Educationचौहान वंश का इतिहास | राजस्थान का चौहान वंश

चौहान वंश का इतिहास | राजस्थान का चौहान वंश

चौहान वंश का इतिहास – चौहानों की उत्पत्ति के संबंध में विभिन्न मत हैं । पृथ्वीराज रासौ में इन्हें ‘ अग्रिकुण्ड ‘ से उत्पन्न बताया है , जो ऋषि वशिष्ठ द्वारा आबू पर्वत पर किये गये यज्ञ से उत्पन्न हुए चार राजपूत योद्धाओं प्रतिहार , परमार , चालुक्य एवं चौहानों , में से एक थे । मुहणोत नैणसी एवं सूर्यमल मिश्रण ने भी इसी मत का समर्थन किया है । पं . गौरीशंकर ओझा चौहानों को सूर्यवंशी मानते हैं तो कर्नल टॉड ने इन्हें विदेशी ( मध्य एशिया से आया हुआ ) माना है । पृथ्वीराज विजय , हम्मीर महाकाव्य , सुर्जन चरित आदि ग्रन्थों तथा चौहान प्रशस्ति पृथ्वीराज तृतीय का बेदला शिलालेख आदि में भी चौहानों को सूर्य वंशी बताया गया है । डॉ . दशरथ शर्मा बिजोलिया लेख के आधार पर चौहानों को ब्राह्मण वंश से उत्पन्न बताते हैं । 1177 ई . का हाँसी शिलालेख एवं माउण्ट आबू के चंद्रवती के चौहानों का . अचलेश्वर मंदिर का लेख चौहानों को चंद्रवंशी बताता है । विलियम क्रुक ने अग्निकुण्ड से उत्पत्ति को किसी विदेशी जाति के लोगों को यहाँ अग्निकुण्ड के समक्ष पवित्र कर हिन्दू जाति में शामिल करना बताया है । अभी इस संबंध में कोई एक मत प्रतिपादित नहीं हो पाया है ।

अजमेर के चौहान वंश का इतिहास ( शाकंभरी के चौहान )

वासुदेव चौहान

चौहानों का मूल स्थान जांगलदेश में सांभर के आसपास सपादलक्ष क्षेत्र को माना जाता है । इनकी प्रारंभिक राजधानी अहिछत्रपुर ( नागौर ) थी । बिजोलिया शिलालेख के अनुसार सपादलक्ष के चौहान वंश का संस्थापक वासुदेव चौहान नामक व्यक्ति था , जिसने 551 ई . आसपास इस वंश का शासन प्रारंभ किया । बिजोलिया शिलालेख के अनुसार सांभर झील का निर्माण भी इसी ने करवाया था । इसी के वंशज अजयपाल ने 7 वीं शती में सांभर कस्बा बसाया तथा अजयमेरु दुर्ग की स्थापना की थी ।

विग्रहराज द्वितीय

चौहान वंश के प्रारंभिक शासकों में सबसे प्रतापी राजा सिंहराज का पुत्र विग्रहराज – द्वितीय हुआ , जो लगभग 956 ई . के आसपास सपादलक्ष का शासक बना । इन्होंने अन्हिलपाटन के प्रसिद्ध चालुक्य शासक मूलराज – प्रथम को हराकर कर देने को विवश किया तथा भड़ौच में अपनी कुलदेवी आशापुरा माता का मंदिर बनवाया । विग्रहराज के काल का विस्तृत वर्णन 973 ई . के हर्षनाथ के अभिलेख से प्राप्त होता है ।

अजयराज

चौहान वंश का दूसरा प्रतापी शासक अजयराज हुआ , जिसने ( पृथ्वीराज विजय के अनुसार ) 1113 ई . के लगभग अजयमेरु ( अजमेर शहर ) बसाकर उसे अपने राज्य की राजधानी बनाया । उन्होंने अन्हिलपाटन के चालुक्य शासक मूलराज प्रथम को हराया । उन्होंने ‘ श्री अजयदेव नाम से चाँदी के सिक्के चलाये । उनकी रानी सोमलेखा ने भी अपने नाम के सिक्के जारी किये ।

अर्णोराज

अजयराज के बाद अर्णोराज ने 1133 ई . के लगभग अजमेर का शासन संभाला । अर्णोराज ने तुर्क आक्रमणकारियों को बुरी तरह हराकर अजमेर में आनासागर झील का निर्माण करवाया । चालुक्य शासक कुमारपाल ने आबू के निकट युद्ध में इसे हराया । इस युद्ध का वर्णन प्रबन्ध चिन्तामणि एवं प्रबन्ध कोष में मिलता है । अर्णोराज स्वयं शैव होते हुए भी अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णु था । उसने पुष्कर में वराह – मंदिर का निर्माण करवाया ।

