Educationराज्य मानवाधिकार आयोग | राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग

राज्य मानवाधिकार आयोग | राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग

राज्य मानवाधिकार आयोग क्या है, राज्य मानवाधिकार आयोग के कार्य, नियुक्ति, अध्यक्ष, शक्तियां, कार्यप्रणाली

मानवाधिकार सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार है । मानवाधिकारों में नागरिक , राजनैतिक , सामाजिक , आर्थिक , पर्यावरणीय , सांस्कृतिक व विकास संबंधी अधिकार तथा मूलभूत स्वतंत्रताएँ स्पष्ट कर दी गई है , जिन्हें प्राप्त करने का प्रत्येक मनुष्य अधिकारी हैं ।

• संयुक्त राष्ट्र संघ की आर्थिक व सामाजिक परिषद ने 1946 में श्रीमती एलोनोर रुजवेल्ट की अध्यक्षता में मानवाधिकारों के प्रारूप की रचना के लिए एक मानवाधिकार आयोग का गठन किया । आयोग ने मानवाधिकारों की विश्वव्यापी घोषणा जून , 1948 में तैयार की जिसे संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 10 दिसम्बर , 1948 को स्वीकार कर लिया । हर वर्ष 10 दिसम्बर को अन्तरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस के रूप में मनाया जाता है । मानवाधिकारों से वंचित देशों के नागरिकों के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 1 जनवरी , 1995 से सन् 2004 तक ” मानवाधिकार दशक ” घोषित किया गया था ।

• भारत में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए 28 सितम्बर , 1993 से मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम , 1993 लागू हुआ । इस अधिनियम की धारा 2 ( घ ) में मानवाधिकारों को परिभाषित किया गया है ।

• मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम , 1993 के तहत् देश में मानवाधिकारों को रक्षा के लिए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन 10 अक्टूबर , 1993 में न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्र की अध्यक्षता में किया गया । इसका प्रधान कार्यालय दिल्ली में है ।

राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग ( RSHRC )

राज्य में मानव अधिकारों के प्रभावी संरक्षण के लिए राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग का गठन मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम , 1993 की धारा 21 ( 1 ) के तहत राज्य सरकार की अधिसूचना द्वारा 18 जनवरी , 1999 को किया गया , जिसमें एक अध्यक्ष एवं चार सदस्य रखे गये ।

अध्यक्ष एवं सभी सदस्यों के कार्यग्रहण के बाद मार्च , 2000 से आयोग कार्यशील हुआ । इसका मुख्य कार्यालय सचिवालय , जयपुर में है । राज्य मानवाधिकार संरक्षण ( संशोधित ) अधिनियम , 2006 द्वारा राज्य मानवाधिकार आयोग में अध्यक्ष के अलावा सदस्यों की संख्या घटाकर दो कर दी गई।

राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष व सदस्य

इस आयोग का अध्यक्ष उच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश ही हो सकता है । अध्यक्ष के अलावा इस आयोग में निम्न दो सदस्य होंगे

1. एक सदस्य जो उच्च न्यायालय का सदस्य है या सदस्य रहा है या जिला जज है या रहा है तथा उसे जिला जज के रूप में कार्य करने का कम से कम 7 वर्ष का अनुभव हो ।

2. एक सदस्य जिसको नियुक्ति उन व्यक्तियों में से की जाएगी जिन्हें मानव अधिकारों से संबंधित मामलों का ज्ञान हो एवं व्यावहारिक अनुभव हो । परन्तु उच्च न्यायालय के कार्यरत न्यायाधीश या कार्यरत जिला जज की इस पद पर नियुक्ति से पूर्व संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श लेना आवश्यक है ।

नियुक्ति ( धारा 22 )

राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति एक समिति की सिफारिश पर राज्यपाल द्वारा हस्ताक्षरित एक वारण्ट द्वारा की जाती है । इस समिति में निम्न शामिल होते हैं

( 1 ) मुख्यमंत्री – अध्यक्ष

( 2 ) विधानसभा अध्यक्ष – सदस्य

( 3 ) उस राज्य का गृहमंत्री – सदस्य

( 4 ) विधानसभा में विपक्ष का नेता – सदस्य

( 5 ) विधान परिषद ( यदि हो ) तो उस परिषद का सभापति व परिषद में विपक्ष का नेता – सदस्य

इस समिति का गठन राज्यपाल द्वारा किया जाता है । राज्य आयोग के अध्यक्ष या सदस्य की कोई नियुक्ति उक्त समिति में किसी रिक्ति के कारण अविधिमान्य नहीं होगी ।

