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भारतीय संविधान सभा का निर्माण Creation of the Constituent Assembly of India in hindi

भारतीयों द्वारा संविधान सभा की माँग Demand for Constituent Assembly by Indians

भारतवासियों में राजनीतिक चेतना के साथ – साथ यह मांग भी प्रबल होती चली गई कि भारत के संविधान का निर्माण उन्हीं के द्वारा होना चाहिए । 1919 में अमृतसर में हुए कांग्रेस अधिवेशन में राष्ट्रीय आत्मनिर्णय के आधार पर पूर्ण स्वायत्तशासी शासन की मांग की गई । 1928 में हुए कांग्रेस अधिवेशन में ब्रिटिश सरकार से निवेदन किया गया कि वह भारत का संविधान बनाने के लिए एक संविधान सभा का आयोजन करे ।

पण्डित मोतीलाल नेहरू ने उसी वर्ष सर्वदलीय सम्मेलन में हुए निश्चयों के आधार पर भारतीय संविधान की रूपरेखा तैयार की 1 ब्रिटिश सरकार ने भारतवासियों की इस मांग की ओर तनिक भी ध्यान नहीं दिया । लन्दन में हुई गोलमेज कान्फ्रेन्सों से यह और भी स्पष्ट हो गया कि अंग्रेजी सरकार ऐसी किसी भी मांग को मानने के लिए तैयार नहीं थी । 1934 में स्वराज्य दल ने अन्य राष्ट्रों के समान ही भारत के लिए ‘ आत्मनिर्णय के अधिकार ‘ की मांग की और इस बात पर जोर दिया कि एक संविधान सभा बुलाई जाय जिसमें प्रत्येक वर्ग के दलों का प्रतिनिधित्व हो।

1936 के फैजपुर कांग्रेस अधिवेशन में एक प्रस्ताव पास किया गया जिसमें कहा गया कि भारतीय जनता केवल उसी संविधान को स्वीकार करेगी जिसका निर्माण उसने स्वयं किया हो तथा जो भारत की स्वाधीनता पर आधारित हो। प्रस्ताव में यह भी स्पष्ट किया गया कि “कांग्रेस निश्चित रूप से वस्तुतः लोकतन्त्रात्मक राज्य की स्थापना करना चाहती है, जिसमें राजसत्ता पूर्णतः भारतीय जनता में निहित हो तथा सरकार पर जनता का नियन्त्रण हो। ऐसे राज्य का निर्माण केवल संविधान सभा द्वारा ही किया जा सकता है जो वयस्क मताधिकार के आधार पर निर्वाचित हो तथा जिसे संविधान का निर्माण करने के समस्त अधिकार प्राप्त हों।”

1938 में हरीपुरा के कांग्रेस अधिवेशन में संविधान सभा की मांग को फिर दोहराया गया। 1939 में यूरोप में द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ जाने से अंग्रेज भारतीयों का सहयोग चाहते थे अतः उन्हें प्रसन्न करने के लिए गवर्नर जनरल लिनलिथगो ने 8 अगस्त, 1940 को घोषणा की कि युद्धोपरान्त भारतवासियों को स्वयं उनके संविधान के निर्माण का अधिकार दिया जायेगा। क्रिप्स योजना में भी इसे स्वीकार किया गया तथा संविधान सभा के निर्माण पर भी प्रकाश डाला गया। परन्तु क्रिप्स योजना के असफल होने के कारण इस ओर प्रगति नहीं हुई। 1946 में केबिनेट मिशन भारत आया और उसने संविधान सभा के गठन की रूपरेखा प्रस्तुत की।

केबिनेट मिशन योजना के आधार पर संविधान सभा के गठन की रूपरेखा Outline of the constitution of the Constituent Assembly on the basis of the Cabinet Mission Plan

(1) संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव प्रांतीय विधान सभाओं द्वारा तय किया गया था।

