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पादप पारिस्थितिकी क्या है उद्देश्य, इतिहास, कार्यक्षेत्र, महत्व | What is Plant Ecology Purpose, History, Scope, Significance

पादप पारिस्थितिकी का परिचय

पादप पारिस्थितिकी– पृथ्वी पर उपस्थिति समस्त जीव (पादप एवं जन्तु) भौतिक वातावरण एवं उद्विकासीय प्रक्रिया पथ तथा आपसी सम्बन्धों द्वारा परस्पर व निकटता से जुड़े हुए हैं। एक जीव, दूसरे जीव को भोजन या आवास प्रदान कर सकता है, या एक-दूसरे के लिए उपयोगी अथवा हानिकारक पदार्थ उत्पन्न कर सकता है, अथवा दोनों भोजन व आवास के लिए संघर्ष कर सकते हैं। अर्थात् जीव का उसके जैविक व अजैविक वातावरण के साथ पारस्परिक सम्बन्धों के अध्ययन को ही पारिस्थितिकी (ecology) या पारिस्थितिकी विज्ञान (Ecological Science) कहा जाता है।

Ecology शब्द का उद्भव ग्रीक भाषा के दो शब्दों Oikos ( Ecos) तथा Logous = House या घर Study या अध्ययन से हुआ है। यहाँ घर शब्द का अभिप्राय जन्तुओं के प्राकृतिक आवास या पर्यावरण से है। रीटर (1868) ने सर्वप्रथम इस शब्द का उपयोग पारिस्थितिकी के लिए किया था लेकिन जर्मन वैज्ञानिक अरनेस्ट हैकल ने इस शब्द की पूर्ण व्याख्या करके इसे परिभाषित किया। अमेरिका के फ्रेड्रिक क्लीमेन्टस (1916) ने इकोलोजी को जातियों का विज्ञान कहा है। भारत में पारिस्थितिविद् आर मिश्रा (1967) ने इकोलोजी को संरचना क्रियाओं और कारकों की अन्तक्रियाओं के रूप में परिभाषित किया।

आर. मिश्रा को भारत में इंकोलोजी का जनक (Father of Ecology) कहा गया है। मेक नोटन एवं वुल्फ (Mc Naughton and Wolf 1973) के अनुसार कार्यात्मक रूप से समान समष्टियों के समूह को पहचानना, जो एक ही स्थान व समय पर एक स्पष्ट समुदाय निर्मित करते हैं, ही पारिस्थितिकी है। इस शताब्दी के प्रारंभ में इकोलाजी का सर्वाधिक रुप से उपयोग हुआ किन्तु हाल के वर्षों में पारिस्थितिक विज्ञानियों द्वारा इकोलोजी के स्थान पर पारिस्थितिकी जीव विज्ञान (environmetal biology) शब्द का उपयोग किया जाने लगा है।

पारिस्थितिकी जीवविज्ञान के अन्तर्गत, समस्त जीवों एवं वातावरणीय कारकों के प्रभाव का कुल योग जो ग्लोबल स्तर पर जीवमण्डल को प्रभावित करता हो, अध्ययन किया जाता है। इसमें पारिस्थितिकी के साथ-साथ इकोनोमी (economy) व सामाजिक विज्ञान (sociology) का भी मूल्यांकन विश्व स्तर पर होने लगा है।

पादप पारिस्थितिकी का इतिहास (History of Plant Ecology)

पारिस्थितिकी का ज्ञान उतना ही पुराना है जितना पुरातन, मानव स्वयं है। प्राचीन काल में भारतीय ऋषियों और मुनियों को पारिस्थितकी ज्ञान था जिसका उल्लेख वेदों, उपनिषदों, पुराणों तथा अन्य प्राचीन मन्थों में सामान्यतः मिलता है। भारतीय औषधि-विज्ञान के आदि गुरु ‘चरक’ ने लगभग 200 ई. पू. पादप जीवन के लिए वायु, मिट्टी, जल तथा काल (समय) को अत्यन्त आवश्यक कारकों (factors) के रूप में प्रतिपादित किया था। इन्हीं सिद्धान्तों पर उन्होंने औषधि-विज्ञान का आधारभूत प्रन्थ ‘चरक संहिता’ द्वारा समस्त मानव समाज का कल्याण किया है।

