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मक्का उत्पत्ति एवं वितरण, वानस्पतिक लक्षण, उन्नत किस्मे, उपयोग Maize Origin and Distribution, Botanical Characteristics, Improved Varieties, Uses

मक्का की खेती, मक्का के फायदे, उत्पत्ति एवं वितरण, वानस्पतिक लक्षण, जलवायु एवं मृदा, उन्नत किस्मे, उपयोग(Maize Origin and Distribution, Botanical Characteristics, Improved Varieties, Uses)

वानस्पतिक नाम जीआ मेज
देशी नाम मक्का
कुल (Family) पोएसी (Poaceae)
उपयोगी पादप भाग दाने (Grains)

मक्का की आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण किस्में Economically important varieties of maize

  मक्का की किस्म (Variety of corn) दाना / भ्रूण पोष (Grain / Endosperm) रासायनिक गुण
1. पॉड कॉर्न (Pod corn) प्रत्येक दाना भूसे से आवरित स्टार्च युक्त एमाइलोपेक्टीन व एमाइलोस 72:28 के अनुपात में उपस्थित
2. साफ्ट कॉर्न (Soft corn) नम भ्रूण पोष नर्म स्टार्च युक्त एमाइलोपेक्टीन व एमाइलोस 72:28 अनुपात में उपस्थित
3. पॉप कॉर्न (Pop corn) कम चौड़ा दाना, छोटा एवं अण्डाकार स्टार्च युक्त एमाइलोंपेक्टीन व एमाइलोस 72:28 के अनुपात में उपस्थित
4. डेंट कॉर्न दाना ऊपर की ओर डेन्ट युक्त (dented), भ्रूणपोष के सिकुड़ने से खाँच बनती है। कड़ा भ्रूणपोष। शकर्रा युक्त एमाइलोंपेक्टीन व एमाइलोस 72:28 के अनुपात में
5. flint corn कड़ा व कठोर दाना, अनेक रंगों के दाने उपस्थित शर्करायुक्त एमाइलोपेक्टीन एमाइलोस 72:28 के अनुपात उपस्थित
6. स्वीट कॉर्न (Sweet corn) चौड़ा, बेजाकार एवं झुर्रीदार दाना शर्करायुक्त एमाइलोपेक्टीन व एमाइलोस 72:28 के अनुपात उपस्थित मे
7. वैक्सी कॉर्न (Waxy corn) दाने, मोम की तरह एमाइलोपेक्टीन एवं एमाइलोज अनुपस्थित

मक्का की उत्पत्ति एवं वितरण (Origin and Distribution)

मक्का (maize) विश्व की महत्वपूर्ण धान्य फसलों में से एक है। वार्षिक पैदावार व उत्पादन क्षेत्र की दृष्टि से इसका स्थान गेहूँ व चावल के बाद आता है।

मक्का की उत्पत्ति संभवत दक्षिण अमेरिका, उत्तरी केन्द्रीय अमेरिका, ग्वाटमाला व दक्षिण मेक्सिकों व मेक्सिकों में हुई है। मक्का के अतिरिक्त अन्य सभी अनाजों की उत्पत्ति प्राचीन विश्व में हुई जबकि व मक्का की उत्पत्ति नवीन विश्व में हुई है। मक्का कोलम्बस द्वारा अमेरिका से यूरोप पहुँचा तथा भारत के साथ-साथ एशिया में पूर्तगालियों द्वारा 17वीं शताब्दी में पहुँचा।

मक्का की कृषित जातियाँ इसकी जंगली जातियों जैसे ट्रिपसेकम (Tripsacum) तथा यूक्लीना (Euchlcana) से विकसित हुई।

मक्का की 50% पैदावार संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) के मक्का पट्टी (corn belt) क्षेत्र में होती है। ब्राजील, रुस, मेक्सिकों, इटली, यूगोस्लोवेया, रोमानिया, हंगरी, अर्जन्टीना, दक्षिण अफ्रीका, भारत तथा इन्डोनेशिया में मक्का की खेती होती है।

भारत में मक्का, मुख्यतः उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान तथा उड़ीसा में उगाया जाता है।

मक्का के वानस्पतिक लक्षण (Botanical Characteristics)

मक्का एक वार्षिक (annual) पौधा है। जिसका स्तम्भ अशाखित, 1-5 मीटर तक लम्बा होता है। इसमें तलशाखायें (tillers) बहुत कम मिलती है।