मानवाधिकार अध्यक्ष या सदस्य द्वारा त्यागपत्र या हटाया जाना

( धारा 23 ) राज्य मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष या कोई सदस्य कभी भी राज्यपाल को अपने हस्ताक्षरों से युक्त लिखित त्यागपत्र देकर पद से मुक्त हो सकता है ।

आयोग का अध्यक्ष या सदस्य निम्न स्थितियों में राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है

( 1 ) उच्चतम न्यायालय द्वारा कदाचार या अक्षमता सिद्ध किये जाने पर ।

( 2 ) वह दिवालिया निर्णित कर दिया गया हो ।

( 3 ) अपने कार्यकाल में अपने पद के कर्तव्यों के बाहर किसी वैतनिक रोजगार में लगा हो

( 4 ) मानसिक या शारीरिक दुर्बलता के कारण पद पर बने रहने के अयोग्य है ।

( 5 ) विकृत चित्त का है तथा सक्षम न्यायालय द्वारा इस प्रकार घोषित कर दिया गया है ।

( 6 ) किसी अपराध के लिए राष्ट्रपति को राय में नैतिक पतन वाला है , सिद्ध दोष हो गया है एवं उसे कारागार की सजा दी गई है ।

मानवाधिकार अध्यक्ष एवं सदस्यों की पदावधि ( धारा 24 )

( 1 ) राज्य मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष या सदस्य अपने पद ग्रहण करने की तिथि से 5 वर्ष या 70 वर्ष की आयु तक , इनमें से जो भी पहले हो , पद धारण कर सकेंगे ।

( 2 ) आयोग के सदस्य ( अध्यक्ष के अतिरिक्त ) पुनर्नियुक्त किए जा सकेंगे , बशर्ते की 70 वर्ष की आयु पूर्ण नहीं हुई हो । अध्यक्ष पुनर्नियुक्त नहीं किया जा सकता ।

( 3 ) अध्यक्ष या सदस्य सेवानिवृत्ति के बाद राज्य सरकार या भारत सरकार के अधीन अन्य किसी भी पद पर नियुक्त नहीं किए जा सकेंगे ।

मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम की धारा 25 के अनुसार

( 1 ) अध्यक्ष की मृत्यु होने , त्यागपत्र देने या अन्यथा प्रकार से उसका पद रिक्त होने पर नए अध्यक्ष की नियुक्ति किए जाने तक राज्यपाल किसी अन्य सदस्य को अध्यक्ष के रूप में कार्य करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगा ।

( 2 ) अध्यक्ष के अवकाश पर चले जाने पर या अन्यथा प्रकार से अपने कार्यों का निर्वहन करने में असमर्थ हो जाने की दशा में उसके पुनः कार्यभार संभालने तक राज्यपाल किसी अन्य सदस्य को अध्यक्ष के कार्यों का निर्वहन करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगा ।

राज्य मानवाधिकार आयोग के सदस्यों की सेवा शर्ते ( धारा 26 )

( 1 ) सदस्यों को देव वेतन व भते व सेवा की अन्य शर्ते राज्य सरकार द्वारा निर्धारित की जाएगी ।

( 2 ) सदस्यों के वेतन , भत्ते व सेवा की शर्ते उनकी नियुक्ति के बाद उनके अहित में परिवर्तित नहीं की जा सकती ।

राज्य आयोग के अधिकारी व कर्मचारी ( धारा 27 )

आयोग में निम्न होंगे

( 1 ) सचिव जो राज्य सरकार के सचिव के रैंक से नीचे का अधिकारी नहीं होगा ।

( 2 ) महानिरीक्षक रैक का पुलिस अधिकारी और उसके अधीन पुलिस और अन्य अन्वेषणकर्ता कर्मचारी ।

( 3 ) अन्य आवश्यक प्रशासनिक , तकनीकी एवं वैज्ञानिक स्टाफ ।

राज्य आयोग राज्य सरकार को एक वार्षिक प्रतिवेदन प्रस्तुत करेगा । इसे राज्य विधानमंडल में सदन के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा । ( धारा 28 )

मानवाधिकार आयोग का उद्देश्य

राज्य मानवाधिकार आयोग का मुख्य उद्देश्य राजस्थान राज्य में मानव अधिकारों की रक्षा हेतु एक प्रभावी निगरानी तंत्र ( Watch dug ) के रूप में कार्य करना है । राज्य मानवाधिकार आयोग , मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम , 1993 के तहत् एक स्वशासी उच्चाधिकार प्राप्त निगरानी संस्था है ।

राज्य मानवाधिकार आयोग के कार्य ( धारा 12 )

( 1 ) मानवाधिकारों के साधन की अथवा किसी लोकसेवक द्वारा उस उलंघन को रोकने में उपेक्षा की शिकायत की जाँच

