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भारत में वनों का वर्गीकरण Classification of Forests in India | वनों का आर्थिक महत्व economic importance of forests

भारतीय वनों के भौगोलिक वर्गीकरण, भारतीय वनों की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन, लाभ, महत्व, योजनाएं, आंदोलन Geographical classification of Indian forests, description of major features of Indian forests, benefits, importance, plans, movement

किसी भी भौगोलिक प्रदेश में या भूमि सतह पर वनस्पति का वह आवरण जिसके उगने , फलने – फूलने तथा विकसित होने में मानव की कोई भूमिका नहीं होती , उसे ‘ प्राकृतिक वनस्पति ‘ कहते हैं । भारत में प्रतिवर्ष 1 से 7 जुलाई के मध्य वन महोत्सव मनाया जाता है । यह महोत्सव केन्द्रीय कृषि मंत्री डॉ . के.एम. मुंशी के द्वारा सन् 1950 में प्रारम्भ किया गया । वन समवर्ती सूची का विषय है

वनों का वर्गीकरण classification of forests

वैधानिक दृष्टिकोण से देश में वनों को तीन श्रेणियों में बाँटा गया है

1. आरक्षित वन reserve forest

ये जलवायु की दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण वन हैं , जिनमें लकड़ी काटने व पशु चराई पर पूर्ण प्रतिबंध होता है । ये वन सरकार के प्रत्यक्ष पर्यवेक्षण में रहते हैं । वन रिपोर्ट 2017 के अनुसार भारत में ये वन 434705 वर्ग किमी . है ।

2.रक्षित वन protected forest

इन वनों में सीमित मात्रा में वन विभाग की अनुमति से सूखी लकड़ी की कटाई व पशु चारण की सुविधा प्रदान की जाती है । वन रिपोर्ट 2017 के अनुसार भारत में ये वन 219432 वर्ग किमी . है

3. अवर्गीकृत वन unclassified forest

ये निम्न श्रेणी के छितरे वन हैं । इनमें पशु चराई व लकड़ी काटने पर प्रतिबंध नहीं होता है । वन रिपोर्ट 2017 के अनुसार भारत में ये वन 113881 वर्ग किमी हैं ।

प्रशासनिक दृष्टि से वनों का वर्गीकरण Classification of forests from administrative point of view

1. राजकीय वन state forest

इन वन क्षेत्रों पर सरकार का पूर्ण नियंत्रण होता है । भारत में लगभग 95 प्रतिशत वन क्षेत्र इस श्रेणी आते हैं ।

2. सामुदायिक या वाणिज्यिक वन community or commercial forest

इस प्रकार के वनों पर नगर निगम , नगर परिषद , नगर पालिकाओं , जिला परिषदों आदि का नियंत्रण होता है । भारत में 3 प्रतिशत वन इसी श्रेणी में आते है ।

3.व्यक्तिगत वन personal forest

इसमें व्यक्तिगत स्तर पर लगाए गए वन सम्मिलित हैं। भारत में 2 प्रतिशत वन इस श्रेणी में आते है ।

वनों का महत्व importance of forests

वनों के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष दोनों ही लाभ हैं । प्रत्यक्ष लाभ जहाँ आर्थिक रूप से लाभकारी होते हैं वहीं अप्रत्यक्ष लाभों के अंतर्गत पारिस्थितिक संतुलन व टिकाऊ विकास में इनकी भूमिका को शामिल किया जाता है ।

वनों के प्रत्यक्ष लाभ direct benefits of forests

कागज , दियासलाई , कत्था , रेशम , लाह , बीड़ी , पत्तल , खिलौना , लकड़ी चीरना , प्लाईवुड , औषधि आदि उद्योगों के लिए वनां से ही कच्चा माल प्राप्त हो रहा है । डाबर , ऊँझा , झंडू , वैद्यनाथ , हमदर्द आदि औषधि उद्योगों के लिए कच्चे माल वनों से मिल रहे हैं ।

 वनों के अप्रत्यक्ष लाभ indirect benefits of forests

वनों के अप्रत्यक्ष लाभ पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने में अत्यधिक महत्वपूर्ण है । यह वायुमण्डल में ऑक्सीजन की उपलब्धता को बढ़ाता है एवं विषैली गैसों की मात्रा को कम करता है । वन मृदा अपरदन को रोकने में सहायक हैं एवं मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता को भी बनाए रखते हैं । ये भूमिगत जलस्तर को बढ़ाते हैं एवं नदियों की गति को कम करते हैं जिनसे क्रमशः सूखा व बाढ़ नियंत्रण में मदद मिलती है । वन जंगली जीव जंतुओं के प्राकृतिक आश्रय हैं एवं जैव विविधता के विशाल भंडार हैं ।