स्तम्भ की आधारीय पर्वसन्धियों से अपस्थानिक झकड़ा जड़े (adventitious fibrous roots) उत्पन्न होती हैं। इसके आधारीय पर्व (internodes) मोटे व छोटे होते हैं, जोकि ऊपर की ओर धीरे-धीरे पतले एवं लम्बे होते जाते हैं तथा अन्ततः असीमाक्ष (panicle) नर पुष्पक्रम धारण करता है। मक्का के पौधे उभयलिंगाश्रयी (monoecious) व पृथकलिंगी (diclinous) होते हैं।

इसके फल को कैरियोप्सिस (caryopsis) कहते हैं, जिनमें दो प्रकार के भ्रूणपोष होते हैं। इनमे से एक पीला व कठोर (अधिक प्रोटीन युक्त) व दूसरा सफेद व कोमल (कम स्टार्च युक्त) प्रकार का होता है। विभिन्न जातियों में भ्रूणपोषों के रंगों में भिन्नता संभव है।

जलवायु एवं मृदा (Climate and Soil)

मक्का उपोष्ण (sub-tropical) क्षेत्रों की फसल है। जिसकी खेती के लिये 21-27°C तापक्रम व 60-120 cm वार्षिक वर्षा उपयुक्त रहती है। जलोढ़ (alluvial) व दुमट (loam) मृदा में इसकी पैदावार अच्छी होती है।

मक्का की खेती (Cultivation)

मक्का खरीफ की फसल है। इसकी खेती की प्रक्रिया निम्न चरणों में पूर्ण होती है।

1. खेत की तैयारी (Preparation of Field)

बुवाई से पूर्व खेत की 4-6 बार जुताई की जाती है बीच-बीच मे मिट्टी पलटने वाले हल को भी . प्रयुक्त कि जाता है। जुताई से मिट्टी को भुर-भरी (pulverised) बना लिया जाता है तथा साथ ही खरपतवारों को भी हटा दिया जाता है।

2. खाद व उर्वरक (Manure and Fertilizer)

मक्का की खेती के लिए प्रचुर खाद की आवश्यकता होती है। 25-30 गाड़ी सड़ा हुआ गोबर का या कम्पोस्ट खाद प्रति हैक्टेयर की आवश्यकता होती है। संकर किस्मों के लिये 100-120 किया. नाइट्रोजन प्रति हैक्टेयर की आवश्यक होती है। नाइट्रोजन खाद तीन बार में दी जाती है। प्रथम बार में बुवाई के समय, दूसरी बार जब पादप घुटनों की ऊंचाई तक हो जाये तथा तीसरी बार वल्लर (tassel) के विकसित होने के समय नाइट्रोजन दिया जाता है। नाइट्रोजन के अतिरिक्त P2O5 तथा K2O भी. क्रमशः 60 व 40 किग्रा. प्रति हैक्टेयर की दर से दिये जाते हैं।

3. बुवाई (Sowing)

भारत में मक्का की बुवाई प्राय: जून-जुलाई व कटाई सितम्बर-अक्टुबर में होती है। बुवाई छिड़काव विधि या हल के साथ नायले द्वारा की जाती है। बुवाई के लिये मशीनों को भी प्रयुक्त किया जाता है।

4. सिंचाई (Irrigation )

मक्का की खेती के लिए महीने में तीन सिंचाई पर्याप्त होती हैं। मृदा में पानी की अधिकता मक्का मे के खेती को नुकसान पहुंचा सकती है परन्तु पुष्पन के दौरान सिंचाई अत्यन्त आवश्यक होती है।

5. सस्यकर्तन (Harvesting)

जब पादप की पत्तियाँ पाली पड़ने लगे एवं बीजों के परिपक्व होने पर भुट्टों को काट लिया जाता है। भुट्टों को छीलकर, साफ मैदान मे सूखने के लिए फैला दिया जाता है। सूखे भुट्टों को पीटकर दाने को पृथक कर लेते हैं। भुट्टों को तोड़ने के बाद बेची फसल को काट कर चारे के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। अनेक बार कच्चे भुट्टों को ही तोड़ लिया जाता है जिन्हें भूनकर तथा उबालकर खाया जाता है।

6. उपज (Vield)

