Educationमानव नेत्र की संरचना और कार्य | मानव नेत्र की संरचना एवं...

मानव नेत्र की संरचना और कार्य | मानव नेत्र की संरचना एवं कार्य विधि का वर्णन कीजिए

नेत्र की संरचना, मानव नेत्र के कार्य, मानव नेत्र की संरचना का चित्र, मानव नेत्र के भाग [eye structure, human eye structure and function]

नासिका के ऊपरी भाग में प्रत्येक पार्श्व में एक-एक नेत्र स्थित होते. हैं। प्रत्येक नेत्र करोटि के नेत्र कोटर में स्थित होता है। नेत्र लगभग 2.5 सेमी. व्यास के नेत्र गोलक के रूप में होते हैं जिसका केवल पांचवां भाग कोटर के बाहर निकला रहता है। बाहर वाला भाग पारदर्शी होता है जिसे कार्निया कहते हैं। नेत्र से सम्बन्धित सहायक रचनायें पलकें, बरोनियां, अश्रु ग्रन्थियां तथा नेत्र कोटरीय पेशियां होती हैं।

नेत्र कोटर की ऊपरी एवं निचली कगारों से निकली त्वचा के वलन (Folds) नेत्र पलकों का निर्माण करती हैं, जो नेत्र गोलक को सुरक्षा प्रदान करती हैं। ये चल होती हैं, जो इच्छानुसार गतिशील होती हैं। मनुष्य में निमेषक झिल्ली महीन व पेशीविहीन होती है जो अवशेषी अंग के रूप में पाई जाती है। इसे प्लीका सेमील्यूनेरिस (Plica Semilunaris) कहते हैं। प्रत्येक पलकों पर बाल निकले होते हैं जिन्हें बरौनियां कहते हैं। बरौनियां एवं पलकें धूल के कण, तीव्र प्रकाश किरणों व अन्य वस्तुओं के गिरने से सुरक्षा प्रदान करते हैं।

बरौनियां की रोम पुटिकाओं में खुलने वाली तेल ग्रन्थियां (जाइस की ग्रन्थियां) बरौनियों को चिकना बनाये रखती हैं। नेत्र के बाहरी कोणों पर अश्रु ग्रन्थि (Lacrimal glands) स्थित होती है जो जल के समान तरल पदार्थ का स्रावण करती है। जो पलकों, कंजक्टिवा एवं कार्निया को नम बनाये रखती है। गैस, धुआं, मिट्टी के कण और भावुकता आदि के परिणामस्वरूप अश्रु का स्त्रावण होता है। अश्रु में कुछ लवण, श्लेष्म एवं जीवाणुओं को नष्ट करने के लिए लाइसोजाइम (Lysozyme) पाये जाते हैं।

प्रत्येक नेत्र गोलक को कोटर में घुमाने के लिए 6 प्रकार की कंकाल पेशियां पायी जाती हैं। इनमें चार रैक्टस एवं दो तिरछी पेशियां कहलाती हैं, जो निम्न हैं

(1) बाहरी रेक्टस मांसपेशियां

(2) अन्त: रेक्टस पेशियां (Internal rectus muscles)

(3) उत्तर रेक्टस पेशियां (Superior rectus muscles)

(4) अधो रेक्टस पेशियां (Inferior rectus muscles) (5) उत्तर तिरछी पेशियां (Superior oblique muscles)

(6) अधो तिरछी पेशियां (Inferior oblique muscles) इन पेशियों द्वारा नेत्र गोलक को एक निर्दिष्ट दिशा में घुमाया जा सकता है। नेत्र कोटरीय पेशियां जब कुछ छोटी या बड़ी हो जाती हैं तो नेत्र एक ओर झुका-सा दिखाई देता है जिसे भेंगापन (Strabismus) कहते हैं। ऊपरी तथा निचली पलकों की भीतरी त्वचा उलटकर एक पारदर्शक महीन झिल्ली के रूप में कॉर्निया समेकित होकर इसी के ऊपर फैली रहती है। इस झिल्ली को कन्जक्टिवा कहते हैं।