वनों के संरक्षण के लिए किए गए आन्दोलन Movements made for the protection of forests

चिपको आंदोलन

भारत में 1973 ई . में उत्तराखण्ड के चमोली जिले के गोपेश्वर में सुन्दर लाल बहुगुणा एवं चंडी प्रसाद भट्ट ने इस आंदोलन की शुरुआत की । इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य हिमालयी क्षेत्रों में वृक्षों की गैरकानूनी कटाई को रोकना था ।

एप्पिको आंदोलन

चिपको आन्दोलन की तरह एपिको आन्दोलन ‘ कर्नाटक में पाण्डुरंग हेगड़े के नेतृत्व में चलाया था , जिसका उद्देश्य वनों के रोपण , संरक्षण , विकास एवं उनके विवेकपूर्ण उपयोग को सुनिश्चित करना था ।

नर्मदा बचाओ आंदोलन

नर्मदा नदी पर जल विद्युत उत्पादन के ऊँचे बाँध बनाने के विरोध में स्थानीय व पर्यावरणविद् लोगों द्वारा 1985 से विरोध शुरू किया गया , इस आंदोलन की शुरूआत मेधा पाटेकर के नेतृत्व में की गई थी ।

पश्चिमी घाट बचाओ आंदोलन

गोवा की पीपुल्स पार्टी द्वारा चलाया गया आंदोलन था , जिसका प्रमुख नारा जंगल बचाओ , मानव बचाओ था ।

मैत्री आंदोलन

उत्तराखण्ड में सन् 1995 में कल्याण सिंह रावत के नेतृत्व में चलाया गया आंदोलन था , जिसमें मैत्री का अर्थ मायका था । इसमें कुंवारी कन्याएँ पौधों की पौध तैयार कर विवाह के दिन उसका रोपण करती है।

खेजड़ली आंदोलन

वि.सं. 1787 ( भाद्रपद शुक्ल दशमी, 1730 ई. ) को जोधपुर के खेजड़ली गाँव में रामो बिश्नोई की पत्नी श्रीमती अमृता देवी के नेतृत्व में विश्नोई जाति के 363 लोगों ने वृक्षों की रक्षा हेतु आत्म बलिदान दिया था । यहाँ प्रतिवर्ष विश्व का एकमात्र वृक्ष मेला इनके बलिदान दिवस पर मनाया जाता है ।

एकीकृत वन संरक्षण योजना

यह योजना 10 वीं पंचवर्षीय योजना में लागू की गई। अब 11 वीं योजना के दौरान योजना आयोग ने इस स्कीम का नाम बदलकर ‘ वन प्रबंधन का तीव्रीकरण ‘ किए जाने का सुझाव दिया है । इस योजना में निम्न दो तत्व जोड़े जाने प्रस्तावित हैं – विशिष्ट वनस्पति तथा पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण तथा पुनर्स्थापन तथा पवित्र वृक्ष कुंजू का रक्षण तथा संरक्षण ।

भारतीय वानिकी अनुसंधान व शिक्षा परिषद् ( ICFRE ) Indian Council of Forestry Research and Education

इसका गठन 1987 में पर्यावरण तथा वन मंत्रालय के अन्तर्गत हुआ । देश के समग्र वानिकी अनुसंधान रणनीति विकसित करने के लिए यह देश की सर्वोच्च संस्था है ।

भारतीय वनों की समस्याएं Indian Forest Problems

वन क्षेत्र में खनन कार्य , अत्यधिक पशु चारण , वनों को जलाकर अस्थायी कृषि करने के कारण भारत में वन क्षेत्र निरन्तर कम होता जा रहा है । भारत में वनों का वितरण असमान है । बढ़ती जनसंख्या के कारण वनों की अंधाधुंध कटाई की जा रही है ।

वन संरक्षण के उपाय Forest Conservation Measures

वनों को विकसित एवं संरक्षित करने वाले विभिन्न कार्यक्रम यथा सामाजिक वानिकी , रूंख भायला , चिपको आन्दोलन को अधिक से अधिक बढ़ावा दिया जावे । वनों के प्रति समाज में सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित कर वनों को राष्ट्रीय धरोहर माना जावे व वृक्षारोपण में जनसहभागिता बढ़ायी जावे ।

तालाबों , नहरों , सड़कों के किनारे औद्योगिक क्षेत्र , आवासीय व सरकारी परिसरों मं लघु वन क्षेत्र विकसित किए जाए । वनों की अंधाधुंध कटाई रोकी जाये ।

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