Educationडच | डचों का भारत में आगमन | डचों का इतिहास

डच | डचों का भारत में आगमन | डचों का इतिहास

डचों का आगमन एवं गतिविधियां

  • स्पेन का पतन होने के पश्चात् पुर्तगाली शक्ति बिखर गई और सत्रहवीं शताब्दी के मध्य तक डचों ने उसका स्थान ग्रहण कर लिया ।
  • डचों ने व्यापारिक संगठन और तकनीक तथा जहाजरानी में नवीन प्रयोग किए ।
  • सत्रहवीं शताब्दी में उन्होंने फ्लूटशिप का निर्माण किया , जो अपने आप में एक अनोखा और अद्भुत जहाज था । यह फ्लूटशिप बेहद हल्का था और इसे खेने के लिए कम लोगों की जरूरत पड़ती थी । इससे आने – जाने के खर्च में कटौती हुई । डच जहाज भारी और धीमी गति से चलने वाले पुर्तगाली जहाजों से श्रेष्ठ सिद्ध हुए ।
  • डचों ने नीदरलैंड से स्पेनवासियों को हटाने के लिए कड़ा संघर्ष किया था । उन्होंने एक राष्ट्रीय भावना के अंतर्गत भी पुर्तगालियों से मसाले का व्यापार छीनने का भी संकल्प किया ।
  • डचों ने अंग्रेजों की भांति भारत समेत अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था को एक नया भाड़ दिया था ।
  • डचों की व्यापारिक कम्पनी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यह पूर्णतः व्यापारिक संस्था थी ।
  • सत्रहवीं शताब्दी में हॉलैण्ड यूरोप में आरम्भिक वाणिज्यवादी गतिविधियों का एक प्रमुख केंद्र था ।

[lwptoc]

 डच ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना

  • यह एक वाणिज्यिक उद्यम था जिसने डच को पूरब की यात्रा करने के लिए प्रवृत्त किया ।
  • कार्नेलिस डी हाउटमेन पहला डच था , जो 1596 में सुमात्रा और बंताम पहुंचा । इसने डच को आगामी उद्यम के लिए प्रोत्साहित किया , और अगले कुछ वर्षों के दौरान भारतीय व्यापार के लिए एक नई कंपनी बनाई गई । मार्च , 1602 ई . में डच संसद द्वारा पारित उद्घोषणा से डच संयुक्त कम्पनी की स्थापना हुई , जिसमें कई स्वतंत्र एवं समृद्ध डच व्यापारी सम्मिलित हो गए ।
  • डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी ‘ Vereenigde Oost – Indische Compagnie ( VOC ) की कुल आरम्भिक पूंजी 6,500.000 गिल्डर थी ।
  • इस कम्पनी को भू – मध्यसागर के पूर्व में व्यापार करने की अनुमति मिली थी ।
  • कम्पनी का पूर्वी केंद्र बेटविया में स्थित था ।

इन्हें भी देखें Jio phone से पैसे कैसे कमाए 2021

भारत में डच फैक्ट्रियों की स्थापना

  • डचों ने भारत और हिंद महासागरीय – क्षेत्रों में पुर्तगाली सत्ता को चुनौतियां देते हुए अनेक बस्तियों और व्यापारिक केंद्रों की स्थापना की ।
  • भारत में डच संस्थापना की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि पुलिकट स्थित गेलड्रिया के दुर्ग को छोड़कर शेष बस्तियां अदुर्गीकृत थीं ।
  • भारत के पूर्वी भाग , पूर्वी तटीय क्षेत्र और पश्चिमी तट पर डचों ने अपनी फैक्ट्रियां स्थापित की
  1. 1605 ई . में मसुलीपट्टम में ,
  2. 1610 ई . में पुलिकट में ,
  3. 1616 ई . में सूरत में ,
  4. 1641 में बिमिलिपट्टम  में ,
  5. 1645 ई . में करिकल में ,
  6. 1653 ई . में चिंन्सुरा में ;
  7. 1658 ई . में कासिमबाजार , पटना , बालासोर व नेगापट्टम में
  8. 1663 ई . में कोचीन में डचों ने अपनी फैक्ट्रियां स्थापित की ।
  • भारत में अपनी व्यापारिक धाक जमाने में डचों को स्थानीय शासकों से व्यापारिक सुविधाएं मिलीं ।
  • गोलकुण्डा के सुल्तान , जिंजी , मदुरै और तंजौर ( तंजावुर ) के नायकों ने डचों को कम शुल्क पर व्यापार करने की छूट दी ।
  • कोचीन के मुद्दा शासन ने विशेष व्यापारिक सुविधाएं प्रदान कीं , जिनमें सबसे महत्त्वपूर्ण था , पुड़ाक्कड़ और क्रांगनूर के मध्य – क्षेत्र में काली मिर्च के व्यापार का एकाधिकार ।
  • उत्तरी तथा दक्षिणी कोरोमण्डल में डचों को चुंगी में रियायत मिली तथा वस्त्र – व्यापार में उन्हें मुहर शुल्क से मुक्त कर दिया गया , जबकि अन्य विदेशी व्यापारिक कंपनियों को यह कर देना पड़ता था ।