मानव नेत्र के भाग

नेत्र के भाग Parts of an eye

नेत्र गोलक (Eyeball)-नेत्र गोलक खोखला होता है तथा इसकी भित्ति तीन स्तरों की बनी होती है। बाहर से भीतर ये क्रमश: दृढ़ पटल (Sclerotic), रक्तक पटल (Choroid) तथा रेटिना (Retina) कहलाते

(1) दृढ़ पटल (Sclerotic Coat) –

यह नेत्र-गोलक की दीवार का सबसे बाहरी स्तर होता है तथा प्राय: दो भागों में बांटा जा सकता है कार्निया (Cornea) जो नेत्र कोटर से लगभग 1/5 भाग बाहर उभरी होती है तथा महीन पारदर्शक झिल्ली के रूप में होती है। शेष 4/5 भाग जो नेत्र कोटर के अन्दर रहता है, स्क्लैरा (Sclera) कहलाता है तथा मजबूत तन्तुमय संयोजी ऊतक का बना होता है। स्क्लेरोटिक स्तर नेत्र गोलक को सुरक्षा एवं आकृति प्रदान करता है।

(2) कोरॉएड स्तर अर्थात् रक्तक पटल (Choroid Coat) –

यह नेत्र गोलक का मध्य स्तर होता है जो कोमल संयोजी ऊतक द्वारा बना होता है। इसकी कोशिकाओं में रंगा कणिकायें पाई जाती हैं तथा इन्हीं के कारण आँखों में रंग दिखाई देता है। खरहे में रंगा कणिकाएं प्राय: लाल होती हैं परन्तु मनुष्य में काली, नीली, भूरी होती हैं। कोरॉएड स्तर में रक्त केशिकाओं (Blood Capillaries) का जाल पाया जाता है। कार्निया (Cornea) क्षेत्र को छोड़ कर यह स्तर स्क्लेरोटिक स्तर से चिपका रहता है। कार्निया के आधार पर कोरॉएड स्तर स्क्लेरोटिक स्तर से अलग होकर भीतर की ओर इसके सामने एक गोलाकार पट्टी बनाता है जिसे आइरिस या उपतारा (Iris) कहते हैं। आइरिस के मध्य में एक बड़ा छिद्र होता है, जिसे पुतली अथवा तारा (Pupil) कहते हैं। पूरी आइरिस पर अरेखित अरीय प्रसारी पेशियाँ (Radial Dilatary Muscles) फैली रहती हैं, जिनके संकुचन से पुतली का व्यास बढ़ता है।

इसी प्रकार आइरिस पट्टी के स्वतन्त्र किनारे पर पुतली के चारों ओर अरेखित वर्तुल स्फिंक्टर पेशियाँ (Circular Sphincter Muscles) फैली होती हैं जिनके संकुचन से पुतली का व्यास घट जाता है। अतः आइरिस एक कैमरे के डाएफ्राम (Diaphragm) की भाँति अपने छिद्र अर्थात् पुतली के व्यास को घटा बढ़ाकर आवश्यकतानुसार गोलक में जाने वाले प्रकाश की मात्रा का नियमन करती है। आइरिस के ठीक पीछे इसकी आधार रेखा पर कोरॉएड स्तर पर मोटी धारी के समान फूला होता है। इस भाग को सिलियरी काय (Ciliary Body) कहते हैं तथा इसमें वर्तुल एवं अरीय पेशियां होती हैं जिनके कारण सिलियरी काय संकुचनशील होती है। सिलियरी काय से अनेक महीन एवं लचीले निलम्बन रज्जु (Suspensory Ligaments) निकलते हैं जो नेत्र गोलक की गुहा में स्थित लैन्स (Lens) से संलग्न होती है।

