Educationराजस्थान में हाड़ौती का पठार | दक्षिणी-पूर्वी पठार एवं हाडौती के पठार...

राजस्थान में हाड़ौती का पठार | दक्षिणी-पूर्वी पठार एवं हाडौती के पठार Hadoti Plateau in Hindi

दक्षिणी – पूर्वी राजस्थान पठार, हाड़ौती का पठार, हाड़ौती पठार का विस्तार,

दक्षिणी-पूर्वी पठार एवं हाड़ौती के पठार– राजस्थान में यह पठार मेवाड़ मैदान के दक्षिण – पूर्व में बल नदी के सहारे पूर्वी भाग में विस्तृत है और राजस्थान के 9.6 % भू भाग को घेरे हुये है । यह उत्तर पश्चिम में अरावली के महान सीमा भ्रन्श द्वारा सीमांकित है और राजस्थान की सीमा के पार तब तक फैला हुआ है जब तक बुंदेल – खण्ड के पूर्ण विकसित कगार दिखाई नहीं देते ।

हाड़ौती पठार के अंतर्गत ऊपरमाल का पठार और मेवाड़ का पठार जिसमें राजनीतिक दृष्टि से झालावाड़ से बूंदी और कोटा , चित्तौड़गढ़ , भीलवाड़ा और बांसवाड़ा के कुछ भाग सम्मिलित हैं । यह पठारीय भाग आगे चलकर मालवा के पठार में मिल जाता है । इस क्षेत्र का अधिकांश भाग चंबल नदी तथा इसकी सहायक नदियों जैसे काली सिन्ध , परवान और पार्वती के द्वारा सिंचित है ।

अत : कृषि के संदर्भ में भी यह राजस्थान , का महत्वपूर्ण भाग है । इस भू – भाग का ढाल दक्षिण से उत्तर की ओर क्रमश : है । यह पठार पुनः दो लघु इकाइयों में विभाजित किया जाता है।

विंध्यन कागार भूमि

यह कागार भूमि क्षेत्र बड़े – बड़े बलुआ पत्थरों से निर्मित है जो स्लेटी पत्थरों के द्वारा पृथक दिखाई देता है । कागारों का मुख बनास और चंबल के बीच दक्षिण , दक्षिण – पूर्व दिशा की ओर है तथा बुंदेलखण्ड में पूर्व की तरफ फैले हैं । उत्तर पश्चिम में चंबल के बायें किनारे पर तीव्र ढाल वाले कागार दिखाई देते हैं । तत्पश्चात एक कागार खण्ड स्थित है जो धौलपुर और करौली के क्षेत्रों पर फैला है । इस क्षेत्र का कागार भूमियों की ऊँचाई 350 मीटर से 550 के बीच है ।

 दक्कन लावा पठार

मध्यप्रदेश के विन्ध्यन पठार के पश्चिमी भाग तीन सकेंद्रीय कागारों के रूप में विस्तृत हैं । यह तीन संकेंद्रीय कागार तीन प्रमुख बलुआ पत्थरों की परिव्यक्त शिलाओं के बीच – बीच में स्लेटी पत्थर भी मिलते हैं । दक्षिण – पूर्वी राजस्थान की यह भौतिक इकाई ऊपरमाल ( उच्च पठार या पथरीला ) के नाम से जानी जाती है । यह एक विस्तृत और पथरीली भूमि है जिसमें कोटा – बूंदी पठारी भाग भी सम्मिलित हैं । इस भू – भाग में नदी घाटियों में कहीं कहीं काली मिट्टी के क्षेत्र मिलते हैं । अपरदन पुरानी भूमि सतहों को अनावृत करता है , जिससे यह स्पष्ट होता है कि पुरानी स्थलाकृति का धरातल काफी हद तक वर्तमान स्थलाकृति के अनुरूप था ।

चंबल और इसकी सहायक नदियों जैसे- काली सिन्ध और पार्वती ने कोटा में एक त्रिकोणीय कांपीय बेसिन का निर्माण किया है जिसकी औसत ऊँचाई 210 मीटर से 275 मीटर के बीच है ।

बूंदी व मुकन्दवाड़ा की पहाड़ियां इसी पठारीय भाग में हैं । नदियों ने इस पठारीय भू – भाग को काट – काट कर काफी विच्छेदित कर दिया है ।

Latest article

More article