(2) सदस्यों के निर्वाचन का आधार जनसंख्या एवं साम्प्रदायिक दृष्टिकोण था। प्रति दस लाख व्यक्तियों पर एक सदस्य का चुनाव होना था।

(3) यह निर्वाचित संविधान सभा पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न संस्था नहीं थी। इसे ब्रिटिश संसद के आधीन रखा गया। इसके कार्य के लिए एक निर्दिष्ट विधि की व्यवस्था की गई थी।

(4) यह चुनाव केवल ब्रिटिश भारत के 296 स्थानों के लिए होना था।

(5) जुलाई में हुए संविधान सभा के इन चुनावों में कांग्रेस को 202 तथा मुस्लिम लीग को केवल 73 स्थान प्राप्त हुए।

संविधान सभा के निर्वाचन Constituent Assembly elections

केबिनेट मिशन योजना के अनुसार जुलाई-अगस्त, 1946 में निर्वाचन सम्पन्न हुए। ये चुनाव 296 स्थानों हेतु हुए। इन स्थानों में सामान्य वर्ग हेतु 210 स्थान, मुस्लिम वर्ग हेतु 78 स्थान, पंजाबी सिक्खों हेतु 4 स्थान, 3 स्थान चीफ कमिश्नर प्रान्तों हेतु तथा 1 स्थान बलूचिस्तान का था। चुनाव परिणामों में निम्न प्रकार स्थिति उभरी-कांग्रेस-202, मुस्लिम लीग- 73, निर्दलीय – 8, एकतावादी मुसलमान – 2, भारतीय ईसाई-2, कृषक प्रजा पार्टी – 1, अनु. जाति संघ-1, हिन्दू महासभा-1, एंग्लो-इण्डियन – 1, साम्यवादी-1, कुल स्थान 292 ।

सिक्खों ने पहले चुनावों का बहिष्कार किया था किन्तु बाद में पंथिक बोर्ड ने 4 प्रतिनिधि भेज दिए ।

संविधान सभा से मुस्लिम लीग का पृथक् होना The separation of the Muslim League from the Constituent Assembly

14 नवम्बर, 1946 को जिन्ना ने केबिनट मिशन योजना से असहमति प्रकट करते हुए संविधान सभा तथा अंतरिम सरकार से मुस्लिम लीग को हटा लिया। विभिन्न प्रयासों का कोई नतीजा नहीं निकला। जिन्ना का कहना था, “वह कांग्रेस की अधीनता या उसकी गुलामी की स्थिति कभी स्वीकार नहीं करेगा। सम्भवतः

मुस्लिम वर्ग के नेता जिन्ना को यह भय था कि संविधान सभा में कांग्रेस का स्पष्ट एवं भारी बहुमत है, कहीं बहुमत के कारण उनके एवं उनके वर्ग की उपेक्षा या दमन न हो।

संविधान सभा का प्रारम्भ Constituent Assembly begins

लन्दन में विभिन्न एकता प्रयासों की विफलता के बाद 9 दिसम्बर, 1946 को नई दिल्ली में भारत की शेष (मुस्लिम लीग को छोड़कर) संविधान सभा ने अपना कार्य प्रारम्भ किया। सबसे वयोवृद्ध सदस्य सर सच्चिदानन्द सिन्हा (75 वर्षीय) को अन्तरिम अध्यक्ष चुना गया तथा बाद में स्थायी अध्यक्ष के रूप में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को चुना गया तथा संविधान सभा ने विधिवत अपना कार्य प्रारम्भ किया।

उद्देश्य Objective

पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने इस संविधान सभा में घोषित किया कि इस सभा का उद्देश्य ऐसा संविधान तैयार करना है जिसके अधीन शासन की शक्ति का स्रोत जनता को माना जायेगा, जिसके अधीन सब लोगों को अवसर की समानता दी जायेगी, जिसके अधीन सब लोग कानून के सामने बराबर होंगे, जिसके अधीन सब लोगों को विचार और उसके प्रकाशन, विश्वास, मन्तव्य, पूजा, व्यवसाय और कार्य की स्वतन्त्रता दी जायेगी।