सिन्धु गंगा मैदान में सिचित मक्का की उपज लगभग 4000 किमा. प्रति हैक्टेयर होती है जबकि असिंचित क्षेत्रों में उपज 1000-2000 किमा. प्रति हेक्टयर होती है।

मक्का की उन्नत किस्मे (Improved Varities)

मक्का में प्रजनन उत्पादन बढ़ाने, अनुकूलन (adaptation), पतन प्रतिरोध (lodging resistance), भुट्टे के झड़ने से रोकने के लिये प्रतिरोध (resistance to ear lodging), रोग प्रतिरोध (disease resistance), कीट प्रतिरोध (insect resistance), तथा पोषक पदार्थों की मात्रा बढ़ाने के उद्देश्य से किया गया है।

IARI, नई दिल्ली द्वारा मक्का की कई उन्नत किस्में विकसित की गई है ये निम्न प्रकार है –

  1. Dekalb-India-1(DKI-1)—यह एक ओजस्वी (vigorous), मध्यम ऊंचाई की किस्म है जिसके दाने पीले-नांरगी होते हैं। यह किसम लगभग 105-110 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है। यह फसल पतन (lodging) व हैल्मन्यैस्पोरियम (Helminthosporium) नामक कवक के प्रति प्रतिरोधी होती है।
  2. Ganga-5- यह किस्म ओजस्वी, ऊंची (taller) तथा इसके दाने नांरगी-पीले होते हैं। फसल 95-100 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है। यह पतन (lodging) व मृदुरोमिल आसिता (downy mildew) रोग के प्रति प्रतिरोधी होती है।
  3. Ganga-101- इस किस्म का स्तम्भ मोटा व पत्तियाँ चौड़ी तथा गहरी हरी होती हैं। इसके – दाने गोलाकार व नारंगी पीले होते हैं। यह फसल 100-110 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। यह पतन, मृदुरोमिल आसिता, अंगामारी (blight) व किट्ट रोगों (rusts) के प्रति प्रतिरोधी होती है।
  4. Hi-starch – इस किस्म का स्तम्भ मोटा व पौधा अपेक्षाकृत गहरे हरे रंग का होता है। इसके दाने चपटे व पीले रंग के होते हैं। यह फसल लगभग 95-110 दिनों में तैयार हो जाती है। यह मृदुरोमिल आसिता व जलाक्रान्ति दशा (water-logging) के प्रति प्रतिरोधी होती है। उद्योगों में स्टार्च की पूर्ति करने के उद्देश्य से इस किस्म को विकसित किया गया है।
  5. Amber — इस किस्म के पौधे ऊँचें, ओजस्वी व मृदुरोमिल आसिता व अंगमारी के प्रति प्रतिरोधी होते हैं। यह फसल 110 से 115 दिनों मे पक कर तैयार हो जाती है। इसकी पैदावार अन्य किस्मों के तुलना में कुछ अधिक होती है। –
  6. Shakti—यह किस्म मध्य प्रदेश, राजस्थान व उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्रों में उगायी जाती है इसके दाने हल्के पीले व मुलायम होते हैं।

मक्का के उपयोग (Uses)

  1. मक्का के दानों को उच्च ताप पर फुला कर पाप कार्न के रूप में खाया जाता है।
  2. बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान व मध्य प्रदेश में इसकी खिचड़ी (घाट, porridge) व आटे की रोटी (सोगरा) बनायी जाती है।
  3. कच्चे भुट्टों को भूनकर, उबालकर, पकोड़ी व जाजरा (मिठाई) के रूप में खाया जाता है।
  4. मक्का से एल्कोहालिक पेय पदार्थ भी तैयार होते हैं। मक्का के अनेक प्रकार के उत्पाद जैसे-कार्न आयल, कॉर्न शुगर, कॉर्न फ्लोर इत्यादि तैयार किये जाते हैं। जो बेकरी व कन्फेक्शनरी मे केक बिस्कुट इत्यादि में प्रयुक्त होते है।
  1. मक्का से बने कॉर्न फ्लेक्स को दूध के साथ नाश्ते में लिया जाता है।
  2. पशुओं को मक्का के पादपों व भुट्टे के दाने चारे के रूप में दिये जाते हैं।
  3. मक्का के दानों में उपस्थित प्रोटीन जीन (zein) से कृत्रिम रेशे बनाये जाते हैं।
  4. मक्का के पादपों के तने व डंठल से पेपर बनाये जाते हैं।

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