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भारत के नागरिकों के मौलिक अधिकार | Fundamental Rights in Hindi | मौलिक अधिकारों पर निबंध 2021

मौलिक अधिकारों का वर्गीकरण , नागरिकों के मूल अधिकार , विशेषता

मौलिक अधिकार क्या है what is Fundamental Rights in Hindi

प्रत्येक व्यक्ति के सर्वांगीण विकास ( मानसिक , भौतिक , शारीरिक , आध्यात्मिक और नैतिक विकास ) के लिए कुछ अधिकार दिये जाने आवश्यक होते हैं । इनके अभाव में व्यक्ति का समग्र विकास रूक जाता है । ये अधिकार ही मौलिक अधिकार कहलाते हैं अर्थात् व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास के लिए राज्य द्वारा स्थापित की गई ऐसी स्थितियाँ जिन्हें समाज मान्यता प्रदान करता है , उसे मूल अधिकार कहते हैं ।

विश्व में मूल अधिकारों की शुरूआत 1215 ई . में ब्रिटेन सम्राट जॉन द्वितीय द्वारा सर्वप्रथम मैग्नाकार्टा नामक अधिकार पत्र जारी कर किसानों को अधिकार देने के साथ की गई । उसके बाद 1789 ई . में फ्रांसीसी क्रांति में तीन नारे लगाये गये – ‘ स्वतंत्रता , समानता व भ्रातृत्व । लेकिन मौलिक अधिकारों की लिखित अभिव्यक्ति पूरे विश्व में सर्वप्रथम अमेरिका ने की।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग –

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना अक्टूबर , 1993 में की गई । इसके प्रथम अध्यक्ष  श्री रंगनाथ मिश्र थे । भारतीय संविधान के भाग -3 में अनुच्छेद 12 से 35 तक मौलिक अधिकारों का विस्तृत वर्णन किया गया है । भारत में पहली बार मौलिक अधिकारों की माँग बाल गंगाधर तिलक ने अपने स्वराज्य विधेयक ( 1895 ई . ) में की थी तो पहली बार मौलिक अधिकारों का वर्णन मोतीलाल नेहरू की नेहरू रिपोर्ट ( 1928 ई . ) में मिलता है ।

बालगंगाधर तिलक के स्वराज्य विधेयक के बाद एनी बेसेन्ट के नेतृत्व में गृह स्वराज्य बिल ( Home Rule Bill ) के बहत् मौलिक अधिकारों की मांग रखी गयी । 1925 में तैयार किये गये कॉमनवेल्थ बिल ऑफ इंडिया में मौलिक अधिकारों की बात की गई । फिर 1927 में कांग्रेस के मद्रास अधिवेशन में ए . एम . अंसारी द्वारा मौलिक अधिकारों की मांग रखी गयी और संविधान निर्माण के लिए दो समितियाँ गठित की गई , जो सरदार वल्लभ भाई पटेल की अध्यक्षता वाली मौलिक अधिकार समिति व जे.बी. कृपलानी की अध्यक्षता वाली मौलिक अधिकारों की उपसमिति थी

भारत के नागरिकों के मौलिक अधिकार

मौलिक अधिकारों का वर्गीकरण

मूल अधिकारों के प्रमुख अनुच्छेद
समानता का अधिकार 14-18
स्वतंत्रता का अधिकार 19-22
शोषण के विरुद्ध अधिकार 23-24
धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार 25-28
संस्कृति एवं शिक्षा का अधिकार 29-30
संवैधानिक उपचारों का अधिकार 31 (1)

 

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1. समता / समानता का अधिकार ( अनुच्छेद 14 – 18 )