विग्रहराज चतुर्थ

विग्रहराज – चतुर्थ ( बीसलदेव ) 1153 ई . में लगभग अजमेर की गद्दी पर आसीन हुए । इन्होंने अपने राज्य की सीमा का अत्यधिक विस्तार किया । उन्होंने गजनी के शासक अमीर खुशरुशाह ( हम्मीर ) को हराया तथा दिल्ली के तोमर शासक को पराजित किया एवं दिल्ली को अपने राज्य में मिलाया । एक अच्छा योद्धा एवं सेनानायक शासक होते हुए वे विद्वानों के आश्रयदाता भी थे । उनके दरबार में सोमदेव जैसे प्रकाण्ड विद्वान कवि थे , जिसने ‘ ललित विग्रहराज ‘ नाटक की रचना की । विग्रहराज विद्वानों केआश्रयदाता होने के कारण ‘ कविबान्धव ‘ के नाम से जाने जाते थे । स्वयं विग्रहराज ने ‘ हरिकेलि ‘ नाटक लिखा । इनके अलावा उन्होंने अजमेर में एक संस्कृत पाठशाला बनवाई ( अढ़ाई दिन के झोंपड़े की सीढ़ियों में मिले दो पाषाण अभिलेखों के अनुसार ) । इसे मुहम्मद गौरी के सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने अढ़ाई दिन के झोंपड़े में परिवर्तित कर दिया था । वर्तमान टोंक जिले में बीसलपुर कस्बा एवं बीसलसागर बाँध का निर्माण भी बीसलदेव द्वारा करवाया गया । इनके काल को चौहान शासन का स्वर्णयुग ‘ भी कहा जाता है ।

पृथ्वीराज चौहान का इतिहास

पृथ्वीराज चौहान वंश के अंतिम प्रतापी सम्राट पृथ्वीराज चौहान तृतीय का जन्म 1166 ई . ( वि.सं. 1223 ) में अजमेर के चौहान शासक सोमेश्वर की रानी कर्पूरीदेवी दिल्ली के शासक अनंगपाल तोमर की पुत्री ) की कोख से अन्हिलपाटन ( गुजरात ) में हुआ । अपने पिता का असमय देहावसान हो जाने के कारण मात्र 11 वर्ष की अल्पायु में पृथ्वीराज तृतीय अजमेर की गद्दी के स्वामी बने । उस समय कदम्बदास ( कैमास ) उनका सुयोग्य प्रधानमंत्री था । बालक पृथ्वीराज की ओर से उसकी माता कर्पूरीदेवी ने बड़ी कुशलता एवं कूटनीति से शासन कार्य संभाला । परन्तु बहुत कम समय में ही पृथ्वीराज तृतीय ने अपनी योग्यता एवं वीरता से समस्त शासन प्रबन्ध अपने हाथ में ले लिया । उसके बाद उसने अपने चारों ओर के शत्रुओं का एक – एक कर शनै – शनै खात्मा किया एवं दलपंगुल ( विश्व विजेता ) की उपाधि धारण की ।

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पृथ्वीराज – तृतीय के प्रमुख सैनिक अभियान व विजयें

नागार्जुन एवं भण्डानकों का दमनः

पृथ्वीराज के राजकाज संभालने के कुछ समय बाद उसके चचेरे भाई नागार्जुन ने विद्रोह कर दिया । अत : पृथ्वीराज ने सर्वप्रथम अपने मंत्री कैमास की सहायता से सैन्य बल के साथ उसे पराजित कर गुडापुरा ( गुड़गाँव ) एवं आसपास का क्षेत्र अपने अधिकार में कर लिये । इसके बाद 1182 ई . में पृथ्वीराज ने भरतपुर मथुरा क्षेत्र में भण्डानकों के विद्रोहों का अंत किया ।

महोबा के चंदेलों पर विजय

पृथ्वीराज ने 1182 ई . में ही महोबा के चंदेल शासक परमाल ( परमार्दी ) देव को हराकर उसे संधि के लिए विवश किया ।