पुर्तगाली सत्ता पर डचों का प्रहार

  • डचों की व्यापारिक संस्था चोक ( VOC ) एक नवीन प्रकार की संस्था थी और डचों के इस प्रयोग से पुर्तगालियों की व्यापारिक सत्ता को तोड़ने में मदद मिली ।
  • मुनाफे और पूंजी पर नियंत्रण तथा उनके निवेश द्वारा स्थायी पूंजी का निर्माण कम्पनी की मुख्य कार्यनीति थी ।
  • 1632 ई . में हुगली – क्षेत्र से पुर्तगालियों को डचों ने हटाना शुरू किया ।
  • 1658 ई . में श्रीलंका से डचों ने पुर्तगालियों को हटाया ।
  • 1659 ई . में तंजौर तट पर स्थिति नेगापट्टम् डचों ने पुर्तगालियों से जीता ।

इन्हें भी देखें अब्राहम लिंकन के अनमोल विचार

डच व्यापार

  • एशियाई सम्पर्क के आरंभिक चरण में डच मूलतः काली मिर्च एवं अन्य मसालों के प्रति रुचि रखते थे । चूंकि , ये मसाले मुख्यतः इण्डोनेशिया में मिलते थे , अतः डचों का वह मुख्य केंद्र बन गया ।
  • इन्होंने कोरोमण्डल तट से भारतीय वस्त्रों को दक्षिण – पूर्व एशिया में लाकर भारी मुनाफा कमाया ।
  • मद्रास के दक्षिण में से ड्रासपट्टम् विशेष वस्त्र हेतु प्रसिद्ध था ।
  • मसुलीपट्टम् से नील का निर्यात किया जाता था ।
  • डचों ने शोरे के निर्यात – व्यापार को बहुत प्रोत्साहित किया । अफीम , रेशम और सूती – वस्त्र को जावा और चीन में बेचकर डचों ने लाभ कमाया ।
  • 1650 के दशक में डच कम्पनी ने कासिम बाजार में स्वयं रेशम की चक्री का उद्योग स्थापित किया था ।

डच अंग्रेज संघर्ष

  • समस्त 17 वीं शताब्दी के दौरान , डच ने पुर्तगालियों के प्रभाव को समाप्त करके पूरब में मसाले के व्यापार पर एकाधिकार सुनिश्चित कर लिया । मसाले के व्यापार पर उनके अधिकार , कंपनी की संपत्ति और उनकी योग्यता ने इन सभी क्षेत्रों में व्यापार में उनके एक बड़े हिस्से को सुनिश्चित किया ।
  •  सत्रहवीं शताब्दी के मध्य से भारत तथा हिंद – महासागरीय क्षेत्र में प्रभुता की स्थापना के लिए डच और अंग्रेजों में संघर्ष आरंभ हो गए ।
  • सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में तीन ‘ आंग्ल – डच – युद्ध ‘ यूरोप में लड़े गए जिनमें अंग्रेजों की विजय हुई ।
  • 1717 ई . में अंग्रेजों को मुगल व्यापारिक फरमान मिलने पर डच शक्ति पिछड़ने लगी ।
  • तीसरे एंग्लो – डच युद्ध ( 1672-74 ) में , सूरत और बॉम्बे की अंग्रेजों की नई बस्ती के बीच संचार निरंतर ध्वस्त होने लगे , दो – तीन अंग्रेजी जहाजों पर बंगाल की खाड़ी में कब्जा कर लिया ।
  • 1759 में बेदरा युद्ध में अंग्रेजों द्वारा पराजित होने पर भारत में डच महत्वाकांक्षाएं चकनाचूर हो गईं और डच शक्ति पूर्वी एशिया के द्वीपों तक सिमट कर रह गई । डचों का पतन लगभग तीन शताब्दियों तक पूर्वी द्वीप समूहों पर डचों का अधिकार रहा , परंतु अंग्रेजों ने भारत में उन्हें स्थापित नहीं होने दिया ।
  • जिस शक्ति के साथ डचों ने पुर्तगालियों को पराजित किया था , वह शक्ति अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई में काम नहीं आ सकी ।