महाकवि कालिदास के ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ तथा ‘मेघदूत’ जैसे महाकाव्यों में मानव मन मस्तिष्क पर पर्यावरण का प्रभाव प्रदर्शित किया गया है। आधुनिक पारिस्थितिकी विज्ञान के सन्दर्भ में ग्रीस (यूनान) निवासी थियोफ्रास्टस (ईसा से 390-250 वर्ष पूर्व) का नाम सर्वप्रथम उल्लेखनीय है। इन्होंने सबसे पहले पादपों के आपसी सम्बन्ध एवं उन पर प्राकृतिक वातावरण के प्रभाव का लिखित वर्णन प्रस्तुत किया था। आधुनिक औषधि-विज्ञान के जन्मदाता हिप्पोक्रेटीज ने पर्यावरण के ज्ञान को सभी चिकित्सकों के लिए आवश्यक बताया और महान दार्शनिक अरस्तू ने भी इस विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किये। हालांकि हैकल ने पारिस्थितिकी को परिभाषित किया परन्तु उनसे पहले भी अनेक वैज्ञानिकों ने इस विषय पर अनेक ग्रन्थ प्रस्तुत किये जो कालान्तर में आधुनिक ज्ञान के आधार स्तम्भ के रूप में उपयोगी सिद्ध हुये हैं।

भारत में पारिस्थितिकी पर अध्ययन कार्य का प्रारंभ 1950 में हुआ। भारत के पारिस्थितिकी जनक (Father of ecology) प्रोफेसर आर मिश्रा (Prof. R.Mishra) हैं जो बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय में इकोलोजी के प्रोफेसर थे। उनके बाद जी. पुरी. (G.Puri), एस. सी. पांड्या (S.C. Pandeya), रामाकृष्णन (Ramakrishan), प्रो. आर. एम. एम्बेस्ट (R.M. Ambast), प्रो.जे.एस. सिंह (Prof J.S.Singh), प्रो. ब्रिज गोपाल (Prof. Brij Gopal) इत्यादि प्रमुख पारिस्थितिकीविज्ञ है जिनका इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

भारतवर्ष में जनसाधारण को पारिस्थितिकी का परिचय हमारी भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्व. इन्दिरा गांधी द्वारा कराया गया है। उन्होंने आधुनिक भारत में सर्वप्रथम एक स्वतंत्र पर्यावरण मंत्रालय की स्थापना करके विज्ञान के इस विषय के वास्तविक महत्व को समझा तथा उन्हीं के निर्देशन में और संरक्षण में भारत के वैज्ञानिकों के एक समूह ने दक्षिणी ध्रुव के पर्यावरण का अध्ययन करने में सफलता प्राप्त की, जिसके दूरगामी परिणाम आधुनिक पारिस्थितिकी विज्ञान को एक नया आयाम देने में सक्षम साबित होंगे। आज से कई वर्ष पूर्व अर्थात् 5 से 16 जून 1972 को स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में ‘विश्व पर्यावरण संरक्षण’ नाम से एक विश्वव्यापी सम्मेलन आयोजित किया गया था जिसमें 27 देशों के 110 विशेषज्ञों ने भाग लिया था, तभी से प्रत्येक वर्ष 5 जून को ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ के रूप में मनाया जाने लगा।

पारिस्थितिकी के उद्देश्य (Objectives of Ecology)

1. जीवों का पृथ्वी पर वितरण (Distribution of organisms on the earth) -पादप व जन्तुओं की भिन्न-भिन्न जातियाँ विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में पाई जाती है। कुछ जातियाँ स्थान विशेष में ही वृद्धि करती हैं जबकि कई विश्व व्यापी होती है। अतः स्थानीय भौगोलिक जीवों में उपस्थित वितरण ज्ञात करना आवश्यक हो जाता है।

2. क्षेत्रीय विभिन्नतायें (Regional variations in the organisms)- जातियों का भिन्न-भिन्न आवासों में उपस्थिति से इनमें विभिन्नतायें पाई जाती है जिसका अध्ययन इकोलोजी का मुख्य उद्देश्य है।

3. जीवों की उपस्थिति बाहुल्यता व क्रियाओं में टेम्पारेल परिवर्तन (temporal change in the occurence abundance and activities of organism) का अध्ययन |

4. जीवों की समष्टि व सामुदायिक सम्बन्ध (interrelationships of population and community of organsim) का अध्ययन

5. जीवों में भौगोलिक स्थिति के अनुसार अनुकूलन (adaptation of organisms according to their geographical position) का अध्ययन तथा

