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चिंतन (Thinking) अर्थ एवं परिभाषा, चिंतन के प्रकार | Thinking in hindi

चिंतन (Thinking), चिंतन का अर्थ और परिभाषा, चिंतन किसे कहते है एवं परिभाषा, विशेषतायें और सिद्धान्त Thinking, Meaning and Definition of Thinking, What is Thinking and Definition, Characteristics and Principles

चिंतन मानसिक क्रिया का वह ज्ञानात्मक पहलू है जिसमें व्यक्ति आंतरिक रूप से प्रतिमा चिन्हों, विचारा आदि के रूप में वस्तुओं या घटनाओं का मानसिक चित्रण करते हुए समस्या का समाधान बूढ़ने का प्रयास करता है

चिंतन की परिभाषा definition of contemplation

  • गैरेट के अनुसार चिंतन एक अदृश्य व अव्यक्त व्यवहार है जिसमें मुख्य रूप से प्रतीकों का प्रयोग किया जाता है।
  • मोहसिन के अनुसार चिंतन समस्या समाधान संबंधी अध्यक्त व्यवहार है। रॉस के अनुसार :- चिंतन मानसिक क्रिया का ज्ञानात्मक पक्ष है।
  • वेलेन्टाइन के अनुसार :- चिंतन शब्द का प्रयोग उस क्रिया के लिए किया जाता है जिसमे शृंखलाबद्ध विचार किसी लक्ष्य या उद्देश्य की ओर अविराम गति से प्रवाहित होते हैं।

चिंतन की प्रकृति nature of thinking

1. किसी समस्या के उत्पन्न होने पर चिंतन की प्रक्रिया आरम्भ होती है।

2 चिंतन सभी प्रकार से एक ज्ञानात्मक किया है।

3. चिंतन किसी लक्ष्य या उद्देश्य की ओर अग्रसर करता है।

4. इसमें पूर्व अनुभव शामिल होते हैं।

5. चिंतन प्रारंभ होने के लिए सबसे पहली आवश्यकता है समस्या । ning Classes

6. चिंतन समस्या समाधान संबंधी व्यवहार है।

7. चिंतन एक आरंभिक क्रिया है।

8. चिंतन के समय बाहरी गत्यात्मक क्रियाएं बंद हो जाती है।

9. चिंतन में भाषा का भी महत्व होता है इसमें व्यक्ति आंतरिक संभाषण करता है। 10. चिंतन में भाषा के अलावा विचारों प्रतीक व प्रतिमाओं का भी उपयोग होता है।

11. चिंतन एक मानसिक खोज है, गत्यात्मक खोज नहीं।

चिंतन के साधन (Tools of Thinking)

1. प्रतिमा ( Image) – व्यक्ति, जिन वस्तुओं का प्रत्यक्षीकरण करता है, उनकी प्रतिमाएँ व्यक्ति के मस्तिष्क में बन जाती है। ये प्रतिमाये भिन्न-भिन्न संवेदनाओं से संबंधित होती है, जैसे स्पर्श, दृष्टि, श्रवण, घ्राण, स्वाद संबंधी संवेदनाओं की प्रतिमाएँ। इनमें से दृष्टि संबंधी प्रतिमा प्रधान होती है।

2. संकेत और चिह्न (Symbols and Signs) – चिंतन के साधन के रूप में संकेत गथा चिह्ना का भी विशेष महत्त्व है। ये चित्र शब्द या वस्तुओं के रूप में प्रस्तुत किये जाते हैं। सकेत एक प्रकार का उद्दीपन होता है जो किसी अनुपस्थित वस्तु का प्रतिनिधित्व करता है।

3. भाषा (Language) भाषा, चितन का एक प्रमुख साधन है। भाषा की सहायता से ही प्रतिमा और प्रत्यय (Concept) में संबंध स्थापित किया जाता है। भाषा के माध्यम से ही व्यक्ति अपने विचारों को व्यक्त करने में सफल होता है।

4. सम्प्रत्यय (Concept) सम्प्रत्यय वस्तुओं या घटनाओं के समूह से सामान्य गुणों का एक पृथक्करण

है। जैसे यदि किसी छात्र से पूछा जाये कि चार पर एक पूछ पालतू भोकना, आदि गुणो के आधार पर उसके मन में कौनसा सम्प्रत्यय बनता है। इन गुणों के आधार पर छात्र एक सामान्य निष्कर्ष पर पहुँचता ह

