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गोस्वामी तुलसीदास पर निबंध | तुलसीदास का जीवन परिचय और उनकी रचनाएँ | Essay on Goswami Tulsidas in Hindi

समाज सुधारक तुलसीदास पर निबंध, tulsidas essay in hindi

प्रस्तावना Preface

गोस्वामी तुलसीदास हमारे देश के उन कतिपय महाकवियों में से एक है जिन्होंने भारतीय जनता की चेतना में बस कर उनकी संस्कृति तथा उनके जीवन का पथ प्रशस्त किया है। गोस्वामीजी की कृतियों ने निरन्तर शताब्दियों तक उत्तरी भारत की जनता को जीवन का श्रेय पथ दिखाया है तथा उन्हें सत्पथ पर चलने की प्रेरणा दी है। उन्हें सम्पूर्ण उत्तरी भारत में जितनी लोकप्रियता प्राप्त हुई है उतनी महाकवि कालीदास के अतिरिक्त अन्य किसी कवि को आज तक प्राप्त न हो सकी। इसलिए उनकी विशाल लोकप्रियता के कारणों की जांच करना आज के साहित्यकारों का कर्त्तव्य है।

तुलसीदास का जीवन, कृतियां एवं लोकप्रियता Life, Works and Popularity of Tulsidas

तुलसीदास के विषय में विद्वानों की राय है कि वे राजापुर के निवासी थे तथा ब्राह्मण थे। उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की थी तथा उनका विवाह एक अत्यन्त रूपवती स्त्री से हुआ था। तुलसीदास को अपनी रूपवती पत्नी से प्रगाढ़ प्रेम था। एक बार उनकी पत्नी उन्हें बिना पूछे मायके चली गयी तो तुलसीदास घनघोर वर्षा में रात्रि को ही ससुराल जा पहुंचे। उनकी पत्नी से उसके घरवालों ने इस बात पर छेड़छाड़ की तथा वह अपने पति पर क्रुद्ध हो गयी। शाम को जब वह तुलसीदास के पास आयी तो उसका रूप रोष से उग्र हो रहा था। महाकवि निराला के शब्दों में

कुछ समय अनन्तर स्थिर रहकर,
स्वर्गीयाभा वह स्वरित प्रखर स्वर में झर-झर जीवन भरकर जब बोली ।
अचपल ध्वनि की चमकी चपला,
बल की महिमा बोली अबला ।
जागी जल पर कमला अमला मति डोली ।

इस प्रकार बोलते हुए तुलसीदास की पत्नी ने पति की यह कहकर भर्त्सना की कि ‘राम के नहीं काम के सुत कहलाये ।’ पत्नी की फटकार सुनते ही तुलसीदास स्तब्ध रह गये तथा उनके पूर्व जन्मों के आध्यात्मिक संस्कार जागृत हो उठे। तुलसीदास इसके पश्चात् वहां से चल दिये तथा सूकर क्षेत्र (आधुनिक सोरों) में उन्होंने राम की सघन आराधना की। राम की कृपा से उनकी प्रतिभा जागृत हुई एवं उन्होंने जन-कल्याण के लिए राम के जीवन को विषय बनाकर काव्य रचना प्रारम्भ की। एक तो वे पहले ही प्रचंड विद्वान थे और ऊपर से भगवान राम भगवान राम की कृपा से जब उनकी प्रतिभा जागृत हुई तब तो फिर कहना ही क्या था।

उन्होंने तत्कालीन प्रचलित सभी साहित्यिक भाषाओं तथा विधाओं में रामकाव्य की रचना की तथा उनके पश्चात् रामभक्ति के क्षेत्र में भक्ति, भाषा, कवित्व तथा अभिव्यंजना की क्षमता एवं उत्कृष्टता की। उनके साथ बराबरी या स्पर्धा करने वाला दूसरा कोई व्यक्ति उत्पन्न नहीं हुआ। वे महान् धर्म एवं समाज सुधारक थे, वे महान् भक्त एवं सिद्ध पुरुष थे, वे महान कवि थे तथा डा. कैलाश बाजपेगी के शब्दों में महान शब्द शिल्पी भी थे। उनके जीवन काल में ही उन्हें महान् लोकप्रियता की प्राप्ति हुई तथा काशी के शैवों ने उनका लोहा माना। उनके काव्य को सामान्य जनता ने अपना कंठहार बनाया।

