Educationमेंडलवाद | मेंडल का इतिहास | ग्रेगर जॉन मेंडल की जीवनी

मेंडलवाद | मेंडल का इतिहास | ग्रेगर जॉन मेंडल की जीवनी

मेंडल का कार्य, मेंडल की सफलता के कारण, मेंडल की जीवनी, Biography of Gregor John Mendel

जनन जीवों का विशिष्ट लक्षण है। जननी जीवों में समानता कितनी ही अधिक क्यों न हो, कभी भी पूर्ण नहीं होती है। समरूपीय यमजों (identical twins) के अलावा किसी दम्पत्ति की दो संतानें पूर्णतया समान नहीं होती हैं। उनमें थोड़ा अन्तर अवश्य होता है। इन छोटे-छोटे अन्तरों को विभिन्नतायें (variations) कहते हैं। लिंगी जनन द्वारा बने दो जीवों की आनुवंशिकता भी समान नहीं होती हैं। आनुवंशिकीय संघटन में अन्तर के कारण जीवों में आनुवंशिक विभिन्नताएँ ( hereditary variations) उत्पन्न हो जाती हैं। इन्हीं के कारण ही प्रत्येक जीव विशिष्ट होता है तथा एक जीव दूसरे से पहचाना जा सकता है। ये विभिन्नताएँ ही जैव विकास (evolution) का आधार हैं।

विज्ञान की वह शाखा जिसके अन्तर्गत आनुवंशिकता (heredity) एवं विभिन्नताओं (variations) का अध्ययन किया जाता है, उसे आनुवंशिकी (genetics) कहते हैं। जनको से सन्तति में लक्षणों का संचरण (transmission) आनुवंशिकता (heridity) कहलाता है। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में संचरित होने वाले लक्षणों को आनुवांशिक लंक्षण (heriditary characters) कहते हैं, जो कि जीन (gene) के रूप में गुणसूत्रों पर स्थित होते हैं।

वे विभिन्नतायें जो लैंगिक जनन के दौरान होने वाले पुनयोंजन (recombination) द्वारा उत्पन्न होती हैं, उन्हें आनुवंशिक विभिन्नतायें (hereditary variations) तथा वातावरणीय कारकों द्वारा होने वाली विभिन्नताएं वातावरणीय विभिन्नतायें (environmental variations) कहलाती है।

आनुवांशिकी शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम डब्ल्यू बेटसन (W. Bateson, 1905) ने किया। वे आधुनिक आनुवंशिकी का जनक (Father of Modern Genetics) कहलाते हैं। जिनेटिक्स प्रीक भाषा के शब्द जीन से व्युत्पित्त हुआ है।

आनुवंशिकी के क्षेत्र में प्रथम सफल प्रयास व वंशागति के नियमों के प्रतिपादन का श्रेय आस्ट्रिया के ग्रेगर जोहेन मेंडल को जाता है। इसी कारण इन्हें आनुवांशिकी का जनक (Father of Genetics) कहा जाता है।

मेंडल के संकरण प्रयोगों से पूर्व जर्मन वैज्ञानिक जे. कॉलरयूटर (J.Kolreuter, 1733-1806) ने तम्बाकू के पौधों पर, नाइट (Knight, 1799-1722) व गॉस (Goss. 1822) ने मटर पर तथा गार्टनर (Gartner, 1849) एवं नौडीन (Naudin 1815-1899) ने पुष्पी पादपों पर संकरण के प्रयोगों द्वारा निम्न निष्कर्ष निकाले ।

1. संकर पीढ़ी F अपने पैतृक व मातृक पौधे में से किसी एक के समान न होकर दोनों जनकों के मध्यावर्ती होते हैं।

2. व्युत्क्रम संकरणों (reciprocal hybridization) से प्राप्त F पीढ़ी एवं इनकी संततियाँ समान होती है। इस प्रकार संकर पौधों में माता एवं पिता दोनों जनकों का समान योगदान होता है।

3. किसी एक संकरण से उत्पन्न F1 संततियों में समानता होती है परन्तु उससे उत्पन्न F2 संतति में कुछ पौधे एक जनक के समान तथा कुछ दूसरे जनक के समान होते हैं। इसी के साथ कुछ नये लक्षणों वाले पौधे भी उत्पन्न होते हैं।

