Educationम्यूकर का जीवन चक्र | म्यूकर का आवास , जनन और वर्गीकरण

म्यूकर का जीवन चक्र | म्यूकर का आवास , जनन और वर्गीकरण

म्यूकर का जीवन चक्र और लक्षण, आवास, कायिक संरचना, लक्षण, म्यूकर में जनन

 

वर्गीकृत स्थिति ( Systematic position )
प्रभाग ( Division )  यूमाइकोटा ( Eumycota )
उप – प्रभाग ( Sub Division ) जाइगामाइकोटीना ( Zygomycotina )
संवर्ग ( Class ) जाइगोमाइसिटीज ( Zygomycetes )
गण ( Order ) म्यूकरेल्स ( Mucorales )
कुल ( Family ) म्यूक्रेरेसी ( Mucoraceae )
वंश ( Genus ) म्यूकर ( Mucor )

 

आवास ( Occurrence )

म्यूकर एक सर्वव्यापी , मृत कार्बनिक पदार्थों पर मृतोपजीवी ( saprophytic ) कवक है । यह मुख्यतः घोडे एवं पालतू जानवरों के गोबर में जैसे- म्यूकर मूसिडों ( Mucor mucedo ) , मृदा में जैसे- म्य ( रेसीमोसस M. racemosus ) एवं म्यू . स्पाइनोसस ( M. spinosus ) पायी जाती है । ये कवक भोज्य पदार्थों जैसे डबलरोटी , जैम , जैली , अचार , चीज को विकृत कर देती है । कुछ प्रजातियाँ मनुष्य एवं पशुओं में म्यूकरमाइकोसीज TMucormycosis ) रोग फैलाती है । म्यू . रॉक्सी ( M. rouxii ) उद्योगों में माण्ड ( starch ) की शर्करा में बदलने के काम आती है ।

कायिक संरचना ( Vegetative structure )

सुकाय लंबी नलिकाकार , शाखित , संकोशिक ( coenocytic ) कवक तंतु युक्त कवक जाल के रूप में अधःस्तर ( substratum ) पर फैला रहता है ।

विभेदक लक्षण ( Distinguishing Characters )

1. कोशिका भित्ति , काइटिन , काइटोसन तथा पॉलीसेकेराइड ( जैसे ग्लूकोसेमाइन एवं गेलेक्टोस ) . प्रोटीन , प्यूरीन , वसा , मेग्नीशियम , कैल्शियम इत्यादि से बनी होती है ।

2 . सभी सदस्यों में बहुबीजाणु ( multisporsed ) बीजाणुधानी पायी जाती है ।

3. बीजाणुधानी में सुस्पष्ट स्तम्भिका ( columella ) उपस्थित ।

4. स्पोरेन्जिओल ( sporangioles ) अनुपस्थित बेकसेला ( Backusella ) के अतिरिक्त ।

5. बीजाणुधानीधर ( sporangiophores ) शीर्ष पर बंध शूकों में कभी नहीं बदलते ।

6. बीजाणुधानी नाखरूप ( pyriform ) तथा मोटी भित्ति युक्त एवं अपाती ( persistent ) होती है ।

7. इन कवकों में आम तौर पर युग्माणु ( zygospore ) बनना पाया जाता है ।

म्यूकर में जनन ( Reproduction )

यह मुख्यतः अलैंगिक एवं लैंगिक प्रकार का होता है-

अलैंगिक जनन ( Asexual reproduction )

1. अचल बीजाणुओं ( sporangiospores or aplanospores ) द्वारा :