तुलसीदास का महत्व और उसके कारण

तुलसीदास के महत्व के आधार में कारण रूप में उपस्थित उनकी वह गहरी सांस्कृतिक दृष्टि थी जिसके द्वारा उन्होंने फिर से प्राचीन वैदिक आदर्श- ‘एक सद् विप्रा बहुधा वदन्ति’ की भारतीय समाज में स्थापना की। यह उनकी समन्वयवादी दृष्टि थी जिसकी आचार्य शुक्ल ने भी भूरि भूरि प्रशंसा की है। उन्होंने किसी की निन्दा नहीं की तथा उस समय अनेक सम्प्रदायों में विभक्त हिन्दू समाज को समन्वय तथा एकता का पथ दिखाया। इस समन्वय के आदर्श को ग्रहण कर तत्कालीन हिन्दू समाज का बहुत उपकार हुआ।

तुलसी के जीवन पर शोध करने वाले विद्वानों का कथन है कि तुलसीदास जब काशी गये उस समय काशी के शैव तथा वैष्णव आपस में लट्ठबाजी करते थे, गोस्वामी जी को भी उन्होंने अपनी हिसावृत्ति का शिकार बनाया था। लेकिन वे गोस्वामी जी की समन्वयवादी दृष्टि से प्रभावित हुए बिना न रह सके। गोस्वामी जी ने अपने ग्रन्थों में राम को शिव का परम भ न तथा शिव को राम का परम भक्त दिखाया है। राम सष्ट शब्दों में घोषणा करते हैं

शंकर भजन बिना नर, भगति न पावहि मोरी ।’

गोस्वामी जी का रामचरितमानस शिव के द्वारा ही कथित है। इसी प्रकार शाक्त देवियों तथा सीता में गोस्वामी जी ने एकरूपता का प्रदर्शन किया है। गोस्वामी जी ने यह सब कुछ अपनी ओर से कोई नवीनता लाने के लिए नहीं किया। उन्होंने तो प्राचीन भारतीय संस्कृति के मूलादर्श को पहचाना और उस समय लोग जिस मूल भाव को भूल गये थे, उसका उन्होंने स्मरण दिलाया। उनकी कृतियों से लोगों को प्राचीन भारतीय संस्कृति तथा आदर्शों का फिर से ज्ञान प्राप्त हो पाया और वे अपने साम्प्रदायिक संकुचन के भावों को भूल गये।

इससे भारतीय जनता को महान् सांस्कृतिक बोध प्राप्त हुआ। साथ ही गोस्वामीजी ने भारतीय जनता को सुसंस्कृत रीति से जीने का ढंग सिखाया। उनकी भक्ति कृष्णभक्तों के समान समाज-निरपेक्ष भक्ति नहीं थी। फलस्वरूप जिस समय कृष्णभक्त परकीया गोपियों के साथ तादात्म्य स्थापित कर कृष्ण से रति का आनन्द लूटने में लगे थे, उसी समय गोस्वामी जी ने लोगों को यह सिखाया कि वे समाज में तथा परिवार में किस प्रकार रहें। उन्होंने लोगों को परहित में संलग्न होने का संदेश दिया

‘परहित सरिस धर्म नहि भाई ।’

तुलसीदास का संदेश Tulsidas’ message

गोस्वामी तुलसीदास ने लोगों को समन्वय का संदेश दिया। उन्होंने समकालीन कवियों को संदेश दिया कि वे अर्थ के लोभ के वशीभूत होकर दुनियावी राजाओं का गुणगान कर अपनी प्रतिभा का दुरुपयोग न करें

कीन्हें प्राकृत जन गुण गाना। सिर धुनि गिरा लगा पछिताना ॥

उन्होंने लोक-मंगल का संदेश देते हुए कहा

परहित सरिस धर्म नहि भाई। पर पीड़ा सम नहि अधमाई ॥

उन्होंने लोगों को सभी धर्मों एवं देवताओं से समान भाव रखने का परामर्श दिया। उन्होंने लोगों को याद दिलाया

कर्म प्रधान विका करि राखा । जो जस करहिं सो तस फल चाखा

इस प्रकार गोस्वामी जी ने भारतीय संस्कृति की पुनः स्थापना की। यदि वे नहीं होते तो मुस्लिम शासन के उन दिनों में हिन्दू संस्कृति की रक्षा नहीं हो पाती।

उपसंहार Epilogue

इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि गोस्वामी जी एक महाकवि, समाज-सुधारक तथा सफल भक्त होने के साथ-साथ एक युग पुरुष भी थे। उन्होंने अपने युग का सुधार किया तथा आने वाले युग के लिए संस्कृति का पथ प्रशस्त किया। उन्होंने उस समय भारतीय संस्कृति का पुनरुद्धार किया जिस समय उसका अस्तित्व ही विदेशियों की क्रूरता एवं धर्मान्धता के कारण खतरे में पड़ गया था। इसी कारण उन्हें वह लोकप्रियता मिली जो आज तक किसी अन्य कवि को नहीं मिल पाई है।

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