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राजस्थान में गोवंश | राजस्थान में गाये – पशु संपदा

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राजस्थान में गोवंश (Cattle), राजस्थान में गायों की प्रजातियां और स्थान, राजस्थान में पशुपालन

भारत की समस्त गायों का लगभग 8 प्रतिशत भाग राजस्थान में पाया जाता है। (देश में आठवां स्थान)

संख्या के अतिरिक्त श्रेष्ठता की दृष्टि से भी राजस्थान की गायें खासकर मरुस्थलीय भाग की गायें ऊंचा स्थान रखती हैं। नागौर के बैल सर्व श्रेष्ठ नस्ल के हैं। राजस्थान में गायें-बैलों की संख्या वर्ष 2012 में 133.24 लाख है जो कुल पशु सम्पदा का 23.08 प्रतिशत है।

वर्ष 2012 की पशुगणना के अनुसार राजस्थान की 38 प्रतिशत गायें एवं बैल 7 जिलों में यथा उदयपुर (7.29 प्रतिशत), बीकानेर (6.80 प्रतिशत), जोधपुर (6.37 प्रतिशत), बाड़मेर (5.91 प्रतिशत), भीलवाड़ा (5.39 प्रतिशत), बांसवाड़ा (5.21 प्रतिशत) और गंगानगर (4.78 प्रतिशत) में मिलते हैं।

राज्य में गायें एवं बैलों की सबसे अधिक संख्या उदयपुर (1139 लाख) जिले में है। व न्यूनतम धौलपुर (0.60 लाख) जिले में है। • दक्षिणी जिलों-उदयपुर, राजसमंद, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, बांसवाड़ा में प्रति एक हजार हैक्टेयर भूमि पर गायें एवं बैल की संख्या 250 से 300 के बीच है जबकि जयपुर और गंगानगर में 200 से 250 तथा बीकानेर, नागौर व जोधपुर में 50 से 150 के बीच है।

गौवंश की मुख्य नस्लें

1. नागौरी

नागौरी वंश की उत्पत्ति का क्षेत्र नागौर जिले का सुहालक प्रदेश है जो नागौर शहर के आसपास स्थित है। नागौरी बैल देश का अत्यन्त प्रसिद्ध दौड़ने वाला तथा हल में जोते जाना वाला पशु है। नागौरी वंश के पशुओं की टांगें पतली व मजबूत होती हैं। अनुमानतः इन लक्षणों ने ही इस वंश को चंचलता तथा चाल की सुगमता प्रदान की है। इस नस्ल की गायें दूध कम देती हैं।

2. कांकरेज

यह नस्ल राज्य के बाड़मेर, सिरोही, पाली तथा जालौर जिले के सांचौर तथा नेगड़ क्षेत्र में पाई जाती है। इस नस्ल के बैल तेज चलने और बोझा ढ़ोने के लिए प्रसिद्ध हैं, इनके सींग बड़े मजबूत होते हैं। दूसरे वंशों की अपेक्षा इनके सींग काफी ऊंचाई तक खाल से ढ़के रहते हैं। यह द्विप्रयोजनीय नस्ल है जो भारवाहक के अतिरिक्त सफल दुग्धवाहिनी भी है। इस नस्ल की गायें 5 से 9 किलोग्राम दूध प्रतिदिन देती है।

3. थारपारकर

इस नस्ल का उत्पत्ति स्थान मालाणी (जैसलमेर) ग्राम है। स्थानीय भागों में यह नस्ल मालाणी नाम से विख्यात है। थारपारकर (धारी) नस्ल की गायें अधिक दूध देती है। इस नस्ल के बैल कम परिश्रमी होते हैं। थारपारकर के शुद्ध गौवंश के पशु बाड़मेर, सांचौर, पूर्वी जैसलमेर तथा जोधपुर जिले के पश्चिमी भागों में मिलते है।

4. राठी

इस नस्ल के गाय-बैल गंगानगर जिले के दक्षिणी पश्चिमी, बीकानेर के पश्चिमी तथा जैसलमेर के उत्तरी-पूर्वी भागों में मिलते हैं। यह नस्ल लाल सिन्धी एवं साहीवाल की मिश्रित नस्ल है। इस नस्ल की गायें काफी दूध देती हैं। अत: दुग्ध व्यवसाय के लिये अत्यन्त उपयोगी है। बैलों में भारवहन क्षमता कम होती है। अधिकांशत: यह पशु घुमकड़ पशुपालकों तक ही सीमित हैं।

5. हरियाणवी

इस नस्ल के गाय-बैल गंगानगर, हनुमानगढ़, चूरू, पूर्वी बीकानेर, सीकर, टोंक व जयपुर जिलों में पाये जाते हैं। इस नस्ल के पशु बनावट में अच्छे व अनुपात में गठीले होते हैं। सिर ऊंचा उठा हुआ, चेहरा लम्बा व नुकीला होता है। मस्तिष्क के मध्य एक हड्डी काफी उठी हुई होती है, जो इस नस्ल का प्रमुख लक्षण है। इस नस्ल की गायें औसतन 5.50 से 8 किग्रा. दूध देती है। बैल भारवाहन, कुओं से पानी खींचने तथा खेती करने के लिए बड़े उपयोगी होते हैं।

6. मालवी

यह नस्ल कोटा, झालावाड़, डूंगरपुर, बांसवाड़ा तथा चित्तौड़गढ़ जिलों में पाई जाती है। इनका कद छोटा, बदन गठीला, कमर सीधी व पुढे ढालू होते हैं। इनकी टांगे छोटी व मजबूत होती है। इसी कारण से ऊबड़-खाबड़ भूमि पर आसानी से चल लेते हैं। इस नस्ल की गायें कम दूध देती हैं।

7. गिर या गीर

गुजरात के सौराष्ट्र प्रदेश में स्थित गिर वन में रहने वाले पशु ‘गिर’ जाति के नाम से जाने जाते हैं। इन्हें राजस्थान में रेडा तथा अजमेर में अजमेरा के नाम से पुकारते है ये पशु द्विप्रयोजनीय जाति के हैं। इस नस्ल की गाय औसतन 5.50 किलोग्राम से 9 किलोग्राम तक दूध देती है। इसी कारण डेयरी व्यवसाय में इसकी ज्यादा मांग है।

8. सांचौरी

सांचौर की गाये अधिक प्रसिद्ध है। ये प्रायः कम दूध देती है। यह नस्ल कांकरेज नस्ल के पशुओं से मिलती जुलती । राजस्थान जालौर जिले की सांचौर तहसील तथा सिरोहो व उदयपुर में यह नस्ल मिलती है।

9. मेवाती (काठी)

यह नस्ल अलवर, भरतपुर में मिलती है था यह हल  जोतने व बोझा ढोने केे लिए उपर्युक्त है।

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