( 3 ) रेटिना या दृष्टि पटल (Retina) –

यह नेत्र गोलक की भित्ति का सबसे भीतरी भाग होता है। यह नेत्र गोलक के पश्च भाग में स्थित होता है एवं कोरॉएड स्तर को ढके रहता है। रेटिना दो प्रमुख स्तरों की बनी होती है-बाहर का रंगा स्तर (Pigment Layer) तथा भीतरी अपेक्षाकृत मोटा संवेदी स्तर (Sensory Layer)।

रंगा स्तर-

यह स्तर चपटी एवं रंगा कणिकायुक्त कोशिकाओं का एकाकी स्तर होता है। यह स्तर आइरिस की पुतली तक फैला होता है। संवेदी स्तर केवल सिलियरी काय तक फैला रहता है तथा बाहर से भीतर की ओर तीन परतों में बंटा होता है

(1) दृक शलाका एवं शंकु परत (Rods and Cones Layer) –

यह परत लम्बी-लम्बी संवेदी कोशिकाओं की बनी होती है। ये कोशिकाएँ परत में खड़ी स्थिति में होती हैं। परत की कोशिकाएँ दो प्रकार की होती हैं। इनमें से कुछ अपेक्षाकृत लम्बी होती हैं तथा रंगा स्तर से लगी रहती हैं, इन्हें शलाकायें (Rods) कहते हैं। इसके विपरीत अधिकांश कोशिकाएँ अपेक्षाकृत चौड़ी तथा कुछ चपटी होती हैं तथा इनके नुकीले सिरे रंगा स्तर तक पहुँच नहीं पाते हैं। इन्हें शंकु (Cones) कहते

प्रत्येक शलाका एवं शंकु का भीतरी सिरा पतला होकर एक महीन तन्त्रिका तन्तु में विभेदित होता है जो शीघ्र शाखान्वित होकर इस स्तर की दूसरी परत के तन्तुओं से साइनेप्सीस बनाता है। शलाकाओं (Rods) द्वारा प्रकाश एवं अन्धकार के भेद का ज्ञान होता है। इसके विपरीत शंकुओं (Cones) द्वारा रंगभेद का ज्ञान होता है। इस परत की कोशिकाओं में भी कुछ रंगा कणिकाएँ होती हैं।

(2) द्विध्रुवीय तन्त्रिका कोशिका परत (Bipolar Neuronic Layer)-

द्विध्रुवीय न्यूरॉन की परत अनेक द्विध्रुवीय (Bipolar) तन्त्रिका कोशिकाओं की बनी होती है। इन न्यूरॉन के डैण्ड्राइट (Dendrites) शलाकाओं एवं शंकुओं के तन्तुओं से अनेक साइनेप्स बनाते हैं। इसी प्रकार इन तन्त्रिका कोशिकाओं के एक्सॉन (Axons) संवेदी स्तर की तीसरी गुच्छिकीय परत के तन्त्रिका तन्तुओं से साइनेप्सीस (Synapses) बनाते हैं।

(3) गुच्छिकीय परत (Ganglionic Layer) –

यह परत भी द्विध्रुवीय न्यूरॉन की बनी होती है। परन्तु यहाँ तन्त्रिका कोशिकाएँ अपेक्षाकृत बड़ी होती हैं। इन न्यूरॉन के बाहर डैण्ड्राइट ऊपरी परत के एक्सॉन से साइनेप्सीस (Synapses) बनाते हैं तथा भीतरी अपेक्षाकृत लम्बे एक्सॉन नेत्र-गोलक के आधार भाग के तन्तुओं में स्वयं परिवर्तित हो जाते हैं तथा गोलक को बेध कर बाहर निकलते हैं। इस आधार भाग को अन्ध बिन्दु (Blind Spot) कहते हैं, क्योंकि इस स्थान पर गोलक की परतों का अभाव होता है तथा यह भाग प्रतिबिम्ब बनाने में सहयोग नहीं देता है।