चालुक्यों पर विजय

सन् 1184 के लगभग गुजरात के चालुक्य शासक भीमदेव – द्वितीय के प्रधानमंत्री जगदेव प्रतिहार एवं पृथ्वीराज की सेना के मध्य नागौर का युद्ध हुआ जिसके बाद दोनों में संधि हो गई एवं चौहानों की चालुक्यों से लम्बी शत्रुता का अंत हुआ ।

कन्नौज से संबंध

पृथ्वीराज के समय कन्नौज पर गहड़वाल शासक जयचन्द का शासन था । जयचंद एवं पृथ्वीराज दोनों की राज्य विस्तार की महत्त्वाकांक्षाओं ने उनमें आपसी वैमनस्य उत्पन्न कर दिया था । उसके बाद उसकी पुत्री संयोगिता को पृथ्वीराज द्वारा स्वयंवर से उठा कर ले जाने के कारण दोनों की शत्रुता और बढ़ गई थी । इसी वजह से तराइन के युद्ध में जयचंद ने पृथ्वीराज की सहायता न कर मुहम्मद गौरी की सहायता की ।

पृथ्वीराज एवं मुहम्मद गौरी

पृथ्वीराज के समय भारत के उत्तर – पश्चिम में गौर प्रदेश पर शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी का शासन था । मुहम्मद गौरी ने सन् 1178 में पंजाब , मुल्तान एवं सिंध को जीतकर अपने अधीन कर लिया था ।

• तराइन का प्रथम युद्ध ( 1191 ई . )

पृथ्वीराज के दिल्ली , हाँसी , सरस्वती एवं सरहिंद के दुर्गों को जीतकर अपने अधिकार में कर लेने के बाद 1190-91 में गौरी ने सरहिंद ( तबरहिंद ) पर अधिकार कर अपनी सेना वहाँ रख दी । पृथ्वीराज अपने क्षेत्र से आक्रांताओं को भगाने हेतु सरहिंद पर आक्रमण करने हेतु बढ़ा । मुहम्मद गौरी अपने विजित क्षेत्र को बचाने हेतु विशाल सेना सहित तराइन के मैदान ( हरियाणा के करनाल एवं थानेश्वर के मध्य तराइन ( तरावड़ी ) के मैदान में आ डटा । पृथ्वीराज भी अपनी सेना सहित वहाँ पहुँचा । दोनों सेनाओं के मध्य 1191 ई . में तराइन का प्रथम युद्ध हुआ जिसमें दिल्ली के गवर्नर गोविन्दराज ने मुहम्मद गौरी को घायल कर दिया । घायल गौरी युद्ध भूमि से बाहर निकल गया एवं कुछ ही समय में गौरी की सेना भी मैदान छोड़कर भाग खड़ी हुई । पृथ्वीराज ने इस विजय के बाद भागती हुई मुस्लिम सेना का पीछा न कर मुहम्मद गौरी व उसकी सेना को जाने दिया । पृथ्वीराज ने ऐसा कर बड़ी भूल की जिसकी कीमत उसे अगले वर्ष ही तराइन के द्वितीय युद्ध में चुकानी पड़ी ।

• तराइन का द्वितीय युद्ध ( 1192 ई . )