चिंतन के प्रकार (Types of Thinking

जिम्बार्डो तथा रूक ने चिंतन को दो भागों में बांटा है

1. स्वली चिंतन / काल्पनिक चिंतन (Antistic Thinking)- इसमें व्यक्ति अपने काल्पनिक विचारों एव इच्छाओं की अभिव्यक्ति करता है। इससे किसी समस्या का समाधान नहीं होता है।

2. यथार्थवादी चिंतन (Realistic Thinking) इसका संबंध वास्तविकता से होता है और इसके सहारे व्यक्ति किसी समस्या का समाधान करता है।

मनोवैज्ञानिकों ने यथार्थवादी चिंतन को तीन आधार पर वर्गीकृत किया है

1. दृश्यता के आधार पर 

(i) प्रत्यक्षात्मक चिंतन / बोधात्मक चिंतन / मूर्त चिंतन (Perecptual Thinking)

जैसा कि नाम से विदित होता है. इस प्रकार के चिंतन का प्रमुख आधार प्रत्यक्ष ज्ञान है। इसमें संवेदना (Sensation) और प्रत्यक्षीकरण (Preception) दोनों ही क्रियाएँ कार्य करती है। व्यक्ति किसी वस्तु व परिस्थिति की देखकर चिंतन आरंभ करता है।

(ii) सम्प्रत्ययात्मक चिंतन / अमूर्त चिंतन (Conceptual Thinking) –

उद्दीपक की अनुपस्थिति में किया गया चिंतन |

2. दिशा के आधार पर

(i) अभिसारी चिंतन (Convergent Thinking)- अभिसारी चिंत्तन में व्यक्ति पूर्व निर्धारित तथ्यों के आधार पर कोई सही निष्कर्ष पर पहुंचने की कोशिश करता है। यह एक दिशीय होता है। iii) अपसारी चिंतन / सृजनात्मक चिंतन (Creative Thinking)- इस तरह के चिंतन में व्यक्ति दिए गए तथ्यों में अपनी और से कुछ नवीन व मौलिक विचार जोड़कर एक निश्चित निष्कर्ष पर पहुंचता है। यह बहु दिशाय होता है।

3. उद्देश्य के आधार पर

(i) आलोचनात्मक चिंतन / समीक्षात्मक चिंतन (Evaluative Thinking)- इस तरह के चिंतन में व्यक्ति किसी वस्तु घटना या तथ्य की सच्चाई को स्वीकार करने के पहले उसके गुण-दोष की परख करता है तथा कैसे और क्यों जैसे प्रश्नों के उत्तर पर ध्यान केन्द्रित करता है।

(ii) तार्किक चिंतन (Logical Thinking)

यह सबसे उच्च प्रकार का चिंतन होता है। इसमें व्यक्ति किसी समस्या का समाधान करने के लिए कार्य कारण में संबंध स्थापित करते हुए किसी लक्ष्य तक पहुँचता है। डीवी (Dewey) ने इसे विचारात्मक चिंतन (Reflectiive thinking) की संज्ञा दी है। उच्च कक्षा में अध्यापक को इस प्रकार के चिंतन के विकास का प्रयत्न करना चाहिये। तार्किक चिंतन दो प्रकार का होता है

(a) आगमनात्मक चिंतन

(b) निगमनात्मक चिंतन

चिंतन एवं अधिगम thinking and learning

• सीखने और सीखाने की प्रक्रिया में चिंतन की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है, वहीं व्यक्ति उचित प्रकार से अधिगम कर सकता है, जो उचित चिंतन करने योग्य होता है।

• स्पष्ट, सावधानी पूर्ण व क्रमिक चिंतन करने वाला व्यक्ति समाज में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

● शिक्षक को बालक में चिंतन क्षमता का विकास करने के लिए निम्न प्रयास करने चाहिए।

1. प्रत्यक्षीकरण एवं अनुभव का विकास

2. भाषा का विकास

3. रटने की आदत को दूर करना

4. जिज्ञासा प्रवृति जाग्रत करना

5. रूचि व ध्यान केन्द्रित करना

6. प्रेरणा प्रदान करना

7. वाद -विवाद व तर्क-वितर्क के अवसर प्रदान करना

8. उत्तर दायित्व के कार्य सोपना

9. विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करना

10 समस्या समाधान के अवसर प्रस्तुत करना

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