभाग को संस्थापन तथा निरीक्षण विभागों में बाँटा गया है । संस्थापन विभाग सभी अधिकारियों तथा कर्मचारियों की सेवा शर्ते निर्धारित करने के लिए उत्तरदायी है , जबकि निरीक्षण विभाग का कार्य है- सुरक्षा व्यवस्था , आपूर्ति , भंडार की देखभाल , रिकॉर्ड की व्यवस्था आदि ।
( 2 ) भर्ती संभाग : विभिन्न पदों के लिए आयोजित परीक्षाओं के आवेदन पत्र को प्राप्त करना , तत्संबंधी रिकॉर्ड रखना , परीक्षा की कार्यवाही करना तथा साक्षात्कार परिणाम तैयार करना इसी संभाग का दायित्व है । विभागीय पदोन्नति भी इसी का कार्य है ।
( 3 ) परीक्षा संभाग : यह संभाग सभी प्रकार के परीक्षा संबंधी कार्यों के कुशलतापूर्वक संचलन के लिए उत्तरदायी है । परीक्षा संबंधी सुधार कार्यक्रम , साक्षा कार तथा संवीक्षा कार्यों के समन्वयन के लिए भी यही विभाग दायी है ।
( 4 ) लेखा संभाग : इस संभाग का मुख्य कार्य बजट बनाना तथा आय – व्यय के खाते संधारित करना है ।
( 5 ) विधि संभाग : विभिन्न मामलों में कानूनी कार्यवाही , अपील इत्यादि का कार्य यही विभाग करता है ।
( 6 ) शोध संभाग : भर्ती एवं परीक्षा प्रक्रिया में शोध कार्य व सुधार हेतु सुझाव देने के लिए यह संभाग स्थापित किया गया है । यही संभाग आयोग के वार्षिक प्रतिवेदन भी तैयार करता है ।

आयोग के कार्य एवं दायित्व

( 1 ) राज्य की प्रशासनिक , पुलिस , लेखा , सहकारिता आदि सभी सेवाओं के रिक्त पदों व नवसृजित पदों पर भर्ती करना ।
( 2 ) राज्य की सेवाओं में नियुक्ति के लिए परीक्षाओं का संचालन करना ।
( 3 ) सभी सेवाओं में पदोन्नति द्वारा भर्ती करना । भारतीय संविधान के अनु . 320 ( 3 ) के अनुसार पदोन्नति के लिए सरकार को आयोग का परामर्श लेना आवश्यक है । विभिन्न स्तर की सेवाओं में पदोन्नति के लिए विभागीय समितियाँ होती है ।

विभागीय पदोन्नति समितियों की बैठकें सामान्यत : जयपुर में स्थित शासन सचिवालय में ही आयोजित की जाती है ।
• किसी कर्मचारी के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही करने के संबंध में राज्य सरकार को परामर्श देना ।
• स्थानान्तरण , पदस्थापन , क्षतिपूर्ति , न्यायिक मामले के लिए खर्च आदि की नीति के संबंध में राज्य सरकार को परामर्श देना ।

• संविधान के अनु . 323 के अनुसार आयोग प्रतिवर्ष अपने विविध कार्यकलापों यथा भर्ती , पदोन्नति , वरिष्ठता निर्धारण , अनुशासनात्मक कार्यवाही , अस्थायी सेवाओं की स्वीकृति तथा अन्य परामर्श संबंधी सभी कार्यों का सम्पूर्ण विवरण राज्यपाल को प्रेषित करता है ।

भूमिका

संविधान राज्य लोक सेवा आयोग को राज्य में मेरिट पद्धति के ‘ वॉच डॉग ‘ के रूप में देखता है । इसको भूमिका राज्य सेवाओं के लिए भर्ती करना व प्रोन्नति या अनुशासनात्मक विषयों पर सरकार को सलाह देना है । सेवाओं के वर्गीकरण , भुगतान व सेवाओं की स्थिति , प्रबंधन , प्रशिक्षण आदि से इसका कोई सरोकार नहीं है । अत : यह मात्र राज्य का केन्द्रीय भर्ती प्राधिकरण है । राज्य लोक सेवा आयोग की भूमिका न केवल सीमित है बल्कि उसके द्वारा दिए गए सुझाव भी सलाहकारी प्रवृत्ति के होते हैं , पानी यह सरकार के लिए बाध्यकारी नहीं है ।

यह राज्य सरकार पर निर्भर है कि वह सुझावों पर अमल करे या खारिज करे । सरकार की एकमात्र जवाबदेही यह है कि वह विधान मंडल को आयोग के सुझावों को न मानने का कारण बताए । इसके अलावा सरकार ऐसे नियम भी बना सकती है जिससे राज्य लोक सेवा आयोग के सलाहकारी कार्य को नियंत्रित किया जा सके ।

राजस्थान लोक सेवा आयोग के 30 वें अध्यक्ष श्री श्याम सुन्दर शर्मा बनाये गये हैं जिनकी नियुक्ति 11 जुलाई , 2017 को की गई एवं जो सितम्बर , 2017 में ही सेवानिवृत्त हो जाएँगे । संघ लोक सेवा आयोग के गठन की सर्वप्रथम सिफारिश 1923 में ली कमीशन द्वारा की गई थी ।

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