6. प्राकृतिक वातावरण में जीवों के व्यवहार (behaviour of organisms in the natural enviornment) का अध्ययन, आदि इकोलोजी के प्रमुख उद्देश्य है‌।

पारिस्थितिकी विज्ञान का महत्व (Significance of Ecology)

पारिस्थितिकी अध्ययन मानव जाति के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है। मानव स्वयं एक जीवधारी है। और अपने भोजन, कपड़े, दवाओं, आदि के लिए सदैव अपने वातावरण के विभिन्न जीवधारियों और अजैविक घटकों पर निर्भर रहता है। पारिस्थितिकी विज्ञान निम्नलिखित क्षेत्रों में उपयोगी हो सकती है

1. जीवन को सरल व स्वस्थ बनाये रखने के लिए जीवन को सरल और स्वस्थ बनाये रखने के लिए हमें पारिस्थितिकी का पूर्ण ज्ञान होना अत्यन्त आवश्यक है, जिसमें वातावरण के विभिन्न घटकों (various components) के साथ सामंजस्य से अपनी दैनिक जैविक क्रियाओं का सही संचालन किया जा सके।

2. आर्थिक समस्याओं के समाधान के लिए – भोजन, कपड़े ओर औषधियों इत्यादि आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सभी पशु, पौधों, बाग-बगीचों, जंगलों, नदी तालाबों और समुद्र आदि का संरक्षण पूर्ण सदुपयोग और उत्पादन में वृद्धि, उत्पादन एवं संरक्षण पारिस्थितिकी के उचित ज्ञान द्वारा ही संभव है।

3. जनसंख्या नियन्त्रण के लिए वर्तमान में बढ़ती हुई आबादी की आर्थिक आवश्यकताओं में पारिस्थितिकी का अध्ययन और भी अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। विज्ञान की इस शाखा से जनसंख्या पर उचित नियन्त्रण लगाना भी सम्भव हो पाया है।

4. पर्यावरण प्रदूषण व उनका निवारण- हाल ही कुछ वर्षों में कृषि जगत में अनेक कोटनाशक ( insecticides) कवक नाशक (fungicides), खरपतवार नाशक, आदि रसायनों का अन्धाधुन्ध प्रयोग होता रहा है, जिससे मानव में प्राणघातक रोग उत्पन्न हुए हैं। प्रतिजैविक दवाओं (anitbiotics) की समस्या भी गम्भीर है। इसी प्राकर औद्योगिक संस्थाओं से अनेक गैसें और रसायन वायुमण्डल और जलस्रोतों को प्रदूषित कर प्राणघातक रोग फैला रहे हैं। इन भीषण समस्याओं का समाधान पर्यावरण प्रदूषण पारिस्थितिकी और रसायन पारिस्थितिकी के माध्यम से किया जा रहा है।

5. जीवों का स्थानीय एवं भौगोलिक वितरण तथा पारित्रारूपों (ecotype) का अध्ययन भी पारिस्थितिकी के अन्तर्गत किया जाता है।

(i) पारिजाति (Ecospecies) -ग्रीगर (Gregor) ने 1939 पारिजाति को परिभाषित किया । वास्तव में यह जीन इकोलोजिकल वर्गीकरण की इकाई (unit of gene ecological classfication) है, जिसके सदस्य अन्तर्जनन करते हैं तथा इनके एक से अधिक पारिप्रारूप (ecotypes) भी उपस्थित हो सकते हैं इसमें अर्न्तजनन की क्षमता पायी जाती है।

(ii) पारिज (Ecads) यह पारिप्रारूप से निचली श्रेणी के अन्तर्गत रखे गये थे। इसमें भिन्न-भिन्न भौगोलिक स्थितियों में उगने के कारण इनमें स्थानीय जलवायु के अनुसार कुछ आकारिकी अथवा कार्य की भिन्नतायें (variations) उत्पन्न हो जाती हैं। यह भिन्नतायें आनुवंशिक स्तर पर स्थिर नहीं होती तथा अस्थायी होती हैं। अतः ऐसे पारिजों को यदि इनके मूल स्थान पर पुर्नस्थापित कर दिया जाता है तो यह विभिन्नतायें समाप्त हो जाती हैं।