  • अनु . 14 – विधि के समक्ष समानता ( ब्रिटेन से लिया गया ) संविधान के अनुच्छेद 39 ( a ) में उल्लेख है कि गरीबों कोनिःशुल्क वकील उपलब्ध कराया जाये । विधि का समान संरक्षण U.S.A. से लिया गया ।
  • अनु . 15 – धर्म , मूलवंश , जाति , लिंग या जन्म के स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध ।
  • अनु . 16 – लोक नियोजन व सरकारी नौकरियों में अवसर की समानता ।
  • अनु . 17 – अस्पृश्यता का अन्त अस्पृश्यता जाति के आधार पर भेदभाव को संदर्भित करती है । ‘ छुआछूत को कानूनी अपराध घोषित कर दिया गया है । ‘ अस्पृश्यता ( अपराध ) अधिनियम 1955 ‘ पारित किया । 1976 ई . में इसमें अनेक संशोधन भी किए गए । 1989 में अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति निरोधक कानून पारित किया गया ।
  • अनु . 18 – उपाधियों का अन्त
  • अनु . 18 ( 1 ) – यह निषेध करता है कि राज्य सेना व विद्या संबंधी सम्मान के अलावा कोई उपाधि प्रदान नहीं करेगा।
  • 18 ( 2 ) – भारत का कोई नागरिक राष्ट्रपति की अनुमति के बिना विदेशी राज्य से कोई उपाधि प्राप्त नहीं करेगा ।

2. स्वतंत्रता का अधिकार ( अनुच्छेद 19-22 )

  • अनु . 19 – इसमें व्यक्ति को कुल छः स्वतन्त्रताएँ दी गई हैं ,
  • अनु . 19 ( 1 ) ( क ) – वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ।
  • अनु . 19 ( 1 ) ( ख ) – शांतिपूर्ण और निरायुध सम्मेलन की स्वतंत्रता ।
  • अनु . 19 ( 1 ) ( ग ) – संघ या संगठन ( राजनीति दल समिति , मजदूर संघ , कम्पनियाँ आदि । ) सहकारी समिति ( 97 वाँ संशोधन 2011 ) बनाने की स्वतंत्रता ।
  • अनु . 19 ( 1 ) ( घ ) – भारत के राज्य क्षेत्र में सर्वत्र अबाध रूप से संचरण या आगमन की स्वतंत्रता ।
  • अनु . 19 ( 1 ) ( ड . ) – निवास करने और रहने की स्वतंत्रता ।
  • अनु : 19 ( 1 ) ( छ ) – कोई वृत्ति उपजीविका , व्यापार या कारोबार करने की स्वतंत्रता ।
  • अनु . 20 – अपराधों की दोष सिद्धि के सम्बन्ध में संरक्षण ( सभ्य नागरिक को न कि मुजरिमों को ) ।

( i ) अपराध करते समय जो कानून लगा था वह ही रहेगा बदला हुआ कानून नहीं लागू होगा ।

( ii ) एक अपराध के लिए केवल एक ही बार सजा ।

( ii ) स्वयं के विरुद्ध गवाही देने के लिए कोई विवश नहीं कर सकता ।

  • अनु . 21 ( क ) – 6 से 14 वर्ष के बच्चों को अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा का अधिकार। इसे 86 वें संविधान संशोधन , 2002 द्वारा मौलिक अधिकार बनाया गया जो 1 अप्रैल , 2010 से लागू कर दिया गया है । निजता ( एकान्तता ) का अधिकार सर्वोच्च न्यायालय ने 24 अगस्त , 2017 को अपने फैसले में कहा है कि निजता का अधिकार भारतीय संविधान के अनु . 21 के तहत मौलिक अधिकार है । बालकों का अधिकार बिल ( 1992 ) का अनु . 42 यह कहता है कि ‘ मुझे मेरे अधिकारों को जानने का अधिकार है ।
  • अनु . 22 – कुछ विशेष परिस्थितियों में गिरफ्तारी के सम्बन्ध में संरक्षण ( प्रतिषेध )।
    ( i ) गिरफ्तारी का कारण जानने का अधिकार होगा ।
    ( ii ) बन्दी बनाने के 24 घण्टे के भीतर न्यायालय में पहुँचाना ( गिरफ्तारी के बाद यात्रा समय नहीं गिना जाता है।)
    ( ii ) वकील से परामर्श करने तथा प्रतिरक्षा का अधिकार होगा ।
    सूचना का अधिकार अधिनियम जून , 2005 को पारित किया गया , जिसे 12 अक्टूबर , 2005 को पूरे देश में लागू किया गया ।

3. शोषण के विरुद्ध अधिकार ( अनु . 23-24 )

