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रबड़ के उपयोग, उत्पत्ति, प्रकार और लाभ | रबड़ बनाने की विधि | रबड़ की खेती से लाखों रुपए कमाए

रबड़ क्या है, रबड़ की उत्पत्ति, रबड़ के वनस्पति के लक्षण, जलवायु, रबड़ निष्कासन, रबड़ बनाने की प्रक्रिया, उपयोग , [ Rubber origin and distribution, botanical characteristics, climate, propagation, rubber tapping, processing, vulcanization , uses ]

कई पादपों के बीजों या छाल एवं पत्तियों में उपस्थित विशिष्ट कोशिका एवं वाहिकाओं से दूधिया या रंगीन स्राव निकलता है , जिसे लेटेक्स कहा जाता है । यह रेजिन , गम , हाइड्रोकार्बन एवं अन्य पदार्थों का मिश्रण होता है । जोसेफ प्रिस्टले ( Joseph Priestly ) ने पेन्सिल के निशान मिटाने के लिये सर्वप्रथम रबड़ का उपयोग किया था । चार्ल्स गुडईयर ( Charles Goodyear ) द्वारा वल्कनीकरण की प्रक्रिया खोजे जाने के पश्चात् रबड़ का व्यावसायिक उपयोग आरम्भ हुआ । रबड़ भी एक प्रकार का लेटेक्स है जिसे एन्जियोस्पर्म के अनेक कुलों के पादपों द्वारा प्राप्त किया जाता है । परन्तु व्यावसायिक रबड़ का उत्पादन यूफोर्बिएसी कुल के पादप हीविया बॅसिलियिन्सिस ( Hevea brasiliensis ) द्वारा होता है ।

रासायनिक दृष्टि से रबड़ पॉलिटरपिन ( polyterpene ) है जो आइसोप्रीन ( isoprene ) इकाईयों ( 500-50,000 ) के जुड़ने से बने होते हैं । एन्जियोस्पर्म पादपों की लगभग 200 जातियों , जो 80 कुलों के सदस्य हैं , से रबड़ प्राप्त होता है । यूफाबिएसी , मोरेसी , एस्ट्रेसी , एस्क्लिपिएडेसी , एपोसायनेसी तथा सेपोटेसी प्रमुख रबड़ उत्पादक पादप कुल हैं ।

रबड़ की उत्पत्ति व वितरण ( Origin and Distribution )

ही . बैसिलियिन्सिस उष्ण कटिबंधीय दक्षिण अमेरिका की अमेजन घाटी का प्राकृत है । यह पेरु , बोलिविया , कोलम्बिया तथा ब्राजील में जंगली रूप में पाया जाता है । 1925 ई . व इसके पश्चात् हीविया के वृक्षों को लाइबेरिया , श्रीलंका , मलाया , इन्डोनेशिया तथा भारत में निवेशित करवाया गया । आज कुल रबड़ उत्पाद का 97 % भाग प्रथम तीन देशों में होता है । भारत में केरल ( कोट्टायम तथा कुइलोन जिले ) , कर्नाटक तथा अण्डमान में रबड़ की खेती की जाती है ।

रबड़ के वानस्पतिक लक्षण ( Botanical Chracteristics )

हीविया ब्रैसिलियिन्सिस बहुवर्षीय ( perennial ) वृक्ष होता है । यह 18-20 m ऊंचा तथा 3 m तक चौड़ा मजबूत शाखित व तीव्र वृद्धि करने वाला होता है । इसकी पत्तियां हरे रंग की संयुक्त व त्रिपर्णक ( urifoliate ) होती है । पुष्प एकलिंगी तथा यौगिक असीमाक्ष पुष्पक्रम में व्यवस्थित रहते हैं । फल त्रिकोष्ठीय केप्सूल होता है जिसके प्रत्येक कोष्ठ में एक बीज ( 2.5 cm लम्बा ) उपस्थित होता है । लेटेक्स युक्त रबर तने की कैम्बियम परत से रिसता है जिसे निष्कर्षित किया जाता है ।

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 जलवायु ( Climate )

हीविया ( Hevea ) उष्णकटिबन्धीय क्षेत्र का एक पौधा है । जिसके लिए 175 से 250 cm औसत वार्षिक वर्षा तथा 24 ° -35 ° C तापक्रम वाली नम जलवायु की उपयुक्त रहती है । इसकी वृद्धि के लिए जलोत्सारित दुमट ( well drained loam ) मृद सबसे उपयुक्त है ।

प्रवर्धन ( Propagation )

हीविया का प्रवर्धन बीजों द्वारा संभव है । बीजों की जीवनक्षमता अल्पकालिक ( ephemeral ) होती है । इसलिए पके हुए बीजों को तुरन्त बोना आवश्यक है । पौधे 6-7 वर्षों में रबर निष्कासन ( tapping ) के लिए तैयार हो जाते हैं । प्रारम्भिक अवस्था में पैदावार कम प्राप्त होती है , परन्तु 10-12 वर्ष के पौधों से पूरी पैदावार प्राप्त होने लगती है । आर्थिक दृष्टि से पौधों की जीवनक्षमता 25-30 वर्ष तक रहती है ।

 रबर निष्कासन ( Rubber Tapping )