स्पष्ट है कि इन वैज्ञानिकों को भी लगभग वही परिणाम प्राप्त हुए जो कि बाद में मेंडल ने प्राप्त किए परन्तु ये वैज्ञानिक अपने परिणामों का स्पष्ट संख्यात्मक विश्लेषण (numerical analysis) नहीं कर सके जैसा कि बाद में मेंडल ने किया।

इनकी असफलता के कारण निम्नलिखित हैं

● अनेक लक्षणों के साथ मात्रात्मक लक्षणों का अध्ययन किया, जिससे परिणामों की स्पष्ट व्याख्या नहीं की जा सकी।

• संततियों को विकल्पी लक्षणों (contrasting characters) के आधार पर वर्गीकृत नहीं किया।

• विभिन्न पीढ़ियों से प्राप्त अंकड़ों को अलग एवं सुस्पष्ट रूप से नहीं रखा।

● किसी भी पीढ़ी में एक लक्षण के विभिन्न रूप किस अनुपात में प्राप्त हुए यह नहीं ज्ञात किया गया।

● F1 पीढ़ी में परागकण पर नियंत्रण नहीं रखा गया, जिससे F2 पीढ़ी में प्राप्त परिणामों में विश्वसनीयता नहीं थी।

ग्रेगर जॉन मेंडल की जीवनी

मेंडल का जन्म ऑस्ट्रिया के हेन्जेनडॉर्फ के सिलिसिया ग्राम में 18 जुलाई, 1822 में हुआ। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा अपने गांव के स्कूल में हुई। 1842 में ऑलम्टज् की एक शिक्षण संस्थान से दर्शनशास्त्र (philosophy) में अपना अध्ययन पूर्ण किया। मेंडल ने 1842 में अगेस्टिन चर्च में प्रवेश किया जहाँ 1847 में इन्होंने पादरी (monk) का पद ग्रहण किया तथा वहीं पर मेंडल को ग्रेगर (Gregor) की उपाधी मिली। सन् 1849 तक मेंडल ने कुछ समय के लिए एक स्कूल में अध्यापक का कार्य किया। 1851 में चर्च के द्वारा इन्हें अध्ययन के लिए वियाना विश्वविद्यालय भेजा गया, वहीं इन्होंने भौतिकी, गणित, प्राकृतिक विज्ञान एवं दर्शनशास्त्र का अध्ययन किया।

अध्ययन पूर्ण करने के पश्चात मेंडल 1854 में ब्रून लौट आये तथा मोर्डन स्कूल में अस्थाई अध्यापक नियुक्त हुए। इसके साथ-साथ मेंडल चर्च में अस्थाई पादरी का भी कार्य करते थे। अध्यापन काल में ही उन्होंने चर्च के उद्यान में मटर (Garden pea, Pisum sativum) के पौधे पर 1857-1865 तक महत्त्वपूर्ण अध्ययन किए।

इन्होंने अपने प्रयोगों से प्राप्त परिणामों एवं निष्कर्षों को सन् 1865 में बुन की “नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी” के समक्ष शोध-पत्र के रूप में प्रस्तुत किया तथा 1866 में उक्त सोसाइटी की वार्षिकी (The Annual Proceedings of Natural History Society of Brunn) नामक पत्रिका में पादप संकरण के प्रयोग (Experiments in plant hybridization Versuche uber pfianzen hybriden) नामक शीर्षक से प्रकाशित किया। इस पत्रिका को यूरोप एवं अमेरिका के बहुत से पुस्तकालयों में भेजी गयी। उस समय मण्डल के कार्यों पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। इसके निम्न कारण थे

  • इसी समय चार्ल्स डार्विन (Charls Darwin) की “ओरीजन ऑफ स्पीशीज” (Origin of species) नामक पुस्तक प्रकाशित हुई थी तथा अधिकतर वैज्ञानिक उसी के अध्ययन में व्यस्त थे।
  • उस समय के महान वनस्पतिज्ञ नागेली ने इसके कार्य को महता नहीं दी।
  • मेंडल का कार्य जिस पत्रिका में प्रकाशित हुआ था उसका स्तर नीचा था तथा उसका वितरण भी सीमित था।