  • अनु . 23 – मानव के साथ दुर्व्यवहार ( सामाजिक , आर्थिक रूप से ) एवं बलात श्रम ( बंधुआ मजदूर , सागड़ी प्रथा , हाली प्रथा , बेगार प्रथा ) का निषेध ।
  • अनु . 24 – बालश्रम का संकटमय उद्योगों में निषेध -10 अक्टूबर , 2006 से बालश्रम ( 14 वर्ष से कम ) को पूर्ण रूप से निषेधित कर बालश्रम व संरक्षण आयोग का गठन ।

4. धार्मिक स्वतन्त्रता अधिकार ( अनु . 25-28 )

  • अनु . 25 – अन्तःकरण निर्बाध रूप से धर्म को मानने की । ( आत्मा / मन से किसी भी धर्म को मानने व प्रचार / प्रसार की स्वतन्त्रता ) सिक्खों को कृपाण धारण करने की स्वतन्त्रता भी इसी अनु . में दी गई है ।
  • अनु . 26 – धार्मिक कार्यों का आयोजन करने की स्वतन्त्रता ।
  • अनु . 27 – धार्मिक व्यय पर कर से मुक्ति । ट्रस्ट / जन कल्याण / जन हितार्थ चन्दा में देने वाले धन पर कोई कर नहीं लगता । अनु . 28 – राज्य के शिक्षण निकायों ( संस्थानों ) में किसी धर्म विशेष की शिक्षा नहीं दी जाये ।

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5. संस्कृति एवं शिक्षा का अधिकार ( अल्पसंख्यकों )

  • अनु . 29 – अल्पसंख्यक वर्ग को अपनी भाषा , लिपि को सुरक्षित और संरक्षित रखने का अधिकार अर्थात् अल्पसंख्यक वर्ग के हितों का संरक्षण – शैक्षिक , भाषा , और लिपि के संदर्भ में सरकार इनकी सहायता करेगी।
  • अनु . 30 – अल्पसंख्यकों द्वारा शिक्षण संस्थाओं की स्थापना एवं प्रबन्ध एवं प्रशासन से सम्बन्धित अधिकार ।

6 . संवैधानिक उपचारों का अधिकार ( अनुच्छेद 32 – 35 )

अनु . 32 – बी.आर . अम्बेडकर ने इसे ‘ संविधान की आत्मा / हृदय कहा । इस अधिकार को ‘ गॉर्ड ‘ ( जनतंत्र का पहरेदार ) कहा जाए तो गलत नहीं होगा क्योंकि यह नागरिकों को अनुमति देता है कि वे उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय जा सकते हैं , यदि उन्हें ऐसा लगता है कि उनके मौलिक अधिकारों का सरकार द्वारा उल्लंघन हुआ है । इस प्रकार यह अधिकार नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करता है । अनु . 32 में उच्चतम न्यायालय तथा अनु . 226 में उच्च न्यायालय केद्वारा निम्न पाँच लेख जारी करने की शक्ति देता है ।

( 1 ) बंदी प्रत्यक्षीकरण ( हैबियस कॉपर्स ) -गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को सशरीर न्यायालय में 24 घण्टों के भीतर पेश करना होगा । इसका प्रमुख उद्देश्य अवैध गिरफ्तारी को रोकना है ।