थैलीनुमा बीजाणुधानियों में अचल बीजाणु बनते हैं । प्रत्येक बीजाणुधानी ( sporangium ) , कवक जाल के उर्ध्वाधर उगे लंबे , सींधे , अशाखित बीजाणुधानीधर ( sporangiophore ) के शीर्ष पर बनती है । बीजाणुधानीधर एकल होते हैं समूह में नहीं । कभी – कभी ये शाखित होते हैं जैसे- म्यू . रेसीमोसस ( M. racemosus ) एवं म्यू . प्लूम्बियस बीजाणुधानी के केन्द्रक विभाजित होकर अनेक बहुकेन्द्रकी , दीर्घवृर्तीय ( elliptical ) अचल बीजाणु बनाते हैं । वेब्सटर ( Webster , 1980 ) के अनुसार म्यू . हिमेलिस ( M. hiemalis ) में एक केन्द्रकी बीजाणु पाये जाते हैं । परिपक्व होकर बीजाणुधानी की भित्ति , गहरी भूरी – काली हो जाती है । कुछ प्रजातियों में इसकी भित्ति के टूटने से बीजाणु हवा के बिखर जाते हैं जबकि अन्य में भित्ति के घुल जाने से बीजाणु स्तम्भिका ( columella ) के चिपके रहते हैं । इनका प्रकीर्णन वायु एवं कीटों द्वारा होता है । उपयुक्त परिस्थितियों में बीजाणु अंकुरित होकर एक शाखित , बहुकेन्द्रकी एवं संकोशिक कवकजाल का निर्माण करते हैं ।

2. क्लैमाइडोबीजाणुओं ( Chlamydospores ) द्वारा

कुछ कवक सूत्रों में अनुप्रस्थ भित्तियाँ बनकर मोटी – भित्ति युक्त कोशिका बन जाती है । ये कोशिकायें गोल होकर क्लैमाइडोबीजाणु बनाती है । कुछ कवकविज्ञ इसे कायिक जनन मानते हैं ।

लैंगिक जनन ( Sexual reproduction )

म्यूकर जेनेविन्सिस ( Mucor genevensis ) तथा अन्य प्रजातियाँ समजालिक ( homothallic ) होती है अतः एक ही कवक तन्तु पर दो मुग्दराकार प्रायुग्मकधानियाँ ( progametangia ) होती है । इनमें अनुप्रस्थ पट बन जाने से शीर्ष की ओर एक युग्मकधानी ( gametangium ) तथा आधार पर निलम्बक ( suspensor ) का निर्माण होता है । युग्मकधानी का जीवद्रव्य सघन तथा बहुकेन्द्रिक होता है तथा इसे संकोशिक युग्मक ( coenogamete ) कहते हैं । युग्मक धानियों के सायुज्जन के बाद युग्माणु ( zygospores ) बनते हैं ।

म्यूकर मूसीडो ( M. mucedo ) में तथा अन्य प्रजातियाँ जो विषमजालिक ( heterothallic ) होती है में दो निषेच्य प्रभेदों ( + ) एवं ( – ) के कवक तंतुओं के पास – पास आने पर लैंगिक जनन होता है । इनमें भी प्रायुग्मकधानियाँ तथा इनसे युग्मकधानियों बनती हैं । इनका सायुज्जन होता है फलस्वरूप एक द्विगुणित बहुकेन्द्रकी युग्माणु का निर्माण होता है । युग्माणु आमाप में बढ़ता है तथा एक द्वि – परतीय मोटी भित्ति से घिर जाता है । निलम्बक अलग हो जाते हैं । युग्माणु अंलकरण युक्त मोटी भित्ति से घिरा हुआ व बहुकेन्द्रकी होता है ।

युग्माणु का अंकुरण ( Germination of zygospore )

अनुकूल परिस्थितियाँ आने पर युग्माणु अंकुरण करता है । युग्माणु ( zygospores ) में अर्धसूत्री विभाजन युग्माणु के अंकुरण के पूर्व होता है तथा अगुणित बीजाणु म्यूकर हिमेलिस ( M. hiemalis ) में युग्माणु ( Zygospore ) में तुरन्त ही अर्धसूत्री विभाजन होता है अतः परिपक्व युग्माणु में केवल अगुणित केन्द्रक होते हैं । एक बीजाणुधानी के सभी बीजाणु एक ही प्रभेद ( + या ) के होते हैं तथा तदानुसार सिर्फ + या प्रभेद वाले कवक तंतु बनते हैं । ये पुनः सायुज्ज होकर लैंगिक जनन की पुनरावृत्ति करते हैं ।

अनिषिक्त जनन ( Parthenogenesis )

कभी – कभी बिना संयोजन के ही युग्मक , युग्माणु जैसी रचना बनाकर नया कवक – जाल ( mycelium ) बनाते हैं । इन बीजाणुओं को अनिषेक बीजाणु ( azygospores or parthenospores ) कहते हैं । इस क्रिया को अनिषेक जनन ( parthenogenesis ) कहते हैं ।

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