मेंडल को 1866 में चर्च का मठाधीश (Abbot) बना दिया गया तथा मेंडल चर्च के कामों में अधिक व्यस्त होते गये। फिर भी उन्होंने हॉक वीड (Hawk weed = Heiracium) तथा मधुमक्खियों पर आनुवंशिकी के प्रयोग जारी रखे लेकिन इनके अध्ययनों के निष्कर्ष प्रकाशित नहीं कर सके । सन् 1884 में में अपने कार्यों को जाने बिना उनका देहान्त हो गया।

मेंडल की खोजों का महत्त्व उनके समय के वैज्ञानिक नहीं समझ सके। उनकी मृत्यु के पश्चात् 1900 में तीन वैज्ञानिकों, हॉलैण्ड के ह्यगो डी ब्रिज (Hugo de Vries), जर्मन के कार्ल कोरेन्स (Carl Corrnes) तथा आस्ट्रिया के एरिक वान शर्मक (Erict von Tschermak) मेंडल के कार्य की पुनः प्रकाश में लाये। ये तीनों वैज्ञानिक स्वतन्त्र अध्ययनों से उन परिणामों पर पहुँचे जिन पर 35 वर्ष पूर्व मेंडल पहुँच चुके थे तथा मेंडल के कार्य की पुष्टि की। 1901 में कोरेन्स ने मेंडल के निष्कर्षों को नियमों का रूप प्रदान करके मेंडल के सम्पूर्ण कार्य को पुनः ‘फ्लोरा’ (Flora) नामक पत्रिका में प्रकाशित कराया। मेंडल के सम्मान स्वरूप इनके कार्य को मेंडलवाद (Mendelism) नाम दिया गया। इस प्रकार मेंडल के कार्यों के आधार पर एक नये विज्ञान आनुवंशिकी (Genetics) का शुभारम्भ हुआ।

मेंडल का कार्य

मेंडल ने उद्यान मटर (Pisum sativum) की 34 किस्मों को चयनित किया। जिसमें से 22 किस्मों पर कार्य किया तथा उसमें से केवल 7 युग्मविकल्पीय लक्षणों का चयन करके संकरण (hybridization) के प्रयोगों के आधार पर निष्कर्ष प्राप्त किये।

मेंडल की सफलता के कारण

मेंडल को भाग्य, दूरदर्शिता, गणितीय पृष्ठभूमि व वैज्ञानिक उपयुक्तता के कारण अपने प्रयोगों में सफलता प्राप्त हुई। मेंडल की सफलता के कारणों का विवेचन निम्न प्रकार से किया जा सकता है

(I) मेंडल की अध्ययन विधि (Mendel’s study method)

1. मेंडल ने अपने पूर्ववर्ती वैज्ञानिकों की असफलताओं के कारणों को ध्यान में रखते हुए अपने संकरण प्रयोगों को योजनाबद्ध रूप से सम्पूर्ण किया।
2. मेंडल ने एक समय में एक फिर दो तथा अन्त में तीन लक्षणों की वंशगति का अध्ययन किया।

3. अध्ययन के लिए चुने गये प्रत्येक लक्षण के केवल दो ऐसे युग्म विकल्पी को चुना जिन्हें आसानी से बाह्य लक्षण के आधार पर अलग ही पहचाना जा सके।

4. मेंडल ने सभी प्रयोगों का सांख्यिकीय अभिलेख (statistical record) बनाकर विश्लेषण किया तथा लक्षणों की वंशागति का F3 पीढ़ी तक अध्ययन किया।

5. संकरण के लिए ऐसे जनकों को लिया जो विपर्यासी लक्षणों (contrasting characters) के लिए शुद्ध थे।

6. मेंडल द्वारा चुने गए लक्षणों में से कोई भी लक्षण मात्रात्मक (quantitative) नहीं था।

7. सात लक्षणों में से प्रत्येक लक्षण एक जीन द्वारा नियंत्रित था तथा सभी लक्षणों के जीन अलग-अलग गुणसूत्रों में स्थित थे।

(II) मटर का प्रयोगों के लिए चयन (Selection of pea for experiment)