( 2 ) परमादेश ( मैण्डेमस ) -हम आदेश देते हैं । यह लेख उच्च न्यायालय या उच्चाधिकारियों द्वारा अधीनस्थ न्यायालय या कर्मचारियों को उसके सार्वजनिक कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए दिया जाता है । यह रिट सबसे शक्तिशाली रिट है जो केवल सरकारी पदाधिकारी के विरूद्ध लागू किया जा सकता है । लेकिन इसे राज्यपाल व राष्ट्रपति के विरुद्ध जारी नहीं किया जा सकता है ।
( 3 ) प्रतिषेध ( प्रोहिबेसन ) -मना करना – यह लेख उच्च न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालय को जारी किया जाता है । इस लेख द्वारा अधीनस्थ न्यायालय को सूचित किया जाता है कि आपके यहाँ रहे किसी विवाद सुनवाई बंद कर दे क्योंकि अब यह आपके अधिकार क्षेत्र में नहीं रहा । ऐसा करने के निम्न लाभ हैं – अधीनस्थ न्यायालयों को निरंकुश होने से रोका जा सकता है ।
( 4 ) उत्प्रेषण ( सार्टियोरी ) –इसका अर्थ है कि और जानकारी दीजिए ‘ । यह लेख उच्च न्यायालय अधीनस्थ न्यायालय से किसी वाद के बारे में अधिक – से – अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए जारी करता है कि आपके यहाँ पर चल रहे किसी वाद जैसे – अबनाम ब में आप द्वारा लिए गए निर्णय एवं उस केस से सम्बन्धित एकत्रित किए गए गवाह सबूतों की अधिक – से – अधिक जानकारी दी जाती है जिससे कि न्यायिक सिद्धान्तों के विपरीत यदि मानवीय भूल के कारण अधीनस्थ न्यायालय ने कोई गलत निर्णय दे दिया तो उसके स्थान पर सही निर्णय दिया जा सकेगा और यह केस अब अधीनस्थ न्यायालय में ना चलकर अब उच्च न्यायालय में चल सकेगा ।
( 5 ) अधिकार पृच्छा ( को – वारंटो ) –इसका अर्थ है तुम्हें क्या हक है । इस लेख द्वारा उच्चाधिकारियों द्वारा निम्न अधिकारियों से पूछा जाता है कि आपको इस पद पर कार्य करने का क्या हक है जिस पर आपकी संवैधानिक नियुक्ति नहीं हुई । जब तक वह उसका उचित जवाब नहीं देता तब तक उस पद पर कार्य नहीं कर सकता ।

अनुच्छेद 33 – सेना के मूल अधिकारों का वर्णन
अनुच्छेद 34 – मार्शल लॉ
अनुच्छेद 35 – मूल अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए संसद को रखा गया है कि वह कानून बनाए

मौलिक अधिकारों से संबंधित विवाद

मौलिक अधिकारों में संशोधन सम्बन्धित कुछ विवाद 1967 के गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि संसद मूल अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती है तो 1973 के केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती है परन्तु इसके मौलिक स्वरूप में कोई परिवर्तन नहीं कर सकती ।

1980 के मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने मौलिक अधिकारों की सर्वोच्च स्थिति निर्धारित की गयी ।

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नीति निदेशक तत्व तथा मूल अधिकार में अंतर 

नीति निदेशक तत्व

मूल अधिकार

 1. न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं है । न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय है ।
2. इनकी प्रकृति सकारात्मक है । इनकी प्रकृति नकारात्मक है ।
3. इनके द्वारा सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना की गई । इनके द्वारा राजनीतिक लोकतंत्र की स्थापना की गई है।
4. ये आत्यन्तिक है अर्थात् इन पर प्रतिबन्ध नहीं लगाया जा सकता । ये आत्यन्तिक नहीं है , अर्थात् इन पर प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है ।
5. इनको कभी भी स्थगित नहीं किया जा सकता । आपातकाल की उद्घोषणा में इनको ( अनु . 20 , 21 को छोड़कर ) स्थगित किया जा सकता है ।
6. इनकी प्रकृति सामूहिक होती है । इनकी प्रकृति व्यक्तिगत होती है ।

1. भारत का मौलिक अधिकार किसी देश से लिया गया है

भारत के सविधान में मौलिक अधिकारों को अमेरिका के सविधान से लिया गया था

2. मौलिक अधिकार कितने हैं

भारत के संविधान में छह मौलिक अधिकार है
समता का अधिकार (अनुच्छेद 14-18)
स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19-22)
शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23-24)
धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25-28)
संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 29-30)
संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32)

3. मौलिक अधिकार क्या है

प्रत्येक व्यक्ति के सर्वांगीण विकास ( मानसिक , भौतिक , शारीरिक , आध्यात्मिक और नैतिक विकास ) के लिए कुछ अधिकार दिये जाने आवश्यक होते हैं । इनके अभाव में व्यक्ति का समग्र विकास रूक जाता है । ये अधिकार ही मौलिक अधिकार कहलाते हैं अर्थात् व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास के लिए राज्य द्वारा स्थापित की गई ऐसी स्थितियाँ जिन्हें समाज मान्यता प्रदान करता है , उसे मूल अधिकार कहते हैं ।

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