प्रथम युद्ध में जीत के बाद पृथ्वीराज निश्चित हो आमोद प्रमोद में व्यस्त हो गया जबकि गौरी ने पूरे मनोयोग से विशाल सेना पुनः एकत्रित की एवं युद्ध की तैयारियों में व्यस्त रहा । एक वर्ष बाद 1192 ई . में ही गौरी अपनी विशाल सेना के साथ पृथ्वीराज से अपनी हार का बदला लेने हेतु तराइन के मैदान में पुनः आ धमका । पृथ्वीराज को समाचार मिलते ही वह भी सेना सहित युद्ध मैदान की ओर बढ़ा । उसके साथ उसके बहनोई मेवाड़ शासक समरसिंह एवं दिल्ली के गवर्नर गोविन्द राज भी थे । दोनों सेनाओं के मध्य तराइन का द्वितीय युद्ध हुआ जिसमें साम – दाम – दण्ड – भेद की नीति से मुहम्मद गौरी की विजय हुई । अजमेर एवं दिल्ली पर उसका अधिकार हो गया । तराइन के युद्ध के बाद गौरी ने अजमेर का शासन भारी कर के बदले पृथ्वीराज के पुत्र गोविन्द राज को दे दिया । परन्तु कुछ समय बाद ही पृथ्वीराज के भाई हरिराज ने उसे पदच्युत कर अजमेर पर अपना अधिकार कर लिया । तब गोविन्दराज ने रणथम्भौर में चौहानवंश के शासन की शुरूआत की । मुहम्मद गौरी ने भारत में विजित अपने क्षेत्रों का प्रशासन अपने दास सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक को संभला दिया एवं स्वयं लौट गया । ऐबक ने अजमेर में विग्रहराज चतुर्थ द्वारा निर्मित्त संस्कृत पाठशाला को तुड़वाकर ढाई दिन के झोंपड़े ( मस्जिद ) में परिवर्तित करवा दिया ।
• तराइन का द्वितीय युद्ध भारतीय इतिहास की एक निर्णायक एवं युग परिवर्तनकारी घटना साबित हुआ । इससे भारत में स्थायी मुस्लिम साम्राज्य का प्रारंभ हुआ । मुहम्मद गौरी भारत में मुस्लिम साम्राज्य का संस्थापक बना । इसके बाद धीरे – धीरे गौरी ने कन्नौज , गुजरात , बिहार आदि क्षेत्रों को जीता और कुछ ही वर्षों में उत्तरी भारत पर मुस्लिम आक्रमणकारियों का शासन स्थापित हो गया । तराइन के दोनों युद्धों का विस्तृत विवरण कवि चन्द्र बरदाई के ‘ पृथ्वीराज रासो ‘ , हसन निजामी के ‘ ताजुल मासिर ‘ एवं सिराज के तबकात – ए – नासिरी में मिलता है । तराइन के युद्ध में पृथ्वीराज की पराजय का प्रमुख कारण गौरी की कुशल युद्ध नीति थी । इसके अलावा पृथ्वीराज का अपने चारों ओर के राजाओं को अपना शत्रु बना लेना , उसमें दूरदर्शिता का अभाव , युद्ध की तैयारी न कर आमोद – प्रमोद में व्यस्त रहना एवं दुश्मन को कम कर आँकना आदि अन्य कारण थे जिनकी वजह से पृथ्वीराज तृतीय का तुर्क प्रतिरोध असफल हो गया और देश अन्ततः सैकड़ों वर्षों तक गुलामी की जंजीर में जकड़ा रहा । पृथ्वीराज चौहान – तृतीय के दरबार में पृथ्वीराज विजय का लेखक ‘ जयानक ‘ , पृथ्वीराज रासो के लेखक एवं उसके मित्र चंद्र बरदाई , जनार्दन , वागीश्वर आदि विद्वानों को आश्रय प्राप्त था ।

रणथंबोर की चौहान

तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज की पराजय के बाद उसके पुत्र गोविंदराज ने कुछ समय बाद रणथम्भौर में चौहान वंश का शासन स्थापित किया । उनके उत्तराधिकारी वल्हण को दिल्ली सुल्तान इल्तुतमिश ने पराजित कर दुर्ग पर अधिकार कर लिया था । इसी वंश के शासक वाग्भट्ट ने पुनः दुर्ग पर अधिकार कर चौहान वंश का शासन पुनः स्थापित किया । रणथम्भौर के सर्वाधिक प्रतापी एवं अंतिम शासक हम्मीर देव चौहान थे । उन्होंने दिग्विजय की नीति अपनाते हुए अपने राज्य का चहुँओर विस्तार किया । राणा हम्मीर देव ने अलाउद्दीन के विद्रोही सैनिक नेता मुहम्मदशाह को शरण दे दी , अत : दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने रणथम्भौर पर आक्रमण किया । 1301 ई . में हुए अंतिम युद्ध में हम्मीर चौहान की पराजय हुई और दुर्ग में रानियों ने जौहर किया तथा सभी राजपूत योद्धा मारे गये । 11 जुलाई , 1301 को दुर्ग पर अलाउद्दीन खिलजी का कब्जा हो गया । यह राजस्थान का पहला साका माना जाता है । इस युद्ध में अमीर खुसरो अलाउद्दीन की सेना के साथ ही था ।