रबर , टेपिंग द्वारा प्राप्त होता हैं । हीविया के वृक्ष 6 वर्ष के हो जाने के बाद उनके तने में जमीन से 1.2 m ऊंचाई पर वृक्ष की छाल से पतला 30 ° C कोण पर तिरछा संकरा चीरा ( 11-15 mm ) लगाकर नाली ( groove ) बनायी जाती है । रबर , वृक्ष की पतली छाल के नीचे उपस्थित लेटेक्स वाहिकाओं ( latex vessles ) में उपस्थित होता है । जैसा कि ये वाहिकायें सर्पिल क्रम से उपस्थित रहती है इसलिए चीरा 30 ° C कोण पर तिरछा लगाया जाता है ।

रबड़ के प्रकार

ये चीरे एक निश्चित समय अन्तराल पर स्तम्भ पर एक ओर से लगाये जाते हैं । कुछ वर्ष यहाँ से रबर एकत्र करने के बाद दूसरी सतह पर चीरे लगाते हैं । लेटेक्स वाहिकाओं का प्रातःकाल के समय अत्यधिक स्फीत दाब ( turgor pressure ) होता है अतः रवर का निष्कासन सुबह – सुबह ही प्रारम्भ किया जाता है । संकरा घुमावदार चीरा लगाने के तुरन्त पश्चात् प्रत्येक चीरे के आधारीय भाग पर मिट्टी के गोल पात्र ( earthern pot ) लटका दिये जाते हैं । जिनमें लेटेक्स एकत्र होता है । साथ ही इन पात्रों में कुछ प्रतिस्कन्दक ( anticoagulants ) रसायन जैसे हाइड्रोजन परआक्साइड अथवा अमोनिया आदि की भी तुरन्त मिला दिया जाता है जो कि रिसते हुए रबर को जमने से रोकते हैं ।

लेटेक्स का प्रवाह धीरे – धीरे कम होकर दोपहर तक लगभग समाप्त हो जाता है । रबर निष्कासन के बाद उस वृक्ष को कुछ समय के लिए वैसे ही छोड़ दिया जाता है । इस दौरान नयी छाल पुराने चीरों को पुन : ढक देती है । इस प्रकार एक निश्चित अन्तराल पर रबर निष्कासन की प्रक्रिया वर्षों तक चलती रहती है।

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संसाधन ( Processing )

वृक्षों से निष्कासित रबर , सफेद अथवा हल्के पीले रंग का कोलॉयडल इमल्शन ( colloidal cmulsion ) होता है । जिसमें 30-35 % जल होता है । रबर की गुणवता को बनाये रखने के लिये निष्कासित रबर को प्रोसेसिंग से पूर्व धूल व मिट्टी के कणों से पूर्णतया बचाये रखा जाता है । रबर की प्रोसेसिंग निम्न चरणों में पूर्ण होती हैं

  1. सर्वप्रथम वनों से लायी गयी निष्कासित रबर को एल्यूमीनियम की बड़ी – बड़ी छन्नियों ( sieves ) से छान कर छाल के टुकड़ें , पत्तियाँ व अन्य मोटी अशुद्धियों ( impurities ) को दूर कर लिया जाता है ।
  2. लैटेक्स में उपिस्थत जल की मात्रा आर्द्रतामापी ( hygrometer ) द्वार माप कर इसकी मानकीकरण ( standardized ) कर लिया जाता है ।
  3. अब लैटेक्स को बड़े – बड़े पात्रों में डालकर फार्मिक व एसीटिक अम्लों को मिलाकर स्कंदित कर लिया जाता है । इस प्रक्रिया में मिश्रण को लगातार हिलाते रहते हैं ।
  4. स्कंदित रबर को पानी से धोकर इसे रोलरों से दबाकर निचोड़ लिया जाता है। इस तरह प्राप्त रबर को मशीन चालित रोलरों में डालकर इसको शीट ( sheet ) का रूप दे दिया जाता है ।
  5. रबर की शीट को सूखाने के लिये उन्हें धूम कक्षों ( smoke houses ) में रखा जाता है । इन कक्षों का तापमान 50 ° C से कम रहता है । लगभग 2.5 mm मोटी शीट को सूखने में 3-4 दिन का समय लगता है । रबर की शीटों से विभिन्न प्रकार के रबर बनाये जाते हैं ।

 वल्कनीकरण ( Vulcanization )

वल्कनीकरण की प्रक्रिया का विकास चार्ल्स गुडईयर ( Charles Goodsyear , 1939 ) द्वारा किया गया । इस प्रक्रिया में रबर को गर्म करके उसमें सल्फर की विभिन्न मात्राओं के साथ अन्य रसायन जैसे कार्बन परआक्साइड , सिलिनियम नाइट्रोपरआक्साइड को मिलाकर वल्कनीकरण किया जाता है । यह प्रक्रिया रबर में लचीलेपन , तनन सामर्थ्य ( tensile strength ) व अपघर्षण प्रतिरोध क्षमता ( abrassion resistance ) गुणों को विकसित करती है ।

उपयोग ( Uses )

1. 75 % क्रूड रबड़ का उपयोग मोटरों , हवाई जहाजों तथा साइकिलों के टायरों व ट्यूबों के उत्पादन में होता है ।

2. रबड़ का उपयोग जूते , हॉज पादपों , चटाईयों , बेल्टों , रेल कोटों , खिलौनों तथा बिजली के तारों के विद्युतरोधन ( insulation ) में अधिकता से किया जाता है ।

3. क्रूड रबड़ का 30 % गन्धक से वल्कनीकरण ( vulcanization ) कर कठोर रबड़ निर्मित किया जाता है । जो कि टेलीफोन , रेडियो व टेलीविजन के केबिनेट्स तथा चिकित्सकीय उपकरणों के बनाने में प्रयुक्त होते हैं ।

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