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क्या है जैन धर्म | जैन धर्म के बारे में संपूर्ण जानकारी history of Jainism in Hindi

जैन धर्म का इतिहास, जैन धर्म के प्रमुख सिद्धान्त एवं शिक्षाएँ, जैन धर्म के पर्व [History of Jainism, Main principles and teachings of Jainism, Festivals of Jainism]

जैन धर्म क्या है – जैन शब्द ‘ जिन ‘ शब्द से बना है , जिसका अर्थ ‘ इन्द्रियों को जीतने वाला है । इसके प्रवर्तक एवं प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव / आदिनाथ / केसरिया नाथ ‘ थे , जिनका उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है । जैन धर्म में तीर्थंकर ( भौतिक संसार रूपी समुद्र को पार कराने वाला ) को सर्वोपरी माना जाता है जिनकी कुल संख्या 24 है ।

प्रथम आदिकाल तीर्थंकर ‘ ऋषभदेव ‘ एवं प्रथम ऐतिहासिक तीर्थंकर ‘ पार्श्वनाथ ‘ हैं जो क्रम से 23 वें तीर्थंकर माने गये हैं । जिनका जन्म महावीर स्वामी से लगभग 250 वर्ष पूर्व था । पार्श्वनाथ का जन्म काशी ( वाराणसी , उत्तर प्रदेश ) में ‘ राजा अश्वसेन ‘ के घर हुआ , इनकी माता ‘ वामादेवी ‘ व पत्नी ‘ प्रभावती ‘ थीं । इन्हें 84 दिन की कठोर तपस्या के बाद ‘ सम्मेद पर्वत ( नीलगिरि ) ‘ पर ज्ञान की प्राप्ति हुई । इनके आरम्भिक अनुयायियों में इनकी पत्नी व माँ थीं तथा इनके अनुयायी ‘ निग्रन्थ ‘ कहलाये तथा महावीर को निगंठनाथपुत्त के नाम से जाना गया ।

महावीर स्वामी

महावीर स्वामी को जैन धर्म के अन्तिम व 24 वें जैन तीर्थंकर एवं जैन धर्म के वास्तविक संस्थापक के नाम से जाना जाता है । महावीर स्वामी का वास्तविक नाम ‘ वर्द्धमान ‘ था । जिनका जन्म 599 ई.पू. वैशाली के निकट ‘ कुण्डग्राम ‘ में कश्यप गौत्र के ‘ ज्ञातक ‘ वंश में हुआ । इनके पिता ‘ सिद्धार्थ , माता लिच्छिवी के शासक ‘ चेटक ‘ की बहिन ‘ त्रिशला ‘ , पत्नी ‘ यशोदा ‘ , पुत्री ‘ प्रियदर्शनी ‘ , दामाद ( प्रथम शिष्य ) ‘ जामालि ‘ एवं बड़े भाई ‘ नन्दीवर्द्धन ‘ थे । माता – पिता की मृत्यु के बाद बड़े भाई नन्दीवर्द्धन से आज्ञा लेकर 30 वर्ष की आयु में घर में छोड़ा और 12 वर्ष कठोर तपस्या के बाद 42 वर्ष की आयु ‘ जुम्भिकग्राम ‘ के निकट ‘ उज्जूवालिया ‘ ( ऋजुपालिका ) नदी के किनारे साल वृक्ष ( शाल्मलि ) के नीचे ‘ कैवल्य ‘ ( वास्तविक ज्ञान ) की प्राप्ति हुई

Note जैन धर्म की पहली महिला भिक्षुणी चन्दना थी।

वर्द्धमान ज्ञान प्राप्ति के बाद ‘ महावीर / विजेता / जिन / निग्रन्थ / अर्हत् कहलाए । महावीर स्वामी ने अपने धर्म प्रचार का प्रमुख केन्द्र वैशाली को बनाया । इनके उपदेशों की भाषा प्राकृत एवं पाली थी , लेकिन ग्रन्थों की भाषा प्राकृत थी । महावीर स्वामी की 72 वर्ष की आयु में 527 ई.पू. ‘ पावापुरी ‘ राजगृह के निकट ( बिहार ) में देहान्त हो गया ।

जैन धर्म के प्रमुख सिद्धान्त एवं शिक्षाएँ Main principles and teachings of Jainism

  • जीओ और जीने दो ‘ का सिद्धांत महावीर स्वामी ने दिया ।
  • ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं ( अनीश्वरवादी ) ।
  • आत्मा में विश्वास ।
  • निर्वति मार्ग पर बल देना ।
  • कर्मवाद व पुनर्जन्म पर बल ।
  • स्यादवाद या अनेकान्तवाद ( सप्तभंगीय सिद्धान्त ) |
  • त्रिरत्न – सम्यक् ज्ञान , सम्यक् दर्शन , सम्यक् चरित्र ।
  • पंचअणुव्रत व पंचमहाव्रत – सत्य – अहिंसा – अपरिग्रह – अस्तेय – ब्रह्मचर्य

जैन धर्म दिगम्बर ( नग्न साधु जिसका नेतृत्व भद्रबाहु ने किया ) व श्वेताम्बर ( श्वेत वस्त्र जिसका नेतृत्व स्थूलभद्र ने किया ) सम्प्रदायों में विभक्त हो गया । उपसम्प्रदाय – पुजेरा / डेरावासी , स्थानकवासी , तेरापंथी , थेरापंथी , तारणपंथी , बीसपंथी , यापणिक । . महावीर स्वामी के प्रमुख शिष्य ( गणधर ) महावीर स्वामी के बाद केवल एक गणधर सुधर्मा ( सुधमर्ण ) ही जीवित बचे थे । गणधरों की संख्या 11 ( इन्द्रभूति गौतम , वायुभूति , आर्यव्यक्त , अग्निभूति , सुधर्मा , भण्डिकपुत्र , मौर्यपुत्र , अकम्पित , अचल , मैत्रेयी , जम्बु ) थी ।

जैन धर्म के पर्व festivals of jainism

  • पर्यूषण – जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है । इस अवसर का अंतिम दिन ‘ संवत्सरी ‘ ( भाद्रपद माह ) है ।
  • दशलक्षणापर्व – भाद्रपद शुक्ल पंचमी । इन दिनों यथाशक्ति दान , तप आदि करते हैं ।
  • सुगंध दशमी – भाद्रपद शुक्ल दशमी ।
  • रत्नत्रय – शुक्ल त्रयोदशी ।
  • देव दीवाली – दीपावली के 10 दिन पश्चात् मनाया जाने वाला पर्व जिसमें ‘ गिरनार पहाड़ी ‘ ( जूनागढ़ – गुजरात ) की परिक्रमा करते हैं ।
  • महावीर जयंती – चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को महावीर जयंती मनाते हैं । प्रमुख मेले – चांदन गाँव , हिण्डौन , करौली . महावीरजी।
  • तेरह पंथी संप्रदाय जैन धर्म से जुड़ा है ।
  • संथारा- जैन समाज में जब व्यक्ति को लगता है कि उसकी मृत्यु निकट है तो वह खाना – पीना त्यागकर मृत्यु को अपनाने की कोशिश करता है और इसी प्रथा को संथारा / संल्लेखना कहते है । चंद्रगुप्त मौर्य ने इसी प्रथा के तहत श्रवणबेलगोला ( कर्नाटक ) में अपनी देह त्यागी थी ।
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