जालौर के चौहान

जालौर एक प्राचीन नगर था , जो गुर्जर प्रदेश का एक हिस्सा था । जालौर का प्राचीन नाम जाबालीपुर या जालहुर था तथा यहाँ के किले को ‘ सुवर्णगिरी ‘ कहते हैं । प्रतिहार नरेश नागभट्ट प्रथम ने जालौर को अपनी राजधानी बनाया था । जालौर दुर्ग का निर्माण भी संभवत : उसने ही करवाया था । प्रतिहारों की शक्ति क्षीण होने के बाद इस प्रदेश पर परमारों ने अपना शासन स्थापित किया । इसके बाद वहाँ 13 वीं सदी में सोनगरा चौहानों का शासन था , जिसकी स्थापना नाडोल शाखा के कीर्तिपाल चौहान द्वारा परमारों को परास्त करके की गई थी । सुण्डा पर्वत अभिलेख में उसे ‘ राजेश्वर ‘ कहा गया है । कीर्तिपाल के उत्तराधिकारी समरसिंह ने गुजरात के शक्तिशाली चालुक्य शासक भीमदेव द्वितीय के साथ अपनी पुत्री लीलादेवी का विवाह कर उसे अपना संबंधी एवं मित्र बना लिया । समरसिंह का पुत्र उदयसिंह सर्वाधिक शक्तिशाली सोनगरा शासक था । उसने दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश के आक्रमण को असफल कर उसे वापस दिल्ली लौटने को मजबूर कर दिया । सन् 1305 में यहाँ के शासक कान्हड़दे चौहान बने । अलाउद्दीन खिलजी ने जालौर पर अपना अधिकार करने हेतु योजना बनाई । जालौर के मार्ग में सिवाना का दुर्ग पड़ता है , अत : पहले अलाउद्दीन खिलजी ने 1308 ई . में सिवाना दुर्ग पर आक्रमण कर उसे जीता और उसका नाम ‘ खैराबाद ‘ रख कमालुद्दीन गुर्ग को वहाँ का दुर्ग रक्षक नियुक्त कर दिया । वीर सातल और सोम वीर गति को प्राप्त हुए । सन् 1311 ई . में अलाउद्दीन ने जालौर दुर्ग पर आक्रमण किया और कई दिनों के घेरे के बाद अंतिम युद्ध में अलाउद्दीन की विजय हुई और सभी राजपूत शहीद हुए । वीर कान्हड़देव – सोनगरा और उसके पुत्र वीरमदेव युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए । अलाउद्दीन ने इस जीत के बाद जालौर में एक मस्जिद 1 का निर्माण करवाया । इस युद्ध की जानकारी पद्मनाभ के ग्रन्थ कान्हड़दे प्रबन्ध तथा वीरमदेव सोनगरा की वात में न् मिलती है ।

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नाडोल के चौहान का इतिहास

चौहानों की इस शाखा का संस्थापक शाकम्भरी नरेश वाक्पति का पुत्र लक्ष्मण चौहान था , जिसने 960 ई . के लगभग चावड़ा राजपूतों के आधिपत्य से अपने आपको स्वतंत्र कर चौहान वंश का शासन स्थापित किया । नाडोल
शाखा के कीर्तिपाल चौहान ने 1177 ई . के लगभग मेवाड शासक सामन्तसिंह को पराजित कर मेवाड़ को अपने अधीन कर लिया था । 1205 ई . के लगभग नाडोल के चौहान जालौर की चौहान शाखा में मिल गये ।

सिरोही के चौहान

सिरोही में चौहानों की देवड़ा शाखा का शासन था , जिसकी स्थापना 1311 ई . के आसपास लुम्बा द्वारा की गई थी । इनकी राजधानी चन्द्रावती थी । बाद में बार – बार के मुस्लिम आक्रमणों के कारण इस वंश के सहासमल ने 1425 ई . में सिरोही नगर की स्थापना कर अपनी राजधानी बनाया ।इसी के काल में महाराणा कुंभा ने सिरोही को अपने अधीन कर लिया । 1823 ई . में यहाँ के शासक शिवसिंह ने ईस्ट इंडिया कम्पनी से संधि कर राज्य की सुरक्षा का जिम्मा उसे सौंप दिया । स्वतंत्रता के बाद सिरोही राज्य राजस्थान में जनवरी , 1950 में मिला दिया गया ।