( 2 ) किसी न्यायालय में मानवाधिकारों के उल्लंघन से संबंधित लंबित कार्यवाही में उस न्यायालय की अनुमति से हस्तक्षेप करना ।

( 3 ) राज्य सरकार के नियंत्रणाधीन जेलों व बंदीगृहों में जाकर वहाँ की जीवन दशाओं का अध्ययन करना व सुझाव देना ।

( 4 ) मानवाधिकारों की रक्षा हेतु बनाए गए संवैधानिक व कानूनी प्रावधानों को प्रभावशाली बनाने हेतु उनकी समीक्षा करना ।

( 5 ) आतंकवाद सहित उन सभी कारणों की समीक्षा करना , जिनसे मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है तथा इनसे बचने के उपाय सुझाना ।

( 6 ) मानवाधिकारों के क्षेत्र में अनुसंधान करना व उसे प्रोन्नत करना ।

( 7 ) समाज में मानव अधिकारों का प्रचार – प्रसार करना तथा इन अधिकारों के संरक्षण के लिए उपलब्ध सुरक्षाओं के प्रति जागरूक करना ।

( 8 ) मानवाधिकारों के क्षेत्र में कार्य करने वाले गैर सरकारी संगठनों व संस्थानों के प्रयलों को प्रोत्साहन देना ।

( 9 ) मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए आवश्यक अन्य कोई कार्य करना ।

मानवाधिकार आयोग में निहित जाँच से संबंधित शक्तियाँ ( धारा 13 )

अधिनियम के अंतर्गत किसी शिकायत की जाँच करते समय आयोग को सिविल प्रक्रिया संहिता , 1908 के अंतर्गत निम्नलिखित मामलों में , सिविल न्यायालय की सभी शक्तियाँ प्राप्त होंगी

( 1 ) गवाहों को सम्मन जारी करके बुलाने तथा उन्हें हाजिरी हेतु बाध्य करने तथा उन्हें शपथ दिलाकर परखने हेतु ।

( 2 ) किसी दस्तावेज का पता लगाने और उसको प्रस्तुत करने के लिए ।

( 3 ) किसी न्यायालय अथवा कार्यालय से किसी सरकारी अभिलेख अथवा उसकी प्रतिलिपि की माँग करने के लिए ।

( 4 ) गवाहियों तथा दस्तावेजों की जाँच हेतु कमीशन जारी करने के लिए ।

( 5 ) निर्धारित किए गए किसी अन्य मामले की जाँच के लिए ।

मानवाधिकार आयोग की कार्यप्रणाली

आयोग के पास सिविल कोर्ट जैसे सभी अधिकार व शक्तियाँ है व इसका चरित्र भी न्यायिक है । आयोग के पास मानवाधिकारों के उल्लंघन से संबंधित शिकायतों की जाँच हेतु एक स्वयं का जाँच दल है । आयोग जाँच के उपरान्त निम्नलिखित में से कोई भी कदम उठा सकता है

( 1 ) आयोग संबंधित सरकारी अधिकारी से , अभियोग की प्रारम्भिक कार्यवाही की सिफारिश कर सकता है अथवा दोषी जनसेवक पर आवश्यक कार्यवाही कर सकता है ।

( 2 ) आयोग संबंधित सरकार या अधिकारी से पीड़ित व्यक्ति को अंतरिम राहत देने की सिफारिश कर सकता है ।

( 3 ) आयोग इस संबंध में आवश्यक निर्देश , आदेश अथवा याचिका के लिए उच्च अथवा उच्चतम न्यायालय में जा सकता है ।

इस प्रकार आयोग का कार्य मुख्यत : सिफारिशी या सलाहकार का होता है । आयोग मानवाधिकार उल्लंघन के दोषी को दंड देने का अधिकार नहीं रखता है और न ही पीड़ित को किसी प्रकार की आर्थिक या अन्य सहायता प्रदान कर सकता है । आयोग की सिफारिशें संबंधित सरकार अथवा अधिकारी पर बाध्य नहीं है परन्तु उसकी सलाह पर की गई कार्यवाही पर उसे आयोग को एक माह के भीतर सूचित करना होगा ।

राजस्थान मानवाधिकार आयोग के प्रथम अध्यक्ष न्यायाधीश कान्ता भटनागर थी । आयोग के वर्तमान अध्यक्ष जस्टिस प्रकाश टाँटिया ( झारखण्ड उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ) हैं जिनकी नियुक्ति 20 अक्टूबर , 2015 को की गई थी तथा जिन्होंने 11 मार्च , 2016 को कार्यभार ग्रहण किया । ये आयोग के चौथे अध्यक्ष हैं ।

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