इन्हें भी देखें चाँदी के बारे में पूरी जानकारी 

डचों का पतन

  • लगभग तीन शताब्दियों तक पूर्वी द्वीप समूहों पर डचों का अधिकार रहा , परंतु अंग्रेजों ने भारत में उन्हें स्थापित नहीं होने दिया । जिस शक्ति के साथ डचों ने पुर्तगालियों को पराजित किया था , वह शक्ति अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई में काम नहीं आ सकी ।
  • आरंभिक वर्षों में डचों एवं अंग्रेजों के बीच अच्छे संबंध थे , किंतु बाद में व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता के कारण वे एक – दूसरे के शत्रु बन गए । आरम्भ में डचों ने कुछ हद तक अंग्रेजों का मुकाबला भी किया , परंतु बाद में अंग्रेजों ने उन्हें दबा दिया ।
  • डच कम्पनी राष्ट्रीय अधिकारिता में थी , जिससे डच कर्मचारियों में अंग्रेजी कम्पनी के कर्मचारियों के समान नेतृत्व की भावना तथा उत्साह का अभाव था । डच कम्पनी के अधिकारियों का वेतन बहुत कम था , इसलिए वे अपने निजी व्यापार में ही ज्यादा सक्रियता दिखाते थे । प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से वे कम्पनी के हितों की अनदेखी करते थे ।
  • अधिकारियों की उपेक्षापूर्ण नीति के कारण डच कम्पनी की स्थिति निरंतर खराब होती गयी ।
  • हॉलैण्ड लम्बी अवधि तक पराधीन रहा था , इसलिए उसके पास साधनों की पर्याप्तता नहीं थी , जबकि दूसरी ओर इंग्लैण्ड सदा स्वाधीन रहा था और उसके पास साधनों की प्रचुरता थी । इसलिए , इंग्लैण्ड अपनी इच्छा के अनुसार साधनों एवं शक्ति में वृद्धि करने तथा आवश्यकतानुसार उनका उपयोग करने में भी सफल रहा ।
  • बाद के वर्षों में डच व्यापारियों ने भारत की अपेक्षा दक्षिण – पूर्वी एशिया के मसालों के द्वीपों को केंद्रित करने के कारण डचों को भारत में स्थित अपनी बस्तियों से हाथ धोना पड़ा ।
  • डचों ने यूरोप में फ्रांसीसियों तथा अंग्रेजों से युद्ध करके अपनी शक्ति में ह्रास कर लिया था और इस कारण वे पूर्व में अपने साम्राज्य को कायम रखने में असफल हो गए ।

डच के महत्वपूर्ण तथ्य

( i ) दूसरी यूरोपीय शक्तियों ( जैसे अंग्रेज , फ्रांसीसी और पुर्तगाली ) की तुलना में भारत में डचों की उपस्थिति थोड़े समय की थी ।

( ii ) नीदरलैंड की यूनाइटेड ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना वर्ष 1602 में हुई और यह व्यापक वित्तीय संसाधनों और राज्य संरक्षण के कारण पूरब में अपना प्रभाव फैलाने में सफल हुई ।

( ii ) डच ने पूरी सत्रहवीं शताब्दी में पुर्तगालियों के प्रभाव को हटाकर पूरब में मसाले के व्यापार पर एकाधिकार सुनिश्चित कर लिया ।

( iv ) भारत में डच की मुख्य कारखाने मसूलीपट्नम ( 1605 ) , पुलीकट ( 1610 ) , सूरत ( 1616 ) , बिमलीपट्नम ( 1641 ) , करिकास ( 1645 ) , चिनसुरा ( 1653 ) , कासिम बाजार , बड़ानागोर , पटना , बालासोर , नागपट्टम ( 1658 ) और कोचीन ( 1663 ) में थे ।

( v ) अंग्रेज – डच प्रतिस्पर्धा में डच की पराजय एवं उनका ध्यान मलय द्वीप समूह की तरफ केंद्रित होने से भारत में डच शक्ति के पतन का मार्ग प्रशस्त किया ।

डच का व्यापारिक घटनाक्रमः

  1. 1581 ई . – डचों ने स्पेन से स्वतंत्रता की प्राप्ति ;
  2. 1602 ई . – यूनाइटेड ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना , पुर्तगालियों को बेंटम में पराजित किया , मलक्का के द्वीपों पर अधिकार ;
  3. 1605 ई . – पुर्तगालियों को अम्बोयना द्वीप में पराजित किया ;
  4. 1609 ई . – हॉलैण्ड एक्सचेंज बैंक की स्थापना ;
  5. 1614 ई . – क्रेडिट बैंक ऑफ एम्टर्डम की स्थापना ।
  6. 1619 ई . – जकट्रा पर अधिकार और प्रसिद्ध राजधानी

FAQ

Q1. डच कहाँ के निवासी थे?

डच हॉलैंड (वर्त्तमान नीदरलैंड) के निवासी थे।

Q2. डच ईस्ट इंडिया कंपनी का मुख्यालय कहाँ है?

डच ईस्ट इंडिया कंपनी का मुख्यालय एम्सटर्डम, नीदरलैण्ड है?

 

Latest article

More article