हाडोती के चौहान

हाड़ौती में वर्तमान लूंदी , कोटा , झालावाड़ एवं बारां के क्षेत्र आते हैं । इस क्षेत्र में महाभारत के समय से मत्स्य ( मीणा जाति निवास करती थी । मध्यकाल में यहाँ मीणा जाति का ही राज्य स्थापित हो गया था । पूर्व में यह सम्पूर्ण क्षेत्र केवल बूंदी में आता था । 1241 ई . में यहाँ हाड़ा चौहान देवा ने मीणा शासक जैता को पराजित कर यहाँ चौहान वंश का शासन स्थापित किया । देवा नाडोल के चौहानों का ही वंशज था । बूंदी का यह नाम वहाँ के शासक बूँदा मीणा के नाम पर पड़ा । मेवाड़ नरेश क्षेत्रसिंह ने आक्रमण कर बूंदी को अपने अधीन कर लिया । तब बूंदी का शासन मेवाड़ के अधीन ही चल रहा था 1569 ई . यहाँ के शासक सुरजन सिंह ने अकबर से संधि कर मुगल आधीनता स्वीकार कर ली और तब से बूंदी मेवाड़ से मुक्त हो गया । 1631 ई में मुगल बादशाह शाहजहाँ ने कोटा को बूंदी से स्वतंत्र कर बूंदी के शासक रतनसिंह के पुत्र माधोसिंह को वहाँ का शासकबना दिया । मुगल बादशाह फखशियर के समय बूंदी नरेश बुद्धसिंह के जयपुर नरेश जयसिंह के खिलाफ अभियान पर न जाने के कारण बूंदी राज्य का नाम फर्रुखाबाद रख उसे कोटा नीश को दे दिया परंतु कुछ समय बाद बुद्धसिंह को बूंदी का राज्य वापस मिल गया । बाद में बूंदी के उत्तराधिकार के संबंध में बार – बार युद्ध होते रहे , जिनमें मराठे , जयपुर नरेश सवाई जयसिंह एवं कोटा की दखलंदाजी रही । राजस्थान में मराठों का सर्वप्रथम प्रवेश बूंदी हुआ , जब 1734 ई . में वहाँ की बुद्धसिंह की कछवाही रानी आनन्द ( अमर ) कुँवरी ने अपने पुत्र उम्मेदसिंह के पक्ष में मराठा सरदार होल्कर व राणोजी को आमंत्रित किया । 1818 ई . में बूंदी के शासक विष्णुसिंह ने मराठों से सुरक्षा हेतु ईस्ट इंडिया कम्पनी से संधि कर ली और बूंदी की सुरक्षा का भार अंग्रेजी सेना पर हो गया । देश की स्वाधीनता के बाद बंदी का राजस्थान संघ में विलय हो गया ।

कोटा राज्य का इतिहास

कोटा प्रारंभ में बूंदी रियासत का ही एक भाग था । यहाँ हाड़ा चौहानों का शासन था । शाहजहाँ के समय 1631 ई . में बूंदी नरेश राव रतनसिंह के पुत्र माधोसिंह को कोटा का पृथक राज्य देकर उसे वृंदी से स्वतंत्र कर दिया । तभी से कोटा स्वतंत्र राज्य के रूप में अस्तित्व में आया । कोटा पूर्व मे कोटिया भील के नियंत्रण में था , जिसे बूंदी के चौहान वंश के संस्थापक देवा के पौत्र जैवसिंह ने मारकर अपने अधिकार में कर लिया । कोटिया भील के कारण इसका नाम कोटा पड़ा । माधोसिंह के बाद उसका पुत्र यहाँ का शासक बना जो औरंगजेब के विरुद्ध धरमत के उत्तराधिकार युद्ध में मारा गया । झाला जालिमसिंह ( 1769-1823 ई . ) : कोटा का मुख्य प्रशासक एवं फौजदार था । वह बड़ा कूटनीतिज्ञ एवं कुशल प्रशासक था । इनके मराठों , अंग्रेजों एवं पिंडारियों से अच्छे संबंध होने के लक्ष्यकारण कोटा इन सब की लूट – खसोट से बचा रहा । दिसम्बर , 1817 ई . में फौजदार जालिमसिंह झाला ने कोय राज्य की ओर से ईस्ट इंडिया कम्पनी से संधि कर ली । रामसिंह के समय सन् 1838 ई . में महारावल झाला मदनसिंह जो किकोट का दीवान एवं फौजदार था तथा झाला जालिमसिंह का पौत्र था , को कोटा से अलग कर झालावाड़ का स्वतंत्र राज्य दे दिया गया । इस प्रकार 1838 ई . झालावाड़ एक स्वतंत्र रियासत बनी । यह राजस्थान में अंग्रेजों द्वारा बनायी गई आखिरी रियासत थी । इसकी राजधानी झालरापाटन बनाई गई । 1947 में देश स्वतंत्र होने के बाद मार्च , 1948 में कोटा का राजस्थान संघ में विलय हो गया और कोटा महाराव भीमसिंट इसके राजप्रमुख बने एवं कोटा राजधानी । बाद में इसका विलय वर्तमान राजस्थान में हो गया ।

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