लेन्स Lens –

आइरिस के ठीक पीछे नेत्र गोलक की गुहा में एक बड़ा पारदर्शक व क्रिस्टेलाइन (Crystalline) किन्तु लचीला लेन्स (Lens) होता है। लेन्स द्विउन्नतोदर (Biconvex) होता है तथा दोनों ओर उभरा होता है। लेन्स पर एक पारदर्शक एवं महीन संयोजी ऊतक का खोल होता है जिसे लेन्स-खोल (Lens Capsule) कहते हैं। लेन्स सिलियरी काय के लचीले निलम्बन रज्जुओं (Suspensory Liga ments) द्वारा गोलक की गुहा में सधा रहता है। साथ ही ये रज्जु लेन्स को थोड़ा-सा आगे-पीछे आवश्यकतानुसार सरकाते भी हैं।

लेन्स तथा कॉर्निया के बीच की नेत्र-गोलक की गुहा में अपेक्षाकृत अधिक तरल पारदर्शक द्रव्य भरा होता है, जिसे तेजो-जल (Aqueous Humour) कहते हैं। इसी प्रकार लेन्स एवं रेटिना के बीच पारदर्शक किन्तु अपेक्षाकृत लसदार गाढ़ा द्रव भरा होता है, जो काचर-जल (Vitreous Humour) कहलाता है

गोलक, लेन्स तथा कार्निया की मध्य आयाम अक्ष (Longitudi nal Middle Axis) दृक अक्ष (Optic Axis) कहलाता है तथा इसी अक्ष पर किसी वस्तु का प्रतिबिम्ब सबसे स्पष्ट बनता है। दृक अक्ष पर स्थित नेत्र के भाग को मध्यवर्ती भाग अर्थात् एरिया सेन्ट्रैलिस (Area Centralis) कहते हैं क्योंकि ऐरिया सेन्ट्रैलिस पीला दिखाई देता है, इसलिए इसे पीत बिन्दु (Yellow Spot) की संज्ञा दी जाती है। मध्यवर्ती भाग की रेटिना में एक छोटा-सा गड्ढा होता है जिसे मध्यवर्ती गर्त अथवा फोविया सेन्ट्रेलिस (Fovia Centralis) कहते हैं। मध्यवर्ती गर्त में केवल शंकु (Cones) उपस्थित होते हैं तथा शलाकाओं का पूर्ण अभाव होता है।

देखने की प्रक्रिया (Mechanism of Vision)

किसी वस्तु से निकली प्रकाश की किरणें नेत्र में प्रवेश करती हैं तो कैमरे के निगेटिव की तरह वस्तु की उलटी व छोटी प्रतिमूर्ति (Image) नेत्र के रेटिना पर पड़ती है। रेटिना की संवेदी कोशिकाएँ संवेदित होती हैं और दूक तन्त्रिका इस संवेदना को मस्तिष्क में पहुँचा देती है। यहीं पर जन्तु को वस्तु का वास्तविक (Positive) दृष्टि ज्ञान हो जाता है। कॉर्निया, तेजोजल व लेन्स वस्तु से आयी किरणों का लगभग पूर्ण अपवर्तन (Refraction) कर देते हैं।

परिणामस्वरूप रेटिना पर उलटी प्रतिमूर्ति पड़ती है। कैमरे में प्रकाश किरणों का पूर्ण अपवर्तन लेन्स करता है। इससे वस्तु की उलटी प्रतिमूर्ति प्रकाश रसायनी प्लेट (Photo Chemical Plate) पर पड़ती है। आँखों की आइरिस कैमरे के डायफ्राम (Diaphragm) के समान पुतली के व्यास को प्रकाश के अनुसार घटाने बढ़ाने का कार्य करती है। नेत्रों में प्रकाश किरणों के तीव्र होने पर आइरिस फैलकर तारे को छोटा कर देता है। इससे रेटिना पर कम किरणें पड़ती हैं। इस प्रकार जब किरणें मन्द होती हैं तो आइरिस सिकुड़कर तारे को बड़ा कर देती है और अधिक किरणें रेटिना पर पड़ती हैं।

Latest article

More article