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मूंगफली का टिक्का रोग | मूंगफली का टिक्का रोग लक्षण और नियंत्रण tikka disease of groundnut in hindi

परपोषी (Host)

मूंगफली , एरेकिस हाइपोजिया ( Arachis hypogea )

भौगोलिक वितरण (Geographical distribution)

यह रोग मूंगफली उत्पादक सभी क्षेत्रों में पाया जाता है । यह अनेक अफ्रीकी व अमेरीकी देशों , भारत , इंडोनेशिया आदि में पाया जाता है । भारत में यह रोग सभी मूंगफली उत्पादक क्षेत्रों में होता है एवं उत्पादन में भारी क्षति होती है ।

मूंगफली का टिक्का रोग के लक्षण (symptoms of tikka disease of groundnut)

रोग का प्रभाव सभी वायवीय भागों पर होता है किन्तु पत्तियों पर इसका मुख्य प्रभाव होता है यह रोग दो कवकों सर्कोस्पोरा परसोनेटा (Cercospora personata) एवं सर्केस्पोरा एरैकिडिकोला (C. arachidicola) के कारण होता है । स . एरेकिडिकोला के लक्षण पहले प्रकट होते हैं तथा स . परसोनेटा के बाद में लगभग सितम्बर माह में प्रकट होते हैं । स . परसोनेटा के कारण पत्तियों पर गोलाकार लगभग 1-6 मि.मी व्यास के गहरे भूरे काले रंग के क्षत चिन्ह ( necrotic lesions ) बन जाते हैं ।

प्रारम्भ में इनमें कोई प्रभामंडल ( halo ) किन्तु बाद पीले रंग का प्रभामंडल विकसित हो जाता है । स . एरेकिडिकोला जनित क्षत चिन्ह आकार में बड़े लगभग 1-10 मिमी . प्रारम्भ में गोलाकार फिर अनियमित आकार के , ललाई युक्त भूरे रंग के होते हैं । निचली सतह पर ये हल्के भूरे दिखते हैं । इनमें प्रभामंडल प्रारम्भिक अवस्था से ही होता है तथा बहुत ही हल्के दिखते हैं । सामान्यतया भारत में स . एरेकिडिकोला जनित लक्षण अपेक्षाकृत कम दिखते हैं ।

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हेतु विज्ञान ( Etilogy )

टिक्का रोग दो कवकों के कारण होता है । सरकोस्पोरा परसोनेटा ( Cercospora personata ) एवं स . एरेकिडिकोला ( C. arachidicola ) / स . परसोनेटा का पटयुक्त कवक जाल अन्तः व अन्तराकोशिकी ( intra and intercellular ) होता है तथा अवशोषण के लिए चूषकांग बनाता है । इनके कोनिडियमधर ( conidiophore ) मुख्यरूप से पत्ती की निचली सतह के निकट स्ट्रोमा से विकसित होते हैं । वे हरापन लिये हुए भूरे ( Olivaceous brown ) 1 2 पटयुक्त छोटे अशाखित होते हैं ।

स . एरेकिडिकोला का पटयुक्त कवक जाल मुख्यतया अन्तराकोशिकी होता है तथा चूषकांग नहीं पाये जाते । रोग के विकसित होने पर परपोषी कोशिकाओं के मृत होने पर यह आन्तरकोशिकी ( intracellular ) हो जाता है ।

कोनिडिया निचली सतह पर ही दिखते हैं तथा बेलनाकार प्रतिमुग्दररूपी ( obclavate ) भूरे 1-7 पट युक्त ( अधिकतर 3-4 ) व भूरे होते हैं । स.एरेकिडिकोला में कोनिडिया पत्ती की ऊपरी सतह पर ही दिखाई देते हैं । इनके कोनिडियम धर पीले भूरे 1-2 पट युक्त अशाखित होते हैं व समूह में पाये जाते हैं ।

ये स.परसोनेटा से अपेक्षाकृत पतले व लंबे होते हैं । कोनिडिया लगभग रंगहीन या हल्के पीले प्रतिमुग्दरूपी थोड़े बक्रित 3-12 पट युक्त अपेक्षाकृत लंबे ( 35-110 x 25-5.4 um ) तथा संकरे होते हैं । स . परसोनेटा के कोनिडिया थोड़े चौड़े व छोटे ( 18-60 x 6- 16 um ) होते हैं ।

जानपदिक रोग विज्ञान (Epidemiology)

इस रोग में प्राथमिक संक्रमण मिट्टी में पड़े हुए फसल के ढूंढ ( stubble ) एवं मूंगफली के छिलकों पर उपस्थित कोनिडिया के द्वारा होता है । यह मृदोढ़ ( soil – borne ) रोग है । रोग का प्रसार अथवा द्वितीयक संक्रमण संक्रमित पादप अंगों पर विकसित कोनिडिया द्वारा होता है जिनका प्रकीर्णन वायु द्वारा होता है निम्न ताप उच्च आर्द्रता तथा ओस की उपस्थिति भी उग्र संक्रमण : सहायक है ।

रोग प्रबन्धन (Disease management)

1. पिछले वर्ष की फसल के ढूंठ आदि को इकट्ठा कर जला देना चाहिये ।

2. फसल चक्र अपनाने से भी रोग की संभावना कम हो जाती है ।

3. शीघ्र पकने वाली ( early maturing ) किस्में लगाने से भी रोग का प्रभाव कम हो जाता है ।

4. बीजों को थीरैम अथवा कार्बनडेन्जिन ( carbendezin ) ( 2g / kg ) द्वारा उपचारित करने से लाभ होता है ।

5. रोग प्रसार को रोकने के लिए डाइथेन Z – 878 / डाइथेन M – 45 ( 0.2 % ) ब्रेस्टेन ( 0.3 % ) आदि का छिड़काव 15 दिन के अंतराल पर करना चाहिये।

6. रोग प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग करना चाहिये ।

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