प्रारूप कमेटी (Drafting Committee)

संविधान सभा ने अपने काम को सुचारु रूप से चलाने के लिए कुछ उप-सभाएँ या कमेटियाँ बना दीं जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण प्रारूप कमेटी थी जिसके प्रधान डॉ. भीमराव अम्बेडकर थे। इस कमेटी ने 8 मास के लगातार प्रयत्न से भारत के संविधान की रूपरेखा तैयार की।

संविधान की स्वीकृति

प्रारूप की एक-एक धारा पर संविधान सभा में विचार किया – गया। अन्त में 2 वर्ष 11 मास 18 दिन के कठिन परिश्रम के पश्चात् 26 नवम्बर, 1949 को भारत का सम्पूर्ण संविधान पास कर दिया गया। इसमें 8 अनुसूचियाँ और 395 धाराएँ थीं। 26 जनवरी, 1950 को इसे लागू कर दिया गया।

संविधान सभा के समक्ष कठिनाइयाँ Difficulties before the Constituent Assembly

भारत जैसे विशाल देश के संविधान का निर्माण करना कोई सरल बात नहीं थी। इसके निर्माण में निर्माणकर्ताओं के सम्मुख अनेक समस्याएँ एवं कठिनाइयां उत्पन्न हुईं, जो प्रमुख रूप से निम्नलिखित थीं—

(1) लीग द्वारा संविधान सभा का बहिष्कार-

संविधान सभा की प्रथम बैठक सच्चिदानन्द सिन्हा की अध्यक्षता में 9 दिसम्बर, 1946 को प्रारम्भ हुई। 11 दिसम्बर, 1946 को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को इस सभा का स्थाई अध्यक्ष चुना गया। मुस्लिम लीग ने इस संविधान सभा का बहिष्कार किया और यह मांग प्रस्तुत की कि हिन्दू तथा मुसलमान दो पृथक्-पृथक् जातियाँ हैं इसलिए दोनों के लिए अलग-अलग संविधान सभाओं का प्रयोजन होना चाहिए। लीग द्वारा बहिष्कार करने के बावजूद भी कांग्रेस ने संविधान सभा द्वारा संविधान निर्माण का कार्य जारी रखा।

(2) भारत की विशालता

निर्माणकर्ताओं को विश्व के एक सबसे बड़े प्रजातन्त्र के लिए संविधान तैयार करना था जो कि बड़ा ही दुष्कर कार्य था क्योंकि यहां विभिन्न धर्मों एवं जातियों के व्यक्ति निवास करते हैं। उन्हें सभी को सन्तुष्ट करना था।

(3) ब्रिटिश सरकार की नीतियाँ

ब्रिटिश सरकारकी नीतियों के फलस्वरूप देश में साम्प्रदायिकता, प्रान्तीयता, भाषावाद आदि अनेक समस्याएँ खड़ी हो गई थीं जिनके कारण संविधान निर्माताओं को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

(4) साम्प्रदायिकतावाद

1946 में साम्प्रदायिकता अपनी चरम सीमा पर थी जिससे भी अनेक कठिनाइयों ने जन्म लिया।

(5) पाकिस्तान का निर्माण-

1947 में भारत विभाजन के परिणामस्वरूप पाकिस्तान के निर्माण ने देश के सम्मुख अनेक प्रशासनिक एवं सुरक्षात्मक समस्याएँ खड़ी कर दी थीं। इन समस्याओं के सन्दर्भ में भी विचार करना था।