(iii) पारिप्रारूप (Ecotypes)—यह भी पारिजो (ecads) की भांति भिन्न-भिन्न वातावरण में उगने के कारण भिन्नतायें प्रदर्शित करते हैं लेकिन उत्पन्न भिन्नता स्थायी व आनुवंशिक स्तर पर स्थिर होती है अतः यह भिन्नतायें मूल आवास में पादपों का स्थानान्तरित करने पर भी समाप्त नहीं होती। यह पारिजाति से निचली श्रेणी में आते है क्योंकि इनमें भिन्नतायें तो पैदा होती है, परन्तु यह अर्न्तजनन करने योग्य होते है अतः इनकी जाति एक ही होती है।

6. मृदा अपरदन (soil erosion)-पुनः वनोत्पादन (reforestation), जंगली जानवर पुनःभरण (restoration of wild animals), घासमैदान (grasslands), बाढ़ नियन्त्रण (flood control) इत्यादि के लिये पारिस्थितिकी का अध्ययन महत्वपूर्ण है।

7. पादप पारिस्थितिकी, वानिकी (forestry) विशेषकर (silviculture) के क्षेत्र में विकास के लिये महत्वपूर्ण है।
है।

8. कृषि, खाद्य उत्पादन, पुष्प विज्ञान इत्यादि क्षेत्रों में भी पारिस्थितिकी का अपना विशिष्ट स्थान

9. विभिन्न प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र जैसे शुष्क, सदाहरित, आर्द्र सदाहरित वन (हिमालय) दक्षिणी आर्द्र पर्णपाती (deciduous), दक्षिणी उष्णकटिबंधिय पर्णपाती वन, सवाना (savanna), डेल्टा प्रदेश (delta), मेंप्रूव इत्यादि का विस्तृत अध्ययन पारिस्थितिकी ज्ञान से ही संभव है।
है।

10. सूचक पादप (Plant indicators) कई पादप जैसे लाइकेन, नागफनी, पीली कटेली (आरजीमोन मैक्सीकाना) इत्यादि उस स्थान विशेष के लक्षणों को प्रदर्शित करते हैं। अतः ऐसे पादप सूचक पादप कहलाते हैं जैसे नागफनी मरुस्थल प्रदेश का सूचक

11. भूमि संरक्षण (Soil conservation)-ऊपरी मिट्टी के कटाव रोकने, वृक्षारोपण हेतु भारत सरकार द्वारा मृदा संरक्षण केन्द्र स्थापित किये गये है। यहाँ की पारिस्थितकी का महत्व है।
12. अलवणीय जल प्रबन्धन (Freshwater management) – इसके अन्तर्गत नदी, बांध व झीलों का पानी निष्कासन, संग्रहण, कुल जल मात्रा, लवणों की मात्रा, जैविक समुदाय की पारिस्थितिकी, इत्या की जानकारी का महत्त्व है।

इन्हीं महत्त्वपूर्ण तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अन्तर्राष्ट्रीय जीवविज्ञान कार्यक्रम (International Biological Programme, I.B.P.) 1 जुलाई 1967 को आरंभ किया गया, जिसका उद्देश्य मानव जाति के हित हेतु प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण एवं उत्पादकता (productivity) का आधार जैविक अध्ययन है। संपूर्ण विश्व से राष्ट्रीय अथवा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर IBP प्रोग्राम में भाग लेकर 7 राष्ट्र लाभान्वित हुए। मानव एवं बायोस्फीयर (Man and Biosphere PMAB) परियोजना के अन्तर्गत अन्तर्राष्ट्रीय पारिस्थितिक नियमावली प्रस्तुत की गयी जिस पर कई अनुसंधान कार्य हो रहे हैं।

सन् 1972 में यूनेस्कों के अन्तर्गत IBP में भारत का प्रतिनिधित्व प्रो. आर. मिश्रा ने किया जिसका मुख्य उद्देश्य जैवचक्र के विभिन्न पारिस्थितिकतंत्रों का मानव पर संभावित प्रभाव का अध्ययन था।

मानव परिवर्तित पारिस्थितिकतंत्रों के अध्ययन में इकोलोजी का विशेष महत्व है, जिसकी MAB/ UNESCO की कार्यशाला (work shop) वाराणसी में 1975 में आयोजित की गयी। पारिस्थितिक नियमों के अन्तर्गत आज विश्व के जलीय स्रोतों का रखरखाव, वर्गीकरण व पूरी जानकारी प्राप्त है। खरपतवार पारिस्थितिकी द्वारा अनेक जातियों के पारस्परिक सम्बंधों के संदर्भ में ज्ञान प्राप्त हुआ।

पारिस्थितिकी के कार्य क्षेत्र (Scope of Ecology)