मेंडल की सफलता में मटर के चयन का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। इन्होंने अपने प्रयोगों के लिए मटर का चयन निम्न कारणों से किया

  1. मटर एकवर्षी (annual) पौधा है जिसको आसानी से कहीं भी उगाकर प्रत्येक वर्ष, प्रयोगों के परिणाम प्राप्त किये जा सकते हैं।
  2. मटर में पुष्प अननुमील्य-परागणी (cleistogamous) होते हैं, अर्थात् जननांग, दलों (petals) में द्वारा पूर्णतया ढके रहते हैं तथा खुलते नहीं हैं।
  3. मटर में केवल स्वपरागण (self-pollination) ही होता है जिसके कारण पीढ़ी-दर-पीढ़ी कोई भी विशेष लक्षण शुद्ध रूप में दर्शित होता है।
  4. मटर के फूलों में कृत्रिम रूप से पर-परागण (cross-pollination) आसानी से संभव है फलस्वरूप विभिन्न जनकों के गुणों को संकरण (hybridization) द्वारा संतान में प्राप्त किया जा सकता है।
  5. मटर में स्पष्ट दिखाई देने वाले युग्म विकल्पी (allcle) लक्षण उपस्थित होते हैं जिससे मेंडल को लक्षणों के चयन का उचित अवसर मिला। एक मटर के दो विभिन्न जनकों के बीच संकरण से प्राप्त संकर पूर्ण रूप से उर्वरा (fertile) होते हैं।

(III) लक्षणों का चयन (Selection of traits)

मेंडल ने मटर (Pisum sativum) में पाये जाने वाले विभिन्न लक्षणों में से 7 जोड़ी विपर्यासी लक्षणों का चयन किया।

(IV) संकरण तकनीक (Hybridization technique)

1. मटर स्वपरागित पौधा है। मेंडल ने स्वपरागण को रोकने के लिए मादा पौधे के पुष्पों में से वर्तिकाय के परिपक्व होने से पूर्व ही पुंकेसरों को हटा दिया था। यह प्रक्रिया विपुंसन (emasculation) कहलाती है।

2. मेंडल ने परपरागण के लिए वर्तिका पर परागकणों का छिड़काव किया।

3. परागित पुष्पों को अन्य परागकणों से बचाने के लिए पुष्पों पर थैलियाँ बाँधी ।

4. उपरोक्त पादपों से प्राप्त बीजों को अलग-अलग रखकर पौधों के विभिन्न लक्षणों का अध्ययन किया।

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FAQ

Q.1 मेण्डलवाद क्या है?

मेण्डलवाद – जब दो विभिन्न लक्षणों को धारण करने वाले दो शुद्ध पादपों का परस्पर संकरण कराया जाता है, तो प्राप्त होने वाली पहली पीढ़ी की संतति में मातृपौधों में से केवल एक के ही प्रभावी लक्षण दिखाई देते हैं तथा दूसरे का प्रभावी लक्षण प्रदर्शित नहीं होता

Q.2 मेंडल के नियम कितने हैं?

1.प्रभाविता का नियम (Law of Dominance)
2.विसंयोजन का नियम (Law of Segregation) अथवा पृथक्करण का नियम अथवा 3.युग्मकों की शुद्धता का नियम (Law of Purity of Gametes)
4.स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम ( Law of Independent Assortment)

Q.3 मेंडल के नियम का अपवाद क्या है?

बहुविकल्पता मेंडल की वंशागति नियमों के अपवाद है क्योंकि इनके नियम में जीवो के 1 लक्षण का निर्धारण केवल 1 जोड़ा ऐलील द्वारा होता है।

Q.4 मेण्डल ने अपने प्रयोगों में मटर के पौधों को क्यों चुना?

मेण्डल ने अपने प्रयोगों के लिए मटर के पौधे का चुनाव इसलिए, किया क्योंकि मटर का पौधा आसानी से उपलब्ध हो जाता था, यह 1 साल में कई बार लगाया जा सकता था, इनके पुष्प आकार में बड़े और अधिक परागण क्षमता व|न है इनमें परागण को आसानी से किया जा सकता था ,मटर के पौधे आसानी से बड़े हो जाते थे, और इनका अध्ययन करना भी अत्यधिक सरल था।

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