(6) देशी रियासतें –

देशी रियासतें भी संविधान निर्माणकर्ताओं के सम्मुख अत्यन्त कठिनाई पूर्ण रहीं। इन्होंने अनेक समस्याओं को जन्म दिया। केबिनेट मिशन तथा माउन्टबेटन योजना के द्वारा देशी रियासतों को यह अधिकार दिया गया था कि वे चाहें तो स्वतन्त्र रह सकती हैं अथवा चाहें तो भारत में विलय कर सकती हैं। जिसके कारण निर्माणकर्ताओं को भारत की अखण्डता तथा लोकतन्त्रीय व्यवस्था को स्थापित करने के लिए अथक परिश्रम करना पड़ा।

(7) अन्य कठिनाइयाँ-

आदिम जाति, अनुसूचित जाति, पिछड़े वर्गों तथा अल्पसंख्यक वर्गों की सुरक्षा आदि के सम्बन्ध में संवैधानिक उपबन्धों का निर्माण करना संविधान निर्माताओं के सामने अत्यन्त महत्वपूर्ण समस्या थी।

इस प्रकार उपरोक्त अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुए निर्माताओं ने संविधान का निर्माण किया ।

संविधान में निहित विचारधारा

के. सन्थानम ने लिखा है कि “संविधान में केवल सरकार के तन्त्र के ढाँचे की हो व्यवस्था नहीं होती अपितु उसमें संविधान निर्माताओं की विचारधाराओं का भी समावेश रहता है। भारतीय संविधान के बारे में यह विशेष रूप से सच है।” भारतीय संविधान के निर्माण में निम्नलिखित चार विचारधाराओं का समावेश हुआ है

(1) ब्रिटिश लोकतन्त्र की समर्थक विचारधाराएँ

संविधान निर्माण सभा के कुछ प्रमुख सदस्य जैसे अम्बेडकर, सर अल्लादी कृष्ण स्वामी अय्यर, के. एम. मुन्शी तथा एन. गोपाल स्वामी आयंगर आदि ब्रिटिश लोकतन्त्र के समर्थक थे। इन सदस्यों की विचारधारा पर ब्रिटिश लोकतन्त्र के प्रमुख तत्वों—व्यक्तिगत स्वतन्त्रता, विधि का शासन तथा उत्तरदायी सरकार का प्रमुख रूप से प्रभाव था जो कि संविधान के निर्माण में सन्निहित हुए।

(2) समाजवादी विचारधारा-जवाहर लाल नेहरू की विचारधारा 1930 के बाद से समाजवादी रही । उनका विश्वास था कि सामाजिक पहलुओं का लोकतान्त्रिक सरकार के साथ सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है। इस प्रकार संविधान के निर्माण में समाजवादी विचारधारा का भी समावेश हुआ है।

(3) गांधीवादी विचारधारा-संविधान सभा के बहुत से सदस्य गांधीवादी विचारधारा से प्रभावित थे। ये लोग गांधीजी के कुछ उपदेशों जैसे—अस्पृश्यता उन्मूलन, महिलाओं को समान अधिकार, ग्राम पंचायत, कुटीर उद्योग आदि का संविधान में समावेश कराने में सफल हुए।

(4) ब्रिटिशकालीन अधिनियमों का प्रभाव-1920 के मांटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधारों ने भारत के लिए संघात्मक संविधानिक आधार उपयुक्त माना। यही विचार भारत सरकार अधिनियम 1935 में व्यक्त किये गये जिसने संघात्मक शासन प्रणाली की व्यवस्था की थी परन्तु इसमें संसद को सर्वोच्च शक्तिशाली माना गया तथा संसद के अधिकारों का प्रयोग वायसराय तथा गवर्नरों द्वारा किये जाने की व्यवस्था थी। परन्तु केबिनेट मिशन योजना ने एक ऐसे संघ का निर्माण किया जिसमें केन्द्र को न्यूनतम शक्तियाँ तथा इकाइयों को अधिकतम स्वतन्त्रता प्रदान की गई। इस प्रकार विभिन्न अधिनियमों का प्रभाव भारत के संविधान के निर्माण पर पड़ा।

उपरोक्त चारों विचारधाराएँ संविधान की प्रस्तावना, मूल अधिकार तथा राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में निहित हैं।

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