1. मानव जाति के जीवित रहने का आधार (Basis for survival of human beings)

मानव जाति के उत्थान के लिए पारिस्थितिकी ज्ञान व इसके आधारभूत नियमों की महत्ता जात हुई है। अतः वर्तमान में प्रत्येक देश, इन नियमों के तहत् विकास करने की दिशा में प्रयासरत है, जिसके लिए विश्व स्तर पर समय-समय पर कई संगोष्ठियों का आयोजन होता रहा है।

2. पारिस्थितिकीतंत्र की आत्मनिर्भरता को बनाये रखना

वातावरण व इसमें रहने वाले जीवों के पारस्परिक प्रक्रियाओं के अध्ययन के फलस्वरुप विभिन्न जटिलताओं को दूर किया जा सकता है। इकोलोजी द्वारा ही यह ज्ञात हुआ है कि आज प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षित रखना आवश्यकता बन गयी है। आज यह महसूस हो चुका है कि पेड़ काटने है तो उतने ही लगाने भी हैं। जिससे प्रदूषण रहित वातावरण उपलब्ध हो सके।

3. जंगल व जंगली जानवरों का संरक्षण (Conservation of forests and wild life)

प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्रों के मध्य संतुलन को बनाये रखने के लिये वनों का संरक्षण आज की आधारभूत समस्या है। यह इकोलोजी के अध्ययन का विस्तृत क्षेत्र है।

4. प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण (Conservation of natural resources)

मानव जाति के हित के लिये आवश्यक आधारभूत प्राकृतिक संसाधनों के पारिस्थितिकी नियमों को लागू करने से ही संरक्षण संभव है।

5. वातावरण में व्याप्त प्रदूषण का अध्ययन (Study of pollution in environment)

पर्यावरणीय प्रदूषण का अध्ययन इसके हानिकारक प्रभाव एवं इसे रोकने के लिये पारिस्थितिकी नियमो की पालना इकोलोजी क्षेत्र में ही सम्मिलित है।

6. जीवों के अनुकूलन का अध्ययन (Study of biological adaptation)

एक ही प्रजाति के सदस्य भिन्न-भिन्न भौगोलिक प्रदेशों में वितरण के कारण वहाँ की जलवायु के अनुसार अनुकूलित हो जाते हैं। इन जीवों को आकारिकी में आनुवंशिक स्तर पर भिन्नता उत्पन्न हो जाने से पारित्रारूप (ecotypes) उत्पन्न होते हैं। जलवायु में पुनः परिवर्तन होने पर पारिप्रारूप या तो विलुप्त हो जाते हैं अथवा एक नयी प्रजाति को जन्म देते हैं। अतः पारिस्थितिक अध्ययन द्वारा हम जातियों के विकास के संदर्भ में ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।

7. आनुवंशिक पदार्थों का संरक्षण

समुदाय में उपस्थिति जंगली जीवों में दुर्लभ (rare) आनुवंशिक पदार्थ को ज्ञात करके इसे संरक्षित करने में भी पारिस्थितिको अध्ययन अत्यधिक महत्वपूर्ण है।

8. मानव द्वारा अभियांत्रिकी प्रकार्यो का पर्यावरण पर प्रभाव (Effect of engineering by man on environment)

विभिन्न बांध विकासी परियोजनाओं के अन्तर्गत मकान या कालोनी विकसित करना, सिंचाई, नगरीकरण पर्यटन, सड़क निर्माण, उद्योगों को स्थापित करना, रेल पटरियाँ, गैसे लाइनें, पेट्रोल सप्लाई, खनन आदि कई अभियांत्रिक कार्य पर्यावरण पर हानिकारक प्रभाव डालते हैं, जिन्हें पारिस्थितिको अध्ययन द्वारा ज्ञात कर इस क्षेत्र में आवश्यक कदम उठाये जा सकते हैं।

9. सामाजिक वानिकी (Social forestry)

मानव उपयोगी पादपों को ईंधन, खाद, भोजन (fuel, fertilizers and food) प्राप्त करने के लिये उगाया जा रहा है। जितने पेड़ काटे जा रहे हैं। उतने ही लगाये भी जा रहे हैं, जिससे कि जैवविविधता बनी रहे।

10. वानिकी विकास एवं संरक्षण (Development and conservation of forests)

वनस्पति एवं औषधीय पादपों का संरक्षण भी पारिस्थितिकी नियमानुसार किया जाता है।

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